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हॉर्मुज स्ट्रेटः राष्ट्रपति ट्रंप को इस तेल लाइफलाइन को दोबारा खोलना मुश्किल क्यों लग सकता है?

दुनिया के तेल का सबसे अहम रास्ता हॉर्मुज स्ट्रेट तनाव के कारण लगभग ठहर सा गया है. अमेरिका इसे दोबारा खोलने की बात कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ युद्धपोत भेजना काफी होगा या मामला एयर स्ट्राइक और जमीनी ऑपरेशन तक जा सकता है?

हॉर्मुज स्ट्रेटः राष्ट्रपति ट्रंप को इस तेल लाइफलाइन को दोबारा खोलना मुश्किल क्यों लग सकता है?
हॉर्मुज को खोलना इतना मुश्किल क्यों है?
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  • ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध से बाधित हुआ हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल व्यापार का सबसे अहम समुद्री रास्ता है.
  • अमेरिका इसे वापस खाेलना चाहता है. इसके लिए वह टैंकर एस्कॉर्ट, एयर स्ट्राइक जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है.
  • असली चुनौती सिर्फ रास्ता खोलना नहीं, बल्कि शिपिंग और बीमा कंपनियों का भरोसा वापस लाना है.
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दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था में कुछ जगहें ऐसी हैं जो सचमुच धड़कन की तरह काम करती हैं. अगर वह धड़कन रुक जाए तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है. ऐसी ही एक जगह है हॉर्मुज स्ट्रेट, जो कि एक संकरा समुद्री रास्ता है पर यह यह इतना अहम है कि पूरी दुनिया के तेल व्यापार का करीब 20 फीसद इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. अपने सबसे संकरे हिस्से में हॉर्मुज स्ट्रेट की महज 21 मील चौड़ाई है. लेकिन इस संकरे हिस्से से होकर सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादकों समेत लगभग 3000 जहाज हर रोज यहां से गुजरते हैं और विभिन्न देशों के बाजारों तक लाखों बैरल तेल पहुंचाते हैं.

28 फरवरी को ईरान पर इजरायल के शुरुआती हमले के दो हफ्ते बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से मालवाहक जहाजों की आवाजाही कम हो गई है क्योंकि ईरान ने इजरायल और उन सभी देशों के जहाजों पर हमले करने का एलान किया है जो इस लड़ाई में उसके शत्रु देशों का साथ दे रहे हैं. इस वजह से हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही कम हुई, तो पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मच गया. कई जहाज अभी खाड़ी के बंदरगाहों में खड़े हैं या समुद्र में सुरक्षित हालात का इंतजार कर रहे हैं.

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इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस रास्ते को दोबारा खोलेगा और जहाजों की सुरक्षा करेगा. उसने इसके लिए फ्रांस, चीन, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों से उनके युद्धपोत हॉर्मुज स्ट्रेट भेजने का आग्रह किया. 

डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर लिखा कि वो देश जो ईरान की ओर से हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की कोशिश से प्रभावित हैं, इस रास्ते को खुला और सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर युद्धपोत भेजेंगे. पर सवाल ये है कि क्या हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से पहले की तरह खोलना इतना आसान है?

असलियत यह है कि इसके लिए कई सैन्य विकल्प हैं और इनमें से प्रत्येक में एक तरफ जोखिम तो दूसरी तरफ खर्च और सबसे अव्वल तो युद्ध का खतरा छिपा है.

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दुनिया की तेल लाइफलाइन क्यों है हॉर्मुज

अगर दुनिया के तेल नक्शे को देखें तो हॉर्मुज स्ट्रेट एक सुपर-क्रिटिकल चोकपॉइंट है. हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल इस रास्ते से गुजरता है. खाड़ी के बड़े तेल निर्यातक देशों के लगभग सभी टैंकर पहले इसी रास्ते से अरब सागर की ओर निकलते हैं. खासकर एशियाई देशों में इसी रास्ते से तेल का करीब 70-75 फीसद निर्यात होता है. मतलब, अगर इस रास्ते से होकर जहाजों की आवाजाही पूरी तरह से थम गई तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो जाएगी. इसकी मार सबसे अधिक एशियाई देशों पर पड़ेगी. इससे न केवल तेल की कीमत बढ़ सकती है बल्कि कई देशों को उनके जरूरत की ऊर्जा नहीं मिल पाएगी. साथ ही इसकी वजह से अन्य सामानों की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी.

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हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरते जहाज

हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरते जहाज
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पहला विकल्प: टैंकरों को युद्धपोतों की सुरक्षा देना

हॉर्मुज को सभी देशों के लिए फिर खोलने का सबसे सीधा तरीका यह माना जा रहा है कि अमेरिका अपने युद्धपोतों के साथ टैंकरों को एस्कॉर्ट करे. इसका मतलब होगा कि अमेरिकी डिस्ट्रॉयर और क्रूजर जहाज टैंकरों के साथ चलेंगे. वे समुद्र में माइंस, मिसाइल या हमले के संकेत खोजते रहेंगे. साथ ही ईरान की छोटी तेज नौकाओं से भी बचाव करेंगे, जिन्हें मॉस्किटो फ्लीट यानी मच्छर बेड़ा भी कहा जाता है. इन तेज चलने वाली छोटी नौकाओं की रणनीति बहुत अलग होती है. वे एक साथ कई नावों से हमला करके बड़े जहाजों को घेरने की कोशिश करती हैं. इसलिए किसी एक टैंकर की सुरक्षा के लिए भी एक से अधिक युद्धपोतों की जरूरत पड़ सकती है. जानकारों का अनुमान है कि एक टैंकर की सुरक्षा के लिए दो युद्धपोतों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है. इसके साथ ही एयर कवर भी देना पड़ेगा. यानी अगर कई जहाजों को हॉर्मुज से गुजरना है तो वहां बड़ी सैन्य तैनाती करनी पड़ेगी. 

