अंतरिक्ष में इंसानों का रहना अब आम बात हो गई है, लेकिन क्या वहां बच्चे पैदा करना संभव है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए वैज्ञानिक लगातार रिसर्च कर रहे हैं. हाल ही में प्रकाशित एक स्टडी में इस विषय पर कई अहम खुलासे हुए हैं.
माइक्रोग्रैविटी का प्रजनन पर असर
स्टडी के अनुसार, अंतरिक्ष में मौजूद माइक्रोग्रैविटी (शून्य गुरुत्वाकर्षण) इंसानी प्रजनन प्रक्रिया को प्रभावित करती है. रिसर्च में पाया गया कि स्पेस जैसी परिस्थितियों में शुक्राणु (sperm) सही दिशा में तैर नहीं पाते, जिससे निषेचन (fertilisation) की संभावना लगभग 30% तक कम हो सकती है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक खास माइक्रोग्रैविटी सिमुलेशन चैंबर बनाया, जो महिला प्रजनन तंत्र जैसा वातावरण तैयार करता है. इसमें देखा गया कि शुक्राणुओं को अंडाणु तक पहुंचने में कठिनाई होती है.
स्पेस रेडिएशन भी बड़ा खतरा
अंतरिक्ष में मौजूद कॉस्मिक रेडिएशन भी प्रजनन के लिए खतरा है. यह डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है, कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है और प्रजनन कोशिकाओं (reproductive cells) को प्रभावित कर सकता है. इसके अलावा, माइक्रोग्रैविटी शरीर के हार्मोन सिस्टम को भी बदल देती है, जिससे शुक्राणु और अंडाणु दोनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है.
प्रोजेस्टेरोन से मिली थोड़ी उम्मीद
स्टडी में यह भी सामने आया कि प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) नाम का हार्मोन शुक्राणुओं को दिशा देने में मदद करता है. यह हार्मोन अंडाणु से निकलता है और एक तरह से सिग्नल का काम करता है, जिससे शुक्राणु सही दिशा में आगे बढ़ते हैं. हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसे स्पेस में प्रजनन का आसान समाधान नहीं माना जा सकता.
भविष्य के लिए क्यों जरूरी है ये रिसर्च?
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station) पर इंसान पिछले 20 सालों से रह रहे हैं, लेकिन भविष्य में अगर इंसान चांद या मंगल ग्रह पर बसना चाहता है, तो वहां प्रजनन संभव होना बेहद जरूरी है. स्टडी की प्रमुख वैज्ञानिक Nicole McPherson के अनुसार, अगर हमें पृथ्वी के बाहर लंबे समय तक रहना है, तो यह समझना जरूरी है कि वहां इंसान प्रजनन कर सकता है या नहीं.
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