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तेल कंपनियों की उड़ी नींद, पेट्रोल पर 14 तो डीजल पर 18 रुपये प्रति लीटर हो रहा नुकसान

पेट्रोल और डीजल के साथ‑साथ रसोई गैस (LPG) पर भी तेल कंपनियों को भारी घाटा हो सकता है. अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026‑27 तक ये नुकसान, जिसे अंडर‑रिकवरी कहा जाता है, करीब 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.

तेल कंपनियों की उड़ी नींद, पेट्रोल पर 14 तो डीजल पर 18 रुपये प्रति लीटर हो रहा नुकसान

Oil Marketing Companies Loss: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से कच्चे तेल के दाम बहुत तेजी से बढ़ गए हैं. इससे भारत की तेल कंपनियां परेशानी में आ गई हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो रहा है, लेकिन देश में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जा रहे हैं. ऐसे में तेल कंपनियों को हर लीटर पर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. हाल ही में रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 14 रुपये और डीजल पर 18 रुपये प्रति लीटर का बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है.

कच्चे तेल की की कीमतों की उड़ान

इस परेशानी की असली वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आई दिक्कतें हैं. दुनिया में जितना भी तेल और गैस सप्लाई होता है, उसका करीब 20% हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है. यहां तनाव बढ़ने से तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इसी कारण कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ गए हैं. फरवरी के अंत में जो कीमतें 70–72 डॉलर प्रति बैरल थीं, वे अब 112 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई हैं.

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मुनाफे पर ब्रेक

इक्रा के प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि अगर कच्चे तेल के दाम 120–125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही बने रहते हैं, तो तेल कंपनियों को नुकसान होगा. इसकी वजह है कि वो तेल बहुत महंगे दाम पर खरीद रही हैं, लेकिन देश में पेट्रोल‑डीजल पुराने दामों पर ही बेच रही हैं. ऐसे में उनकी कमाई घटती जा रही है और मुनाफे पर बुरा असर हो सकता है.

सिर्फ पेट्रोल‑डीजल ही नहीं, रसोई गैस भी नुकसान में

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि पेट्रोल और डीजल के साथ‑साथ रसोई गैस (LPG) पर भी तेल कंपनियों को भारी घाटा हो सकता है. अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026‑27 तक ये नुकसान, जिसे अंडर‑रिकवरी कहा जाता है, करीब 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यानी गैस को भी कंपनियां महंगे दाम पर खरीदकर सस्ती कीमत पर बेचने को मजबूर होंगी.

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