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बाजार में जामुन की भरमार मतलब इस साल पड़ेगा सूखा? सोशल मीडिया में क्यों वायरल हो रही दादी-नानी की ये कहानी

जामुन की बाजार में इस साल भरमार दिखाई दे रही है. जामुन की बंपर पैदावार को मॉनसून की बारिश में कमी और सूखे के खतरे से जोड़ा जाता है. सोशल मीडिया में इसको लेकर तमाम बातें कहीं जा रही हैं.

बाजार में जामुन की भरमार मतलब इस साल पड़ेगा सूखा? सोशल मीडिया में क्यों वायरल हो रही दादी-नानी की ये कहानी
Jamun Drought Connection: जामुन की फसल का सूखा से क्या कनेक्शन
नई दिल्ली:

Jamun Drought Connection: भारत में इस साल बाजार में जामुन की भरमार है, क्या यह सूखे की आहट है. सोशल मीडिया में ऐसी पोस्ट वायरल हैं, जिसमें दादी-नानी के जमाने की पुरानी कहावत का जिक्र करते हुए लोग कह रहे हैं कि जिस साल ज्यादा जामुन की पैदावार होती है, उस साल सूखा पड़ने का खतरा रहता है. अल नीनो के कारण कमजोर मॉनसून और जून में अब तक बारिश में 43 फीसदी की कमी ने टेंशन और बढ़ा दी है. लोगों का कहना है कि 2026 की गर्मियों में जामुन की इतनी पैदावार का सीधा रिश्ता मॉनसून बारिश में कमी से है और यह असामान्य तौर पर सूखे का इशारा करता है. 

इस साल जामुन की बंपर पैदावार

इस गर्मी में भारत के कई इलाकों में बाजारों में गहरे बैंगनी रंग के जामुन की भारी आवक है. ग्रामीण इलाकों में भी जामुन के पेड़ फलों से लदे हैं. अगर गर्मियों में जामुन के पेड़ों से असामान्य रूप से बड़ी संख्या में फल झड़ते हैं, तो उस साल सूखा पड़ने की आशंका ज्यादा होती है. सोशल मीडिया पोस्टों में इस भारी पैदावार को कम बारिश और सूखे से लोग जोड़ रहे हैं. पुराने वक्त की कहावतों में कहा जाता है कि ज्यादा जामुन घटते भूजल स्तर का संकेत देते हैं.जल संकट से जूझ रहे पेड़ों में ऐसा होता है.

जामुन की बंपर पैदावार का मतलब

जामुन (Syzygium cumini) के पेड़  में मार्च-अप्रैल के बीच फूल आते हैं. इनमें छोटे, सफेद और खुशबूदार फूलों के गुच्छे बन जाते हैं. फल बनने से पहले परागण होता है. उस दौरान बारिश नहीं होने से बेहतर होता है. बारिश फूलों से परागकणों (pollen) को गिरा देती है. छोटे फलों को पूरी तरह पकने से पहले ही खराब कर देती है.तो क्या इस बार भी ऐसा देखने को मिलेगा. हालांकि ऐसे किसी पैटर्न पर भरोसा नहीं करने वाले वनस्पति विज्ञानी इसे सूखे की भविष्यवाणी नहीं बल्कि शुष्क जलवायु का संकेत मानते हैं. 

मॉनसून की बारिश में कमी

देश के अधिकांश हिस्सों में मॉनसून के पहले भी बसंत का मौसम शुष्क रहा. मॉनसून भी उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है. अरब सागर से मॉनसून प्रवाह भी अब ठहर गया है.  जून में महाराष्ट्र और कर्नाटक में 40 से 54 प्रतिशत तक वर्षा की कमी दर्ज की गई.बारिश का इंतजार कर रहे किसान मायूस हैं,  लेकिन जामुन पैदावार वाले किसान खुश हैं.परागण बढ़िया होने से पेड़ों ने भरपूर फल दिए हैं.

मॉनसून में कहां कितनी बारिश

मॉनसून की बारिश की कमी मध्य भारत के इलाकों यानी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में रिकॉर्ड की गई है. जून के शुरुआती 22 दिनों में इस रीजन में औसत से 67 फीसदी कम बारिश हुई है. उत्तर पूर्व भारत और पूर्वी भारत में बारिश की कमी 40% कम रही है. आंध्र, तेलंगाना, बंगाल, कर्नाटक समेत दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 28 फीसदी कम बारिश हुई है.अल नीनो के कारण मॉनसून का कमजोर पड़ना इसकी बड़ी वजह है.
 

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