- पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संघर्ष से दक्षिण एशिया में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका गहरा गई है
- अगर महाजंग छिड़ी तो असर दोनों देशों तक नहीं रहेगा बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए नया सिरदर्द बन जाएगा
- पाकिस्तान तो खस्ताहाल हो ही जाएगा, चीन से लेकर अमेरिका और भारत तक भी इसके असर से अछूते नहीं रहेंगे
पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने जिस तरह एकदूसरे पर हमले किए हैं, उससे दक्षिण एशिया में एक बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका गहरा गई है. वैसे तो दोनों के बीच छोटे-मोटे संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन अगर मामला बढ़ा और दोनों के बीच फुल स्केल वॉर छिड़ी तो इसका असर सिर्फ इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक नया सिरदर्द बन सकता है, आइए समझते हैं.
दुनिया की सुरक्षा को खतरा
युद्ध की स्थिति में सबसे बड़ा खतरा सीमा पर नियंत्रण खत्म होने का रहेगा. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच करीब 2600 किलोमीटर लंबी सीमा है. ये अलग बाद है कि इस डूरंड रेखा को अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कई तबके इसे नहीं मानते. लेकिन इतना साफ है कि अगर पूर्ण युद्ध छिड़ा तो सीमा को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाएगा और इसका फायदा उठाकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), इस्लामिक स्टेट-खोरासान (ISIS-K) और अल-कायदा जैसे संगठन अपनी गतिविधियां बढ़ाने की कोशिश करेंगे. इससे दुनिया के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा पैदा हो सकता है.

पाकिस्तान के लिए TTP सबसे बड़ा खतरा
एक दौर था जब पाकिस्तान ने तालिबान का पाला पोसा था और तालिबान काफी हद तक उसके ऊपर निर्भर रहा करता था. 2021 में जब तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आया तो पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वह तहरीके-तालिबान पाकिस्तान पर लगाम लगाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. TTP ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया. TTP के हमले 90% बढ़ गए हैं. इसका असर ये हुआ कि ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2025 के मुताबिक, पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आतंकवाद प्रभावित देश बन चुका है.
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कंगाल पाकिस्तान हो जाएगा खस्ताहाल
इस जंग का असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा. पाकिस्तान इस वक्त भीषण आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और डिफॉल्ट के कगार पर खड़ा है. युद्ध का भारी-भरकम खर्च उसकी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर देगा. उधर अफगानिस्तान में भी हालात बिगड़ेंगे. जंग का दायरा बढ़ते ही तालिबान को मिल रही सीमित अंतरराष्ट्रीय मदद भी बंद हो जाएगी. इसकी वजह से अफगानिस्तान में भीषण मानवीय संकट पैदा होने का खतरा रहेगा.

चंगुल में फंस सकती है मुनीर की सेना
अफगानिस्तान तालिबान के पास पाकिस्तान की तरह आधुनिक और बड़ी सेना नहीं है, लेकिन वो गुरिल्ला युद्ध में बेहतरीन माने जाते हैं. तालिबान की कोशिश रहेगी कि युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना को पहाड़ों और दुर्गम इलाकों में खींचकर ऐसा दलदल बना दिया जाए, जिससे निकलना मुनीर की सेना के लिए आसान नहीं होगा. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीधी जंग दशकों पुराने डूरंड रेखा विवाद को हिंसक बना सकता है. युद्ध के दौरान अगर पश्तून बहुल इलाकों में हिंसा बढ़ती है तो पाकिस्तान के अंदर अलगाववाद और पश्तूनिस्तान की मांग तेज हो सकती है.
अरबों डॉलर के चीनी निवेश पर खतरा
पाकिस्तान-अफगानिस्तान की जंग में सबसे ज्यादा चिंता चीन को रहेगी. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इसी इलाके के करीब से गुजरता है. इलाके में अस्थिरता का सीधा मतलब होगा चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का खतरे में पड़ना. जंग की नौबत आने से चीन का अरबों डॉलर का निवेश और उसके नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. चीन कभी नहीं चाहेगा कि उसका सदाबहार दोस्त पाकिस्तान ऐसी जंग में फंसे जो कभी खत्म न हो. ऐसे में वह मध्यस्थता का दबाव बना सकता है. सीजफायर की मांग करके उसने इसकी शुरुआत भी कर दी है.
भारत की रणनीतिक चिंताएं
युद्ध की वजह से पाकिस्तान को अपनी सेना का बड़ा हिस्सा अफगानिस्तान से लगी पश्चिमी सीमा पर लगाना होगा. इससे उसकी भारत के साथ लगी पूर्वी सीमा पर पकड़ कमजोर हो सकती है. ध्यान भटकाने के लिए वह भारत सीमा पर तनाव बढ़ाने की कोशिश भी कर सकता है. भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी होगी. पाकिस्तान का अपनी पश्चिमी सीमा पर उलझना भारत के लिए रणनीतिक राहत भले ही हो, लेकिन सीमापार घुसपैठ, आतंकियों का खतरा, क्षेत्र में बढ़ने वाली अस्थिरता चिंता बढ़ा सकता है.
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