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महज 6 दिन में नाप दिया 6100 KM आसमान... छोटे अमूर बाज की भारत से जिम्बाब्वे तक की हैरतंगेज उड़ान

महज 6 दिन में अमूर बाज ने 6100 किलोमीटर का सफर तय कर भारत से अफ्रीका तक की हैरतंगेज उड़ान भरी.

महज 6 दिन में नाप दिया 6100 KM आसमान... छोटे अमूर बाज की भारत से जिम्बाब्वे तक की हैरतंगेज उड़ान
एआई जेनरेटेड इमेज
  • अमूर फाल्कन दुनिया के सबसे तेज पक्षियों में शामिल है, जिसने शानदार उड़ान भर सभी को चौंका दिया
  • मणिपुर से सैटेलाइट टैग किए गए तीन अमूर फाल्कन ने दिसंबर में हजारों किलोमीटर की लंबी यात्रा पूरी की
  • अपापांग ने 6 दिनों में 6100 किलोमीटर का बिना रुके सबसे लंबा सफर तय किया है

बाज महज कोई पक्षी ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे तेज शिकारियों में से एक है. जब पूरी दुनिया क्रिसमस के जश्न में डूबी है, उसी समय एक बाज ने आसमान में ऐसा सफर तय किया है जो इंसानी कल्पना से परे है. नाम है अमूर फाल्कन, जो हरारे (जिम्बाब्वे) के आसमान में उड़ते हुए हमें याद दिलाता है कि शहरी जीवन और प्रकृति के यात्री कितने गहरे जुड़े हुए हैं.

मणिपुर से अफ्रीका तक का सफर

मणिपुर से सैटेलाइट टैग किए गए तीन अमूर फाल्कन अपापांग, अलांग और अहू ने दिसंबर में हजारों किलोमीटर की यात्रा पूरी कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. ये छोटे-से पक्षी उन सबसे लंबी उड़ान भरने वालों में शामिल हो गए हैं जो किसी रैप्टर ने बिना रुके तय की हों.

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अपापांग की रिकॉर्ड उड़ान

अपापांग, जिसे ऑरेंज टैग किया गया था, उसने नवंबर में सिर्फ 6 दिनों में 6,100 किलोमीटर का सीधा सफर तय किया. भारत से अरब सागर और अफ्रीका के हॉर्न को पार करते हुए वह केन्या पहुंचा. यह उड़ान छोटे शिकारी पक्षियों के लिए सबसे लंबी बिना रुके की गई यात्राओं में गिनी जाती है.

अलांग और अहू की अलग राहें

अलांग, सबसे युवा फाल्कन (येलो टैग), ने 5,600 किलोमीटर की यात्रा की. उसने तेलंगाना और महाराष्ट्र में थोड़े ठहराव के बाद केन्या का रुख किया. अहू, रेड टैग के साथ, बांग्लादेश में रुका और फिर अरब सागर पार कर सोमालिया पहुंचा, कुल दूरी रही 5,100 किलोमीटर.

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क्यों है यह सफर खास?

इन उड़ानों ने अमूर फाल्कन को “टाइनी लॉन्ग-डिस्टेंस वॉयजर” का खिताब दिलाया है. इनका ये सफर हमें बताता है कि वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र कितने जुड़े हुए हैं और क्यों महाद्वीपों को जोड़ने वाले प्रवासी मार्गों का संरक्षण जरूरी है. ये पक्षी आगे बोत्सवाना के ओकावांगो डेल्टा और सोमालिया के ज़ाफून जैसे इलाकों तक पहुंचते हैं, जिससे हमें पक्षियों की सहनशक्ति और संरक्षण की अहमियत समझ में आती है.

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