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डोनाल्ड ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' समस्या का समाधान करेगा या खुद समस्या बनेगा, क्या करेगा भारत?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस बोर्ड ऑफ पीस को पेश किया है, वह उस प्रस्ताव से अलग है, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भारी बहुमत से पास किया था. क्या सफल हो पाएगी ट्रंप की यह योजना.

डोनाल्ड ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' समस्या का समाधान करेगा या खुद समस्या बनेगा, क्या करेगा भारत?
नई दिल्ली:

संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दिमाग की उपज माना जाता है. आज अमेरिका  के 45वें राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप उसे खत्म करने पर तुले हुए हैं. गाजा में युद्ध के खात्मे के लिए ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस का प्रस्ताव किया था. लेकिन अब वो इस बोर्ड ऑफ पीस को पूरी दुनिया के लिए बता रहे हैं. ट्रंप प्रशासन ने इसमें शामिल होने के लिए भारत और रूस समेत दुनिया के करीब 60 देशों को न्योता भेजा है. उनके न्योते को कुछ देशों ने स्वीकार भी कर लिया है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ट्रंप की इस कोशिश को संयुक्त राष्ट्र के बरक्स के अमेरिकी संस्था खड़ा करने की कोशिश करार दे रहे हैं. आइए देखते हैं कि क्या है डोनाल्ड ट्रंप की यह कोशिश. 

क्या कहता है संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 17 नवंबर, 2025 को प्रस्ताव संख्या 2803 पास किया था. इसमें अमेरिकी नेतृत्व वाली 'गाजा संघर्ष को समाप्त करने की व्यापक योजना' का समर्थन किया गया था. इस प्रस्ताव में गाजा के संक्रमण काल ​​के लिए एक शांति बोर्ड (बीओपी) की स्थापना और विसैन्यीकरण और सुरक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (International Stabilization Force) को अधिकृत किया गया है. इस प्रस्ताव का उद्देश्य फिलस्तीन प्राधिकरण द्वारा गाजा पर नियंत्रण हासिल करने तक अंतरराष्ट्रीय निगरानी में गाजा का पुनर्निर्माण करना है. इस प्रस्ताव को 13 देशों ने समर्थन दिया था. तमाम आपत्तियों के बाद अरब देशों और यूरोप ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिससे ट्रंप को गाजा शांति प्रक्रिया से जुड़े रहें और आजाद फिलस्तीन देश की संभावना बनी रहे.

अब दो महीने बाद जारी 'बोर्ड ऑफ पीस' के चार्टर में गाजा का नाम तक नहीं है. अब यह बोर्ड खुद को पूरी दुनिया के लिए एक स्थायी संस्था बता रहा है. इसका दावा है कि यह असफल अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बेहतर होगा. इसमें संयुक्त राष्ट्र को ही शायद असफल अंतरराष्ट्रीय संस्था बताया गया है, हालांकि उसका नाम नहीं लिया गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कह भी दिया है कि 'बोर्ड ऑफ पीस' संयुक्त राष्ट्र की जगह ले सकता है. व्हाइट हाउस ने शुक्रवार को 'बोर्ड ऑफ पीस' के एक कार्यकारी बोर्ड की जानकारी दी थी. इसमें ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और भारतीय मूल के अमेरिकी कारोबारी अजय बंगा को शामिल किया गया है. 

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'बोर्ड ऑफ पीस' का चार्टर क्या कहता है

मीडिया के कुछ हिस्से में आए 'बोर्ड ऑफ पीस' के चार्टर के ड्राफ्ट के मुताबिक ट्रंप इसके आजीवन अध्यक्ष हो सकते हैं. उनका यह कार्यकाल उनके राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल के बाद भी जारी रह सकता है. ट्रंप को केवल उनके इस्तीफे या कार्यकारी बोर्ड के सर्वसम्मत प्रस्ताव के जरिए ही हटाया जा सकेगा. इसके अलावा एक खास बात यह है कि बोर्ड के गठन के तीन साल बाद भी अगर कोई देश इसका सदस्य रहना चाहता है तो उसे इसके लिए एक अरब डॉलर के शुल्क का भुगतान करना होगा. यह भी कह सकते हैं कि आजीवन सदस्यता एक अरब डॉलर (भारतीय रुपये में 91 अरब रुपये से भी अधिक) में खरीदी जा सकती है.

'बोर्ड ऑफ पीस' के चार्टर का ड्राफ्ट सामने आते ही पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया. क्योंकि यह उस संस्था से बहुत अलग है, जिसका जिक्र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2803 में किया गया था. इस प्रस्ताव को 13–0 के बहुमत से पारित किया गया था. इस प्रस्ताव पर 18 नवंबर को हुए मतदान से रूस और चीन ने दूरी बनाई थी. प्रस्ताव का पूरा पाठ गाजा संघर्ष पर केंद्रित था. लेकिन ट्रंप प्रशासन की ओर से पेश ड्राफ्ट में बोर्ड को दुनिया भर में शांति और सुशासन को बढ़ावा देने वाली एक स्थायी संस्था के रूप में पेश किया गया है.

