Jaipur News: राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित आमेर किले का शिला माता मंदिर कछवाहा राजवंश के गौरवशाली इतिहास और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है. 'सांगानेर को सांगो बाबो, जैपुर को हनुमान, आमेर की शिला देवी, ल्यायो राजा मान' जैसी कहावतों में रचा-बसा यह शक्तिपीठ 16वीं शताब्दी के अंत में राजा मानसिंह प्रथम द्वारा बनवाया गया था. मान्यता है कि जयपुर राजवंश माता को ही असली शासक मानकर राज करता था और इन्हीं के आशीर्वाद से राजा मानसिंह ने 80 से अधिक युद्ध जीते थे.
बंगाल विजय के बाद 'शिला' रूप में आमेर आई प्रतिमा

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वरिष्ठ पर्यटक गाइड महेश कुमार शर्मा के अनुसार, 16वीं सदी में राजा मानसिंह प्रथम बंगाल के जसोर राज्य पर जीत हासिल करने के बाद इस प्रतिमा को लेकर आए थे. यह एक पत्थर के रूप में मिली थी, जिसे बाद में स्थानीय शिल्पकारों ने महिषासुर मर्दिनी के रूप में तराशा. इसके आमेर पहुंचने को लेकर इतिहासकारों में तीन प्रमुख मत प्रचलित हैं:-
1. जसोर के राजा केदार ने हार के बाद अपनी पुत्री का विवाह मानसिंह से किया और यह मूर्ति दहेज में दी.
2. राजा केदार को अजेय मानकर मानसिंह ने माता काली की विशेष पूजा की. माता ने स्वप्न में दर्शन देकर अपने साथ ले जाकर भव्य मंदिर बनाने का आदेश दिया, जिसके बाद मानसिंह ने जसोर पर विजय प्राप्त की.
3. युद्ध में हार के बाद मानसिंह की उपासना से प्रसन्न होकर माता ने स्वप्न में उन्हें समुद्र से शिला निकालने का आदेश दिया. शिला रूप में मिलने के कारण ही यह 'शिला देवी' कहलाईं.
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नरबलि बंद होने पर माता ने फेरा मुख

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शिला माता की मूर्ति की गर्दन दाहिनी यानी उत्तर दिशा की ओर मुड़ी हुई है. इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता है कि माता ने राजा मानसिंह से प्रतिदिन एक नरबलि का वचन लिया था. बाद में राजाओं द्वारा नरबलि की जगह पशुबलि शुरू करने पर माता नाराज हो गईं और अपना मुख उत्तर दिशा की ओर फेर लिया. विगत कई वर्षों से यहां पशुबलि भी पूरी तरह बंद है. (नोट: यह तथ्य केवल पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है, NDTV राजस्थान इसकी पुष्टि नहीं करता है)
10 महाविद्याओं की आकृतियां हैं अंकित

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मंदिर के पुजारी बनवारी लाल शर्मा के अनुसार, देवी की मूर्ति को हमेशा वस्त्रों और लाल गुलाब से ढका जाता है, जिससे केवल उनका मुख और हाथ ही नजर आते हैं. देवी महिषासुर को एक पैर से दबाकर त्रिशूल से प्रहार कर रही हैं. उनकी दाहिनी भुजाओं में खड्ग, चक्र, त्रिशूल, तीर और बाईं भुजाओं में ढाल, अभयमुद्रा, मुण्ड व धनुष हैं. मूर्ति के ऊपरी भाग में गणेश, ब्रह्मा, शिव, विष्णु और कार्तिकेय की छोटी मूर्तियां उत्कीर्ण हैं. मुख्य मूर्ति के पास भगवान गणेश और मीणा समाज की कुलदेवी हिंगला माता की मूर्तियां भी स्थापित हैं, जो इस क्षेत्र में पूर्व में रहे मीणा शासकों के इतिहास को दर्शाती हैं.
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पुजारी ओम प्रकाश शर्मा ने बताया कि मंदिर के मुख्य द्वार पर चांदी मढ़ी गई है, जिस पर नवदुर्गा और दस महाविद्याओं की आकृतियां हैं. सामने झरोखे में चांदी का नगाड़ा रखा है जो आरती में बजाया जाता है. मंदिर के खंभों पर बंगाली वास्तुकला का स्पष्ट प्रभाव दिखता है.
भैरव दर्शन से ही पूरी होती है यात्रा

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परंपरा के अनुसार, माता के दर्शन तभी पूर्ण माने जाते हैं जब भक्त परिसर के बीच स्थित भैरव मंदिर के दर्शन करता है. मान्यता है कि भैरव का वध करते समय माता ने उसकी अंतिम इच्छा पूरी करते हुए यह वरदान दिया था. मंदिर में प्रतिदिन भोग लगने के बाद ही कपाट खुलते हैं और माता को विशेष रूप से गुजिया और नारियल का प्रसाद चढ़ाया जाता है.
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