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कंपनी में AI के आते ही...टीम का हो गया सफाया, फाउंडर ने बयां किया करियर का सबसे दर्दनाक दौर

एक वक्त था जब दफ्तर में रौनक थी, मीटिंग रूम में आवाजें गूंजती थीं और हर आइडिया पर बहस होती थी, फिर खामोशी ने दस्तक दी. काम तो चलता रहा, लेकिन लोग कम होते गए. अब वही फाउंडर कह रहा है कि, फायदा हुआ, मगर दिल खाली हो गया.

कंपनी में AI के आते ही...टीम का हो गया सफाया, फाउंडर ने बयां किया करियर का सबसे दर्दनाक दौर
टीम घटी, टेक्नोलॉजी बढ़ी, स्टार्टअप की कड़वी सच्चाई

AI Impact On Jobs : दफ्तर में कभी चाय की खुशबू के साथ हंसी गूंजती थी, हर डेस्क पर कोई न कोई मसला हल किया जा रहा होता था, फिर धीरे-धीरे स्क्रीनें तो जलती रहीं, मगर कुर्सियां खाली होती गईं. काम चलता रहा, आंकड़े सुधरते रहे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी उतर आई. एआई के इस नए दौर में एक फाउंडर की यही दास्तान अब सोशल मीडिया पर चर्चा का सबब बनी हुई है.

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एआई ने बदला स्टार्टअप का मंजर (AI Changed the Startup Landscape)

AI यानी Artificial Intelligence ने Startup World की तस्वीर बदल दी है, जिन कामों के लिए पहले पूरी टीम चाहिए होती थी, अब वही काम सॉफ्टवेयर कुछ मिनटों में कर देता है. Automation, कम खर्च, ज्यादा प्रोडक्टिविटी जैसे शब्द अब आम हो चुके हैं. कनाडा में रहने वाले George Pugh (जो Reality नाम की कंपनी के संस्थापक हैं) ने X पर अपनी कहानी साझा की. उन्होंने बताया कि 2023 में उनकी टीम 14 लोगों से घटकर सिर्फ 5 रह गई. यह फैसला किसी ख्वाहिश का नहीं, बल्कि मजबूरी का नतीजा था.

पैसा बचा, मगर एहसास टूट गए (Startup AI Story)

27 साल के जॉर्ज प्यू ने लिखा कि, बढ़ते खर्च और घटती कमाई के बीच कंपनी को बचाने के लिए टीम कम करनी पड़ी. AI ने कई ऐसे काम संभाल लिए जिनके लिए पहले लोगों की जरूरत समझी जाती थी.उन्होंने माना कि यह उनका सबसे अच्छा फाइनेंशियल फैसला था, लेकिन सबसे दर्दनाक इमोशनल लम्हा भी. दो साल तक उन्होंने किसी को नई नौकरी पर नहीं रखा. उनका कहना है कि छोटी टीम पर काम करना अक्सर तन्हा कर देता है.

एआई की जीत या इंसानी हार (AI Victory or Human Loss)

उनकी पोस्ट पर कई यूजर्स ने अपनी कहानी साझा की. किसी ने कहा कि, महीनों तक असल में किसी इंसान से बात नहीं हुई, सिर्फ बॉट से. एक अन्य ने लिखा कि, AI की जीत दिखती है, लेकिन उसकी कीमत कोई नहीं बताता. यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि AI का असर अब सिर्फ टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और वर्क कल्चर तक पहुंच चुका है. AI काम आसान बना रहा है, लेकिन हर फैसले की एक कीमत होती है. मुनाफा बढ़ सकता है, मगर दफ्तर की रौनक और साथ काम करने का एहसास मशीन नहीं दे सकती.

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Disclaimer: यह खबर सोशल मीडिया पर यूजर द्वारा की गई पोस्ट से तैयार की गई है. एनडीटीवी इस कंटेंट की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता.

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