'बोर्ड ऑफ पीस' के चार्टर में 'चार्टर' शब्द का प्रयोग शायद यूएन चार्टर से लिया गया है. 1945 का यूएन चार्टर दूसरे विश्व युद्ध से मिले कड़े सबक पर आधारित था, उसमें अहिंसा की प्रधानता, आत्मनिर्णय, छोटे-बड़े सभी देशों के समान अधिकार और मौलिक मानवाधिकारों की बात थी, लेकिन 'बोर्ड ऑफ पीस' के चार्टर में  इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया है. इसका अधिकांश हिस्सा किसी क्लब के नियमों की तरह लगता है. यह अध्यक्ष (डोनाल्ड ट्रंप) को सर्वशक्तिमान बनाता है. इसके सदस्य नियमों के तहत आते-जाते रहेंगे,जब तक कि वे एक अरब डॉलर नकद देकर आजीवन सदस्यता न खरीद लें, इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि ट्रंप उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखा देंगे. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार है, जबकि 'बोर्ड ऑफ पीस' में वीटो का अधिकार केवल ट्रंप के पास होगा. 

चीन ने भी की थी कोशिश

यह पहली बार नहीं है जब किसी अंतरराष्ट्रीय नेता ने इस तरह का प्रस्ताव किया हो. अभी पिछले साल ही संघाई सहयोग संगठन प्लस की बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने  ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव का प्रस्ताव किया था.इसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय शासन को अधिक न्यायसंगत, समावेशी और संप्रभु-समता आधारित बनाने की बात कही गई थी. चीन ने इसके जरिए पश्चिम आधारित नेतृत्व और एकाधिकारवादी व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की. इसमें अंतरराष्ट्रीय शासन में सभी देशों की समान भागीदारी का समर्थन किया गया था. लेकिन अंतरराष्ट्रीय समाज में उसकी इस कोशिश को लेकर बहुत अधिक प्रतिक्रिया नहीं हुई. चीन ने पिछले कुछ सालों में कई अंतरराष्ट्रीय पहल की है, इसमें ब्रिक्स का गठन और विस्तार, एससीओ को मजबूत बनाना, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव जैसी पहल की है.  

'बोर्ड ऑफ पीस' में भारत शामिल होगा या नहीं

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अपने ऑफिशियल एक्स हैंडल से एक पत्र जारी कर बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ पीस'में शामिल होने का न्योता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेजा है. लेकिन भारत सरकार ने इसमें शामिल होने या न होने पर अभी कोई फैसला नहीं लिया है. अमेरिकी प्रस्ताव पर भारतीय थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च फेलो डॉक्टर पवन चौरसिया इस बात पर संशय जताते हैं कि यह अमेरिका की संस्था है. वो इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्यक्तिगत विचार बताते हैं. वो कहते हैं कि हमें अभी यह देखना होगा कि इसको लेकर अमेरिकी संस्थाएं क्या विचार जताती हैं. 'बोर्ड ऑफ पीस'को संयुक्त राष्ट्र के बरक्स खड़ा किए जाने पर वो चिंता भी जताते हैं. वो कहते हैं कि ट्रंप के निमंत्रण पर भारत सरकार शायद ही कोई निर्णय ले. वो कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र से हमारी असहमतियां हो सकती हैं. लेकिन अगर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़नी है तो उसे संयुक्त राष्ट्र में नेतृत्व करना होगा. वो कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र को छोड़ने या संयुक्त राष्ट्र से इतर किसी संस्था में शामिल होने से भारत को व्यक्तिगत स्तर पर कोई लाभ नहीं होने वाला है. डॉक्टर चौरसिया कहते हैं कि पूरी दुनिया खासकर ग्लोबल साउथ का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के जरिए ही बहुत सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. वो कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र बहुत हद तक फेल हुआ है, लेकिन हमें उसके विकल्प की क्षमता को भी देखना होगा कि क्या वह इतनी क्षमता रखता है कि वो संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में स्थापित हो सके.

'बोर्ड ऑफ पीस' की कोशिश

'बोर्ड ऑफ पीस'में शामिल होने के लिए ट्रंप प्रशासन ने भारत और रूस समेत दुनिया के करीब 60 देशों को न्योता भेजा है. ट्रंप के न्योते को इजरायल, अर्जेंटीना, अजरबैजान, बेलारूस, हंगरी, कजाकिस्तान, मोरक्को, यूएई और वियतनाम जैसे देशों ने अब तक स्वीकार कर लिया है. 

इस बोर्ड के पास गाजा में युद्धविराम को आगे बढ़ाने और सैद्धांतिक रूप से शांति, शासन और पुनर्निर्माण के लिए तंत्र होगा. लेकिन इस बात के भी संकेत मिल रहे हैं कि इसकी कोशिश गाजा से संयुक्त राष्ट्र की उन एजेंसियों को हटाने की भी है, जो वहां संघर्ष के बाद स्थिरता लाने और पुनर्निर्माण में मदद करती रही हैं. कई एजेंसियों के दफ्तर भी तोड़ दिए गए हैं. इजरायल को अपने बंधक वापस मिल गए हैं, ऐसे में वह कभी भी कोई अप्रीय कदम उठा सकता है. बोर्ड में जिस तरह से धनपतियों को रखा गया है, वह उसके कॉरपोरेट की तरह चलाने की ओर इशारा करता है. ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी बोर्ड में शामिल होने का न्योता भेजा है. अगर वह 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल हो भी जाते हैं तो भी इस बात की संभावना कम ही है कि यूक्रेन में युद्ध रुक जाए. वैसे में इसके दिखावटी परियोजना बनकर रह जाने की संभावना अधिक है. 

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