- समय पर अच्छी बारिश के लिए तेलंगाना में कप्पा थल्ली अट्टा नामक सदियों से चली आ रही परंपरा निभाई जाती है.
- गांव वालों का मानना है कि यह परंपरा प्रकृति और देवताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है.
- जब बारिश की कमी से किसान परेशान हो जाते हैं, तब पूरा गांव एकजुट होकर यह अनुष्ठान करता है.
तेलंगाना में कई गांव बारिश के लिए केवल मौसम विभाग की भविष्यवाणियों का इंतजार नहीं करते. बारिश हो इसके लिए वो अपनी पुरानी परंपराओं का सहारा लेते हैं. ऐसा ही एक अनोखा और दिलचस्प अनुष्ठान इन दिनों तेलंगाना के चिन्ना बोनाला गांव में देखने को मिला, जहां गांव वालों ने अच्छी बारिश की कामना के लिए ‘कप्पा थल्ली अट्टा' नामक पारंपरिक अनुष्ठान किया.
दरअसल, मानसून लगातार करवटें बदल रहा है. इसने केरल के तटों पर दस्तक तो तय समय के आसपास ही दी थी पर देश के बाकी हिस्सों में ये आंखमिचौली खेल रहा है. मौमस विभाग मानसून को लेकर लगातार अपडेट देता रहता है. इसने बताया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसने महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कई हिस्सों में दस्तक दे दी है. उत्तर भारत और दिल्ली-एनसीआर में भी प्री-मानसून बारिश शुरू हो गई है और अगले कुछ दिनों में मानसून के यहां पहुंचने की संभावना है.
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इसी दरम्यान तेलंगाना के चिन्ना बोनाला गांव की गलियों में छोटे-बड़े, महिला-पुरुष सभी एक साथ जुटे और पूरे श्रद्धाभाव के साथ इस विशेष रस्म में हिस्सा लिया. यह परंपरा खास तौर पर तब निभाई जाती है जब इलाके में बारिश देर से हो रही हो या किसान सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहे हों.

Photo Credit: PTI
अनुष्ठान में क्या करते हैं ग्रामीण?
इस अनुष्ठान के दौरान गांव वाले जलाभिषेक करते हैं और गांव के देवी-देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि समय पर अच्छी वर्षा हो, खेतों में हरियाली लौटे और जल स्रोत फिर से भर जाएं. गांव वालों का मानना है कि यह परंपरा प्रकृति और देवताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है.
गांव के निवासी बोलगम नागराजू ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि जब बारिश की कमी से किसान परेशान हो जाते हैं, तब पूरा गांव एकजुट होकर यह अनुष्ठान करता है. उन्होंने कहा कि सभी आयु वर्ग के लोग इसमें शामिल होते हैं और गांव के देवताओं से पर्याप्त वर्षा, अच्छी फसल, संसाधनों की उपलब्धता, पशुधन के स्वास्थ्य और पूरे गांव की समृद्धि की प्रार्थना करते हैं.

जिंदा मेंढक
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अनुष्ठान के अनुसार, इसमें गांव के बच्चे जिंदा मेंढक पकड़ते हैं, जिन्हें बारिश की देवी (कप्पा थल्ली) का रूप माना जाता है. इसके बाद उन्हें नहलाया जाता है और उनकी पूजा करते हैं फिर मेंढकों को टोकरियों में रखकर गलियों में घुमाते और घर-घर जाते हैं.
इस दौरान लोग पारंपरिक लोक गीत गाते हैं, जैसे- कप्पाथल्ली कप्पाथल्ली... वना कुरिपिंचवा ( यानी मेंढक मां, मेंढक मां... कृपया बारिश करवाओ).
जब इन मेंढकों को बांस से लटका कर चल रहे होते हैं तो मेंढकों और उन्हें ले जा रहे लोगों पर पानी डाला जाता है. मेंढकों की आवाज सुनना बारिश आने का संकेत माना जाता है. जब ये जुलूस पूरा हो जाता है तो लोग अक्सर बच्चों या उन लोगों को जो इन मेंढकों को ले कर जाते हैं उन्हें अनाज, चावल या थोड़े पैसे देते हैं.

बारिश की देवी कप्पा थल्ली
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बारिश के लिए प्रचलित लोक परंपराएं
भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश के लिए कई लोक परंपराएं प्रचलित रही हैं. कहीं मेंढकों की प्रतीकात्मक शादी कराई जाती है, तो कहीं विशेष पूजा-पाठ और यज्ञ आयोजित किए जाते हैं. तेलंगाना का ‘कप्पा थल्ली अट्टा' भी ऐसी ही एक लोक परंपरा है, जो गांव के समाज की सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति पर उनकी निर्भरता को दर्शाती है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही इन रस्मों का मौसम विज्ञान से सीधा संबंध न हो, लेकिन इनसे गांव में सामाजिक एकता मजबूत होती है. साथ ही किसानों और ग्रामीणों को कठिन समय में मानसिक संबल भी मिलता है. यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी ऐसी परंपराएं कई गांवों में जीवित हैं.
आज जब जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून किसानों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं, तब चिन्ना बोनाला गांव में आयोजित ‘कप्पा थल्ली अट्टा' यह याद दिलाता है कि भारतीय ग्रामीण समाज में प्रकृति, आस्था और सामुदायिक जीवन का रिश्ता कितना गहरा रहा है.
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