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न बच्चा होगा, न शोर...क्या खत्म होने वाली है इंसानों और जानवरों की नस्ल? वैज्ञानिकों की खौफनाक चेतावनी!

Fertility Crisis: जरा सोचिए, क्या होगा अगर एक दिन दुनिया से बच्चों की किलकारियां और परिंदों की चहचहाहट गायब हो जाए? सुनने में किसी हॉरर फिल्म की स्क्रिप्ट लगती है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा कड़वी और डरावनी है.

न बच्चा होगा, न शोर...क्या खत्म होने वाली है इंसानों और जानवरों की नस्ल? वैज्ञानिकों की खौफनाक चेतावनी!
क्या इंसानियत का अंत करीब है? वैज्ञानिकों ने दी साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस की चेतावनी
AI

Microplastics in Human Body: वैज्ञानिकों ने एक ऐसे 'साइलेंट किलर' का पर्दाफाश किया है, जो बिना शोर मचाए हमारी और बेजुबान जानवरों की 'खानदान' बढ़ाने की ताकत को लील रहा है. मामला प्लास्टिक, प्रदूषण और बढ़ती गर्मी का है, जो मिलकर एक ऐसा कॉकटेल बना रहे हैं कि आने वाली पीढ़ियों पर ही ताला लग सकता है.

वैज्ञानिकों की चेतावनी (Silent Fertility Decline)

वैज्ञानिकों की ताजा रिसर्च (Source: Susan Brander Study) कहती है कि पेस्टिसाइड, माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे 'फॉरएवर केमिकल' हमारे जिस्म के अंदर घुसकर हार्मोन का बैलेंस बिगाड़ रहे हैं. इसे तकनीकी भाषा में 'एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स' कहते हैं. आसान भाषा में समझें तो ये वो विलेन हैं, जो शरीर को कन्फ्यूज कर देते हैं, जिससे न तो स्पर्म काउंट सही रह पा रहा है और न ही महिलाओं में ओव्यूलेशन की प्रक्रिया. आलम ये है कि पिछले 50 साल में वन्यजीवों की आबादी 70% तक गिर चुकी है और इंसानों में भी बांझपन का ग्राफ रॉकेट की तरह ऊपर जा रहा है.

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मछली से लेकर इंसानों तक...सब खतरे में! (Attack of Invisible Chemicals)

ये संकट सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है. समंदर की गहराई में रहने वाली मछलियां हों या आसमान में उड़ने वाले परिंदे, कोई भी इस 'केमिकल लोचे' से बच नहीं पाया है. वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ रसायनों की वजह से कीड़े-मकोड़ों का जेंडर (लिंग) ही बदल रहा है, तो कहीं पक्षियों के अंडों के छिलके इतने पतले हो रहे हैं कि, उनमें से बच्चा निकलने से पहले ही वो टूट जाते हैं. वहीं, इंसानों के जननांगों में माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए जाना इस बात का सबूत है कि, हम अपनी ही बनाई बर्बादी के घेरे में फंस चुके हैं.

प्रकृति का बिगड़ता संतुलन (Nature's Imbalance and Species Decline)

रही-सही कसर इस तपती गर्मी यानी ग्लोबल वार्मिंग ने पूरी कर दी है. जैसे-जैसे पारा चढ़ रहा है, जीवों के शरीर पर तनाव बढ़ रहा है. जब जहर (केमिकल) और गर्मी का मेल होता है, तो प्रजनन क्षमता यानी बच्चा पैदा करने की ताकत दम तोड़ने लगती है. दुनिया में डेढ़ लाख से ज्यादा सिंथेटिक केमिकल मौजूद हैं, लेकिन हैरत की बात ये है कि इनमें से सिर्फ 1% की जांच हुई है. हम अनजाने में उन चीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो हमारी आने वाली नस्लों का गला घोंट रही हैं.

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Photo Credit: social media

खतरनाक भविष्य की दस्तक (Warning of a Dangerous Future)

अगर अब भी हम नहीं संभले, तो वो दिन दूर नहीं जब दुनिया के पास सब कुछ होगा, बस उसे विरासत में लेने वाला कोई वारिस नहीं बचेगा. वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि, प्लास्टिक पर लगाम और प्रदूषण पर कंट्रोल ही अब आखिरी रास्ता बचा है. यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की आखिरी जंग है.

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल खबरों के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)

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