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रिटायरमेंट के बाद आराम नहीं, बल्कि शहर को स्वच्छ बनाने का मिशन चुना, अब मिला पद्म श्री सम्मान

Padma Shri Inderjeet Singh Sidhu : रिटायरमेंट के बाद अक्सर लोग आरामदायक जिंदगी का रास्ता चुन लेते हैं. लेकिन एक व्यक्ति ने समाज के लिए काम करने की राह चुनी. उनकी कहानी बताती है कि बदलाव लाने के लिए पद नहीं, बल्कि मजबूत इरादों की जरूरत होती है.

रिटायरमेंट के बाद आराम नहीं, बल्कि शहर को स्वच्छ बनाने का मिशन चुना, अब मिला पद्म श्री सम्मान
DIG से बने 'झाड़ू योद्धा', पद्म श्री विजेता इंदरजीत की अनोखी दास्तान

Padma Shri Inderjeet Singh Sidhu : सुबह के 6 बजे हैं. शहर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं है. सड़क किनारे एक बुजुर्ग शख्स हाथ में झाड़ू और कचरे का बैग लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. राहगीर उन्हें देखकर अक्सर सफाई कर्मचारी समझ लेते हैं. कोई नहीं जानता कि यह व्यक्ति कभी पुलिस विभाग का बड़ा अधिकारी रहा है, जिसने वर्दी में दशकों तक कानून-व्यवस्था संभाली थी. दिलचस्प बात यह है कि 88 साल की उम्र में भी उनका यह जुनून कम नहीं हुआ. इस दौरान एक सड़क हादसे में उनके पैर में चोट लगी, चलने में दिक्कत होने लगी, लेकिन उन्होंने सफाई अभियान नहीं छोड़ा. छड़ी के सहारे चलते हुए भी वे रोज सड़कों और सार्वजनिक स्थानों से कचरा उठाते हैं. उनकी यही निस्वार्थ सेवा अब पूरे देश के लिए मिसाल बन चुकी है. हम बात कर रहे हैं चंडीगढ़ के पूर्व आईपीएस अधिकारी और रिटायर्ड डीआईजी इंदरजीत सिंह सिद्धू की, जिन्हें हाल ही में पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया है.

राष्ट्रपति भवन तक पहुंची सफाई की कहानी

राष्ट्रपति भवन में हुए विशेष समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इंदरजीत सिंह सिद्धू को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया है. खास बात यह है कि उन्होंने इस सम्मान के लिए कभी आवेदन नहीं किया था. उनकी सफाई करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसके बाद चंडीगढ़ प्रशासन ने केंद्र सरकार को उनके नाम की सिफारिश भेजी. पुरस्कार ग्रहण करने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे. सम्मान मिलने के बाद सिद्धू और उनके परिवार ने इसे समाज सेवा की जीत बताया.

जब रिटायरमेंट के बाद शुरू हुआ नया मिशन

1996 में डीआईजी पद से रिटायर होने के बाद सिद्धू ने आरामदायक जीवन चुनने के बजाय समाज सेवा का रास्ता अपनाया. सुबह की सैर के दौरान उन्होंने पार्कों और सड़कों पर फैली गंदगी देखी. दूसरों को दोष देने के बजाय उन्होंने खुद झाड़ू उठाने का फैसला किया. धीरे-धीरे यह उनकी दिनचर्या बन गई. आज भी वे रोज सुबह उठकर अपने इलाके में सफाई करते हैं. इसी वजह से चंडीगढ़ में लोग उन्हें प्यार से 'झाड़ू योद्धा' कहते हैं.

1963 में शुरू हुआ था पुलिस करियर

इंदरजीत सिंह सिद्धू ने 1963 में पंजाब पुलिस में इंस्पेक्टर के पद से करियर शुरू किया था. उनकी मेहनत और ईमानदारी के चलते उन्हें 1981 में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में पदोन्नति मिली. अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, नई दिल्ली और कोलकाता में अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने सांबा सेक्टर में भी सेवाएं दीं. उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें 1991 में सराहनीय सेवा पुलिस पदक से सम्मानित किया गया था.

खेल के मैदान में भी दिखाया था दम

6 जून 1938 को पंजाब के संगरूर जिले के गागरपुर गांव में जन्मे सिद्धू पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में भी अव्वल रहे. उन्होंने गवर्नमेंट रणबीर कॉलेज से बीए और पटियाला के महिंद्रा कॉलेज से इकोनॉमिक्स में मास्टर डिग्री हासिल की. कॉलेज के दिनों में वे बेहतरीन मुक्केबाज रहे और कई सम्मान हासिल किए. अनुशासन, मेहनत और जनसेवा उनके जीवन के मूल मंत्र रहे हैं.

क्यों खास है उनकी कहानी?

आज जब ज्यादातर लोग रिटायरमेंट के बाद आरामदायक जिंदगी की कल्पना करते हैं, तब इंदरजीत सिंह सिद्धू ने समाज के लिए काम करने का रास्ता चुना. उनकी कहानी बताती है कि बदलाव लाने के लिए पद या शक्ति नहीं, बल्कि मजबूत इरादों की जरूरत होती है. शायद यही वजह है कि एक पूर्व डीआईजी आज पूरे देश के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुके हैं.

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