VIRAL VIDEO: अक्सर हम कामयाबी को बैंक बैलेंस और बड़े पैकेज से नापते हैं. लेकिन क्या वाकई पैसा ही सब कुछ है. जरा सोचिए, एक नौजवान जो आईआईटी दिल्ली का गोल्ड मेडलिस्ट हो, जिसका एमटेक पूरा होते ही सैलरी पैकेज सीधे दो लाख से चार लाख रुपये महीना हो जाए, वह अचानक सब कुछ छोड़कर संन्यासी बन जाए. सुनने में यह किसी फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन यह हकीकत है संदीप कुमार भट्ट की, जिन्हें आज दुनिया स्वामी सुंदर गोपाल दास के नाम से जानती है. साल 2002 में संदीप ने आईआईटी दिल्ली से बीटेक में गोल्ड मेडल जीता. इसके बाद यहीं से एमटेक किया और साल 2004 से 2007 तक एक बड़ी कंपनी में काम किया. जिस दिन उन्होंने इस्तीफा देने का मन बनाया, उसी दिन उनका प्रमोशन लेटर आया जिसमें सैलरी दोगुनी होने की बात थी. लेकिन 27-28 साल के उस युवा के मन में कुछ और ही चल रहा था. उन्होंने तय किया कि देश में पुल और मशीनें बनाने वाले इंजीनियरों की कमी नहीं है, लेकिन इंसानी चरित्र को सुधारने वालों की भारी कमी है.
मशीनें सुधर रही हैं, इंसान बिगड़ रहा है
आज के दौर की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यही है कि हमारे पास सुख-सुविधा की हर मशीन है, लेकिन इंसान खुद भीतर से खोखला होता जा रहा है. हर साल लाखों लोग और छात्र डिप्रेशन की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं. फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स की बड़ी से बड़ी गुत्थी सुलझाने वाले ये होनहार दिमाग जिंदगी की छोटी सी उलझन के आगे हार मान जाते हैं. वजह साफ है- उन्हें करियर बनाना तो सिखाया गया, पर जिंदगी जीना किसी ने नहीं सिखाया.
इच्छाओं की अंधी दौड़
संदीप उर्फ स्वामी सुंदर गोपाल दास का मानना है कि जरूरतें तो बहुत सीमित हैं, मगर इच्छाएं अनंत हैं. लोग इसी अंधी दौड़ में भाग रहे हैं. वे कहते हैं, "सब्जी में नमक स्वाद के लिए जरूरी है, लेकिन अगर पूरी सब्जी को ही नमक बना दोगे तो खाओगे कैसे. पैसा भी जिंदगी में उतना ही जरूरी है, पर अगर पूरे जीवन को ही पैसा बना दोगे तो जीने का स्वाद खत्म हो जाएगा."
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अध्यात्म ही असली समाधान
पाश्चात्य संस्कृति की नकल करने की होड़ पर वे चुटकी लेते हुए कहते हैं कि जहां विदेशी लोग शांति की तलाश में भारत आ रहे हैं और गीता पढ़ रहे हैं, वहीं हम अपनी ही अमूल्य विरासत को भूलकर उनके पीछे भाग रहे हैं. जब तक हम खुद को सिर्फ एक शरीर मानकर भौतिक चीजों के पीछे भागते रहेंगे, तब तक तनाव और डिप्रेशन पीछा नहीं छोड़ेगा. असली शांति तभी मिलेगी जब हम खुद को पहचानेंगे और अपने भीतर के नैतिक मूल्यों को जगाएंगे.
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