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एमक्यू-9ए रीपर ड्रोन

एमक्यू-9ए रीपर ड्रोन
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आसमान से निगरानी: ड्रोन और एयर कवर

इसके साथ ही अमेरिका को लगातार हवाई निगरानी भी करनी पड़ेगी. इसके लिए खास तौर पर एमक्यू-9 रीपर जैसे ड्रोन का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस ड्रोन की क्षमता घंटो आसमान में उड़ कर मिसाइल लॉन्चर को ढूंढने और दुश्मन के ड्रोन लॉन्च साइट्स तलाशने और उन्हें निशाना बनाने की है. हालांकि इसके बावजूद जहाजों पर हमले की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होगी.

ईरान की मिसाइल की प्रतीकात्मक तस्वीर

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दूसरा विकल्प: ईरान के तट पर एयर स्ट्राइक

हॉर्मुज को सुरक्षित बनाने का दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अमेरिका ईरान के दक्षिणी तट पर एयर स्ट्राइक बढ़ा दे. यहीं पर हॉर्मुज स्ट्रेट मौजूद है. लड़ाकू विमान और ड्रोन इसके दक्षिणी तट के पास लगातार गश्त करेंगे और जैसे ही किसी मिसाइल लॉन्चर या ड्रोन टीम का पता चलेगा, फौरन हमला करेंगे. लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या है. पर यहां एक समस्या यह भी है कि ईरान अपने कई एंटी-शिप मिसाइलों को ट्रकों पर फिट करके इस्तेमाल करता है. यानी वो बहुत तेजी से उनके लोकेशन को बदल सकता है. ट्रक से एंटी-शिप मिसाइल से हमला करने के तुरंत बाद उसे उस जगह से गायब किया जा सकता है. ऐसे में एयर स्ट्राइक से भले ही खतरा कम करने की गुंजाइश है पर इसे पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है.

तीसरा और सबसे बड़ा विकल्प: ईरान पर जमीनी कार्रवाई

हॉर्मुज में जहाजों को सफलता के साथ कवर करने से पहले तीसरे विकल्प के तौर पर अमेरिका दक्षिणी तटों पर अपने सैनिकों को भी उतार सकता है. ऐसा करके वह ईरान के ड्रोन और मिसाइल साइट्स को नष्ट कर सकता है, जिससे ईरानी सेना तटों से पीछे हट जाएगी और इस तरह मॉस्किटो फ्लीट के रूप में नावों से जहाजों पर हमला करने की उनकी ताकत भी कमजोर हो जाएगी. पर सैनिकों को ईरानी तटों पर उतारने का निर्णय बहुत बड़ा होगा तो निश्चित तौर पर इसे अमेरिका अपने आखिरी विकल्प के रूप में आजमाना चाहेगा. इससे पहले वह एयर स्ट्राइक जैसे विकल्प की आजमाइश करना चाहेगा. 

भले ही अमेरिका सैन्य ताकत में ईरान के मुकाबले कहीं अधिक ताकतवर है पर इसे देखते हुए कि यह युद्ध अभी कम से कम तीन हफ्ते और खिंचने की संभावना जताई जा रही है, हॉर्मुज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उसे हजारों की संख्या में सैनिकों की जरूरत पड़ सकती है. जब अमेरिकी सैनिक उतरेंगे तो उन्हें ईरान की सैन्य ईकाई इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का सामना करना पड़ेगा जो दशकों से ऐसे ही असमान युद्ध रणनीतियों के लिए ट्रेनिंग लेती रही है. यानी अमेरिकी सैनिकों को लगातार गुरिल्ला हमलों का सामना करना पड़ सकता है.

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सबसे बड़ी चुनौती: भरोसा वापस लाना

मान लिया जाए कि ऊपर बताई गई सभी असहज परिस्थितियों से गुजरते हुए अमेरिका हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों को सुरक्षा सुनिश्चित करता है. इसके बावजूद क्या जहाज कंपनियां इस रूट से अपने जहाजों को ले जाने के लिए तैयार होंगी और क्या उन जहाजों को बीमा देने वाली कंपनियां इसके लिए मानेंगी?

समुद्र से व्यापार के मामले में अंतिम फैसला शिपिंग कंपनियां और बीमा कंपनियां लेती हैं. ऐसे में अगर उन्हें लगता है कि खतरा अभी मौजूद है तो वो जहाज को दूसरे रास्तों से भेजना पसंद करेंगी. यानी हॉर्मुज स्ट्रेट को खोलने की अमेरिकी कोशिश विभिन्न देशों को शिपिंग कंपनियों और बीमा कंपनियों पर भी टिकी हुई हैं.

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