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मछलियों की ‘face recognition’, चीन ने तिब्बत की नदी पर लगाया AI सिस्टम Fish Face

तिब्बत की यारलुंग त्सांगपो नदी पर 11 साल पहले जंगमू हाइड्रोपावर स्टेशन चालू हुआ था. इसके बाद से चीन इसके बांध से गुजरने वाली मछलियों को ट्रैक कर रहा है- पहले मैनुअली और अब AI से.

मछलियों की ‘face recognition’, चीन ने तिब्बत की नदी पर लगाया AI सिस्टम Fish Face
तिब्बत की सबसे बड़ी नदी पर चीन ने लगाया ‘फिश फेस’ सिस्टम (फोटो- एनडीटीवी)

अब तक आपने सुना होगा कि इंसानों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI टेक्नोलॉजी की मदद से निगरानी रखी जा रही है. लेकिन चीन में कहानी इससे आगे बढ़ चुकी है. चीन अब तिब्बत की सबसे बड़ी नदी पर सिर्फ पानी और बिजली की निगरानी नहीं कर रहा, बल्कि यहां तैरने वाली मछलियों को भी AI से स्कैन कर रहा है. बांध के पास बने एक खास रास्ते से गुजरने वाली मछलियों की 24 घंटे निगरानी हो रही है. यहां तो AI सिस्टम इन मछलियों की पहचान ऐसे कर रहा है, जैसे इंसानों का 'फेशियल रिकग्निशन' किया जाता है. सवाल है कि ड्रैगन ऐसा क्यों कर रहा है?

चीन तिब्बत में क्या कर रहा है?

साउथ चाइना मॉर्निग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार चीन तिब्बत की सबसे बड़ी नदी पर बने एक बांध के फिशवे से गुजरने वाली मछलियों की प्रजातियों पर 24 घंटे नजर रखने के लिए AI वाले फिश आइडेंटिफिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है. इस रिपोर्ट में 'ग्लोबल टाइम्स' में छपी एक खबर का हवाला दिया गया है. उसके अनुसार पहले इस रास्ते की निगरानी मैनुअली होती थी यानी कि इंसानों द्वारा. लेकिन वह तरीका बहुत मेहनत वाला होता था. अब तिब्बत की खास प्रजातियों की मछलियों की पहचान करने के लिए AI-आधारित "फिश फेशियल रिकग्निशन" सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है.

2015 में यारलुंग त्सांगपो नाम की इस नदी के बीच के हिस्से में 116 मीटर ऊंचा जंगमू हाइड्रोपावर स्टेशन चालू हुआ था. इसमें मछलियों के आने जाने के लिए एक रास्त- फिशवे बनाया गया था. इसे फिश लैडर भी कहा जाता है. इस फिशवे ने लगभग 5,70,000 दुर्लभ मछलियों को नदी के बहाव की उल्टी दिशा में तैरने में मदद की है. इस AI स्कैन से यह ट्रैक किया जाता है कि किन किन प्रजातियों की मछली उलटी दिशा में जा रही हैं.

'ग्लोबल टाइम्स'  की रिपोर्टे के अनुसार इस बांध पर सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के डायरेक्टर यांग शियाओचेंग ने बताया कि निगरानी के नतीजों से पता चलता है कि यारलुंग त्सांगपो के बीच के हिस्से में मछलियों की आबादी बहुत स्थिर है और हाइड्रोपावर स्टेशन के निर्माण के कारण इसमें कोई कमी नहीं आई है. यांग ने आगे कहा, "इसके उलट, यारलुंग त्सांगपो नदी के पूरे बीच के घाटी वाले हिस्से में जलीय पारिस्थितिकी (इकोसिस्टम) और जीव-जंतुओं व वनस्पतियों में सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार हाइड्रोपावर वाले बांध मछलियों को उनके खाने और अंडे देने की जगहों के बीच प्राकृतिक प्रवास के रास्तों पर आने-जाने से रोक सकते हैं, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता सीमित हो जाती है.

काम की बात- यारलुंग त्सांगपो तिब्बत से निकलती है और अरुणाचल प्रदेश से होते हुए भारत में प्रवेश करती है, जहां इसे सियांग नदी के नाम से जाना जाता है. इसके बाद यह असम में ब्रह्मपुत्र नदी के रूप में बहती है, जो देश के करोड़ों भारतीयों के लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. चीन के इस प्रोजेक्ट पर भारत की करीबी नजर है. भारतीय अधिकारी ऐसी परियोजनाओं के निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं. जानकारों का कहना है कि नदी पर बड़े पैमाने पर बांध बनाने से पानी के प्राकृतिक बहाव, तलछट के बहाव की प्रक्रिया, पर्यावरण को नुकसान और निचले इलाकों में बाढ़ के पैटर्न में बदलाव हो सकता है.

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