- पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण भारत के तेल, गैस और कृषि उत्पादों के आयात पर असर पड़ा है
- एलपीजी की किल्लत और पैनिक बुकिंग के बाद रिफाइनरियों ने अपनी उत्पादन क्षमता करीब चालीस प्रतिशत तक बढ़ाई है
- सरकार ने शहरी क्षेत्रों में पीएनजी कनेक्शन बढ़ाकर गैस सिलेंडरों पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं
पश्चिम एशिया में तीन हफ्तों से जंग जारी है. इससे दुनियाभर में संकट छा गया है. भारत में भी कुछ वक्त के लिए इसका थोड़ा असर दिखा था. क्योंकि जंग के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है, जिससे तेल-गैस के साथ-साथ कृषि उत्पादों का आयात प्रभावित हुआ है. हालांकि, दुनियाभर में जारी इस अनिश्चितता के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा और कृषि सुरक्षा को लेकर एक बेहद मजबूत मोर्चा तैयार कर लिया है. पेट्रोलियम और उर्वरक मंत्रालय ने बताया कि देश में एलपीजी, पेट्रोल-डीजल और खेती के लिए जरूरी खादों की आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है.
एलपीजी को लेकर सरकार ने क्या किया?
अमेरिका-इजरायल और ईरान का युद्ध जब दूसरे हफ्ते में पहुंचा तो देशभर में एलपीजी की किल्लत होने की खबरें सामने आईं. इसके चलते पैनिक बुकिंग भी हुई. एलीपीजी खत्म होने के डर से लोगों ने गैस की बुकिंग की और पैनिक बुकिंग का आंकड़ा 89 लाख तक पहुंच गया था. हालांकि, अब हालात काबू में है और बुकिंग का ग्राफ गिरकर 55 लाख के सामान्य स्तर पर आ गया है.
गैस संकट से निपटने के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने अपनी उत्पादन क्षमता को भी खूब बढ़ाया. युद्ध शुरू होने के बाद से रिफाइनरियों की उत्पादन क्षमता 40 फीसदी तक बढ़ गई है, जिससे घरेलू बाजार में एलपीजी की आपूर्ति जारी रही.

इसके साथ ही सरकार शहरी इलाकों में पीएनजी कनेक्शनों को तेजी से बढ़ावा दे रही है, ताकि गैस सिलेंडरों पर निर्भरता कम की जा सके. मार्च के महीने में ही साढ़े 3 लाख से ज्यादा कनेक्शन बढ़ हैं, जिससे पता चलता है कि अब लोग गैस सिलेंडर से अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं.
यह भी पढ़ेंः ईरान की सुरक्षा की कमान अब जोलकद्र के हाथों में, लारिजानी के बाद नया चीफ बना ये शख्स कौन है?
खाद को लेकर सरकार ने क्या किया?
ईरान युद्ध के कारण खाद का आयात प्रभावित होने की भी खबरें सामने आईं. हालांकि, सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आगामी खरीफ सीजन के लिए किसानों को खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा. इस बार सरकार ने पिछले सालों की तुलना में खाद का कहीं ज्यादा भंडार जमा किया है.
आंकड़ों के अनुसार, यूरिया का स्टॉक लगभग 62 लाख टन तक पहुंच गया है, जो पिछले साल की तुलना में 10 लाख टन ज्यादा है. डीएपी का स्टॉक लगभग 25 लाख टन है और यह पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुना ज्यादा है. इसके अलावा, एनपीके का स्टॉक भी 56 लाख टन के स्तर पर बना हुआ है.

सप्लाई जारी रखने के लिए भारत ने रूस, मोरक्को और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ रणनीतिक समझौते किए हैं. इनके तहत खाद की खेप अब दूसरे समुद्री रास्तों से सुरक्षित तरीके से भारत पहुंच रही है. बाजार में कालाबाजारी और जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने देश के सभी 652 जिलों में खाद की बिक्री पर कड़ी डिजिटल मॉनिटरिंग शुरू कर दी है. इसके जरिए किसी भी संदिग्ध बिक्री या जमाखोरी की कोशिश करने वालों को तुरंत पकड़ा जा सकता है.
यह भी पढ़ेंः मिडिल ईस्ट संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पीएम मोदी को किया फोन, होर्मुज पर हुई बात
तेल-गैस की कोई कमी नहीं
पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ किया है कि तेल या गैस का कोई 'ड्राई आउट' नहीं हुआ है. अस्पतालों या होटलों जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों को भी प्राथमिकता के आधार पर सप्लाई हो रही है. कुल मिलाकर, वैश्विक स्तर पर युद्ध और तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा और कृषि सुरक्षा को इस तरह से मैनेज किया है कि आम जनता की रसोई और किसानों की खेती पर इसका कोई असर न पड़े.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं