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भारत में क्या है तेल का पूरा गणित? 1 डॉलर बढ़ा तो कितना महंगा होगा पेट्रोल-डीजल, कैसे तय होते हैं दाम

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों का गणित काफी जटिल है. इसमें कई घटक शामिल हैं. इसीलिए जब भी वैश्विक बाजार में तेल की कीमत बढ़ती है तो उसका असर धीरे-धीरे भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम आदमी की जेब पर दिखाई देता है.

भारत में क्या है तेल का पूरा गणित? 1 डॉलर बढ़ा तो कितना महंगा होगा पेट्रोल-डीजल, कैसे तय होते हैं दाम
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  • कच्चे तेल की कीमत 1 डॉलर प्रति बैरल बढ़ने से पेट्रोल-डीजल की लागत लगभग 50-60 पैसे प्रति लीटर बढ़ सकती है.
  • पेट्रोल-डीजल की कीमत में टैक्स का हिस्सा 40-50 प्रतिशत तक होता है.
  • कच्चे तेल से सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं; LPG, प्लास्टिक, पेट्रोकेमिकल्स और बिटुमिन जैसे कई उत्पाद बनते हैं.

ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध से पेट्रोल की कीमतों पर असर की जिक्र लगातार चल रहा है और इससे इसकी कीमतें एक बार फिर चर्चा और बहस का विषय बन गई हैं. जब भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर तेल का पूरा गणित क्या है. क्या सिर्फ कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाते हैं? तेल कंपनियां कीमतें कैसे तय करती हैं? और कच्चे तेल से पेट्रोल-डीजल के अलावा और क्या-क्या बनता है?

असल में पेट्रोल-डीजल की कीमत तय होने के पीछे एक लंबी आर्थिक प्रक्रिया होती है जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स, रिफाइनिंग लागत, ट्रांसपोर्ट और तेल कंपनियों के मार्जिन सभी शामिल होते हैं. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का 80-85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. यही कारण है कि वैश्विक बाजार में तेल की कीमत बढ़ते ही भारत की अर्थव्यवस्था पर उसका असर दिखाई देने लगता है.

कच्चा तेल क्या होता है और इसकी कीमत कैसे तय होती है

कच्चा तेल यानी क्रूड ऑयल वह प्राकृतिक हाइड्रोकार्बन मिश्रण है जिसे जमीन के नीचे से निकाला जाता है. इसे सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. पहले इसे रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाता है, जहां से पेट्रोल, डीजल, LPG और अन्य उत्पाद तैयार होते हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत आम तौर पर डॉलर प्रति बैरल में तय होती है. 1 बैरल में लगभग 159 लीटर कच्चा तेल होता है.

पूरी दुनिया में तेल की कीमत कई कारकों से प्रभावित होती है. इसमें वैश्विक मांग और सप्लाई; युद्ध, संघर्ष और जियो-पॉलिटिकल तनाव; तेल उत्पादक देशों की उत्पादन नीति और डॉलर की मजबूती या कमजोरी जैसे कारक शामिल हैं. अगर मध्य-पूर्व में युद्ध और भयावह रूप लेता है और इससे सप्लाई बड़े स्तर पर बाधित होती है तो कीमतें तेजी से बढ़ेंगी.

1 डॉलर प्रति बैरल बढ़ने से पेट्रोल-डीजल पर कितना असर

यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता है कि अगर कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो उसका असर आम आदमी की जेब पर कितना पड़ता है. आर्थिक जानकारों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमत 1 डॉलर प्रति बैरल बढ़ने से पेट्रोल-डीजल की लागत लगभग 50-60 पैसे प्रति लीटर तक बढ़ सकती है. अगर कीमत 10 डॉलर बढ़ जाए तो पेट्रोल-डीजल की लागत लगभग 5-6 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती है. हालांकि यह सीधा असर हमेशा पंप की कीमत पर नहीं दिखता क्योंकि सरकार और तेल कंपनियां कई बार कीमतों को नियंत्रित रखती हैं.

पेट्रोल-डीजल की कीमत तय कैसे होती है?

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत कई चरणों से गुजरती है. जब कच्चा तेल भारत आता है तो उसे रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाता है. इसके बाद विभिन्न लागतें और टैक्स जोड़कर अंतिम कीमत तय होती है. उदाहरण के तौर पर दिल्ली में पेट्रोल की कीमत के घटक इस प्रकार रहे हैं:
बेस प्राइस: करीब 54.84 रुपये प्रति लीटर
फ्रेट: करीब 0.24 रुपये
एक्साइज ड्यूटी: करीब 19.90 रुपये
डीलर कमीशन: करीब 4.39 रुपये
राज्य वैट: करीब 15.40 रुपये

इन सभी को जोड़कर पेट्रोल की कीमत लगभग 94-95 रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंचती है. इससे साफ है कि पेट्रोल-डीजल की की मत में टैक्स का हिस्सा बहुत बड़ा होता है.

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टैक्स की भूमिका

भारत में पेट्रोल-डीजल GST के दायरे में नहीं आते. इसलिए इन पर अलग-अलग टैक्स लगते हैं. केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती हैं तो राज्य सरकारें वैट. अब चूंकि हर राज्य का वैट अलग-अलग होता है इसलिए देश के विभिन्न शहरों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी अलग-अलग होती हैं. अमूमन पेट्रोल-डीजल की कीमत का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा टैक्स का होता है.

तेल कंपनियां कीमतें कैसे एडजस्ट करती हैं?

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत तय करने में मुख्य भूमिका तीन सरकारी कंपनियों की होती है. इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम.  ये कंपनियां ऑयल मार्केटिंग कंपनी कही जाती हैं. 2017 से भारत में डेली प्राइसिंग सिस्टम लागू है. इसका मतलब है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें रोज अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से बदल सकती हैं. लेकिन व्यवहार में कई बार कीमतें लंबे समय तक स्थिर रहती हैं. इसके पीछे कुछ अहम कारण होते हैं- एक, सरकार महंगाई नियंत्रित रखना चाहती है. दो, चुनावी या राजनीतिक कारण. तीन, कंपनियां कुछ समय तक घाटा सह लेती हैं. अगर कच्चे तेल की कीमत बढ़ जाए और पंप पर कीमत नहीं बढ़ाई जाए तो कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन कम हो जाते हैं.

तेल कंपनियों का मार्जिन कितना होता है?

तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल बेचने पर एक निश्चित मार्जिन मिलता है. कुछ जानकारों के अनुसार, पेट्रोल पर कंपनियों का मार्जिन 11 रुपये प्रति लीटर से अधिक और डीजल पर लगभग 8 रुपये प्रति लीटर तक रहा है. जब कच्चे तेल की कीमत कम होती है तो कंपनियों का मुनाफा बढ़ जाता है. लेकिन जब तेल महंगा हो जाता है और कीमत नहीं बढ़ाई जाती तो उनका मार्जिन घट जाता है.

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तेल कंपनियों को घाटा कैसे होता है?

अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हो जाए और घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर रखी जाएं तो तेल कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में, कंपनियों का मार्जिन शून्य या नकारात्मक हो सकता है. यानी प्रति लीटर घाटा भी हो सकता है. सरकार कई बार ऐसी स्थिति में कंपनियों को राहत देती है या बाद में कीमतें बढ़ाने की अनुमति देती है.

कच्चे तेल से पेट्रोल-डीजल के अलावा क्या बनता है?

कई लोगों को लगता है कि कच्चे तेल से सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही बनता है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है. कच्चा तेल आधुनिक उद्योगों में अहम भूमिका निभाता है. रिफाइनिंग प्रक्रिया में इससे कई उत्पाद निकलते हैं. जैसे- ईंधन उत्पाद, पेट्रोल, डीजल, LPG, एविएशन टरबाइन फ्यूल. औद्योगिक उत्पादों में इससे नैफ्था, पेट्रोकेमिकल्स, प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर. अन्य उत्पादों में बिटुमेन (सड़क निर्माण के लिए अलकतरा), लुब्रिकेंट्स, वैक्स, आदि. यानी हमारे रोजमर्रा के कई उत्पाद जैसे प्लास्टिक की बोतलें, कपड़े और सड़कें भी कच्चे तेल से जुड़ी होती हैं.

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तेल महंगा होने का अर्थव्यवस्था पर असर

तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता. इसका असर अन्य कई क्षेत्रों पर पड़ता है. सबसे पहले तो इसका असर महंगाई पर दिखना शुरू होता है. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं. इससे उद्योग जगत भी प्रभावित होता है क्योंकि यहां उत्पादन की लागत बढ़ जाती है. भारत का आयात बिल बढ़ जाता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश तेल विदेशों से खरीदता है. इसका असर रुपये की कीमत पर भी पड़ता है. तेल आयात के लिए डॉलर की जरूरत बढ़ती है जिससे रुपया कमजोर हो सकता है.

भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है. लेकिन देश की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अपने देश में तेल का घरेलू उत्पादन बहुत कम है जो हमारी दैनिक जरूरत को भी पूरा नहीं कर सकता ऐसे में हमारा देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है. इसलिए केंद्र सरकार कई कदम उठा रही है. ताकि तेल का रणनीतिक भंडारण किया जा सके. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर भी काम किया जा रहा है और देश में इलेक्ट्रिक ऊर्जा वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है. इन उपायों का उद्देश्य तेल आयात पर निर्भरता कम करना है.

लेखक के बारे में
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अभिजीत श्रीवास्तव
Assistant Editor, Digital Content
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