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शिवपुरी के 'मोती' की वफादारी देख याद आया जापान का हाचिको, मौत के बाद भी करता रहा मालिक का इंतजार

कुछ इंतजार वक्त के मोहताज नहीं होते. जापान का एक डॉग, जिसका मालिक लौटकर कभी नहीं आया, फिर भी वो हर दिन उसी जगह खड़ा रहा. हाचिको की कहानी आज भी हर पेट्स लवर के दिल में एक खामोश सी कसक छोड़ जाती है.

शिवपुरी के 'मोती' की वफादारी देख याद आया जापान का हाचिको, मौत के बाद भी करता रहा मालिक का इंतजार
मालिक चला गया, लेकिन इंतजार नहीं गया, मोती ने कर दी हाचिको की याद ताजा

Hachiko The World's Most Loyal Dog: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से सामने आई पालतू कुत्ते मोती की कहानी इन दिनों लोगों की आंखें नम कर रही है, जिस घर में उसका मालिक जगदीश अब कभी नहीं लौटेगा, उसी घर में मोती आज भी उदास बैठा है, खाना पानी छोड़ चुका है और उस कमरे को निहार रहा है जहां उसने अपने मालिक को आखिरी बार देखा था. मोती की कहानी सुनते ही दुनिया के सबसे मशहूर वफादार कुत्ते हाचिको की याद ताजा हो जाती है.

कुछ दशकों पहले जापान में एक कुत्ता अपने मालिक के लौटने का इंतजार करते हुए रोज स्टेशन पहुंचता था. मालिक तो इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन हाचिको का इंतजार दस साल तक खत्म नहीं हुआ. आज शिवपुरी का मोती भी कुछ ऐसा ही कर रहा है. फर्क बस इतना है कि जगह बदली है, देश बदला है, लेकिन कुत्ते का दिल वही है. मोती और हाचिको, दोनों की कहानियां यह बतलाती हैं कि इंसान और जानवर के रिश्ते में कोई स्वार्थ नहीं होता, सिर्फ भरोसा होता है, वो भी ऐसा जो मौत के बाद भी जिंदा रहता है.

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Photo Credit: Getty Images

जापान के टोक्यो शहर का शिबुया स्टेशन. यहीं 1925 से 1935 तक एक क्रीम रंग का कुत्ता रोज ठीक 3 बजे आकर खड़ा रहता था...नाम था हाचिको. उसके मालिक प्रोफेसर हाइडेसाबुरो उएनो (Professor Hidesaburo Ueno) हर शाम इसी स्टेशन पर ट्रेन से उतरते थे, लेकिन एक दिन वो लौटकर नहीं आए. प्रोफेसर की यूनिवर्सिटी में अचानक मौत हो गई. हाचिको को ये खबर कभी समझ नहीं आई.

वफादारी जो आदत बन गई (loyal dog Hachiko)

अगले दिन भी हाचिको आया, फिर उसके अगले दिन भी...बारिश हो या बर्फ, भीड़ हो या सन्नाटा, हाचिको का इंतजार नहीं रुका. शुरुआत में स्टेशन कर्मचारी उसे भगाते रहे, बच्चे छेड़ते रहे, लेकिन वक्त के साथ वही लोग उसका ख्याल रखने लगे. उसे खाना मिलने लगा, सहानुभूति मिलने लगी.

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अखबार से पूरी दुनिया तक (Akita dog loyalty)

1932 में एक अखबार में हाचिको की कहानी छपी और जापान के लोग भावुक हो उठे. लोग दूर-दूर से उसे देखने आने लगे. वफादारी की ये मिसाल स्कूलों में पढ़ाई जाने लगी. 1934 में शिबुया स्टेशन के बाहर उसकी प्रतिमा भी लगाई गई, जो आज भी मौजूद है.

आखिरी सांस, अमर कहानी (pet dog emotional story)

8 मार्च 1935 को हाचिको की मौत हो गई. उसकी अस्थियां उसके मालिक की कब्र के पास रखी गईं. आज उसकी कहानी किताबों, फिल्मों और मूर्तियों में जिंदा है.

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ठीक वैसे ही जैसे हाल ही में भारत में वायरल हुआ एक वीडियो, जिसमें एक पालतू कुत्ता अपने मालिक के जाने के बाद भी उसकी राह देखता रहा. ये कहानियां बताती हैं कि जानवरों का प्यार बिना शर्त होता है. 

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