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तारिक रहमान को बांग्लादेश में मिली जीत भारत के लिए क्या मायने रखते हैं?

बांग्लादेश में तारिक रहमान की जीत ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. भारत के लिए तारिक रहमान के जीत के मायने क्या हैं? क्या बांग्लादेश की नई सरकार भारत के साथ संबंध में स्थिरता लाएगी? निगाहें तारिक रहमान की नीति पर हैं.

तारिक रहमान को बांग्लादेश में मिली जीत भारत के लिए क्या मायने रखते हैं?
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  • तारिक रहमान की जीत के बाद भारत के लिए बांग्लादेश के रिश्ते में घुसपैठ, हिंदू समुदाय की सुरक्षा, व्यापार अहम.
  • पाकिस्तान और चीन की ओर बांग्लादेश के झुकाव की संभावना भारत के लिए रणनीतिक चिंता है.
  • ऐसे में ट्रेड और खास कर कपास का निर्यात भारत-बांग्लादेश रिश्ते में अहम आर्थिक आधार बने रहेंगे.
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बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमान की अगुवाई वाली बीएनपी जीत की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है. ‘डार्क प्रिंस' कहे जा रहे तारिक रहमान के बांग्लादेश की सत्ता में कदम किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. 60 साल के रहमान पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं. 2017 में भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में गिरफ्तारी के बाद वह मुश्किल हालात में देश छोड़कर चले गए थे. 17 साल तक निर्वासन में रहे और दिसंबर 2025 में अपनी मां खालिदा जिया के निधन से ठीक पहले ही वतन वापस लौटे. जब वे लौटे तो जबरदस्त भीड़ ने उनका जोरदार स्वागत किया. उन्होंने अमेरिकी नागरिक अधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग के ‘आई हैव अ ड्रीम' भाषण की तर्ज पर जवाब दिया. तब उन्होंने कहा था, “... मेरे पास बांग्लादेश के लिए एक योजना है,” और इसी के साथ बीएनपी के चुनाव अभियान की शुरुआत की. अब भारत, बाकी दक्षिण एशिया और अमेरिका उस योजना के सामने आने का इंतजार कर रहे हैं.

नई सरकार के गठन के बाद भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की सुबह ही बांग्लादेश के नए नेता को बधाई देकर पहल की. भारत की ओर से यह बधाई संदेश चीन या पाकिस्तान से भी पहले दिया गया. जानकारों का मानना है कि ढाका को लेकर किसी भी खींचतान में यह कदम अहम हो सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान और उनकी पार्टी को “गरमजोशी भरी बधाई” दी और कहा कि यह जीत बांग्लादेश की जनता के उनके नेतृत्व पर भरोसे को दिखाती है. उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि भारत एक “लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश” का समर्थन करेगा.

नई सरकार के लिए यह एक सामान्य संदेश था, लेकिन इसके पीछे साफ संकेत था. भारत चाहता है कि पिछले 18 महीनों की उथल-पुथल को पीछे छोड़कर, जिसमें बांग्लादेश का चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ता संपर्क और हिंदू अल्पसंख्यकों की हत्याएं शामिल रहीं, एक स्थिर और कामकाजी रिश्ता बनाया जाए ताकि दशकों पुराना सहयोगी साथ बना रहे.

भारत क्या देख रहा है?

भारत इस चुनाव पर करीबी नजर रखे हुए था क्योंकि नई सरकार का रुख दक्षिण एशिया की राजनीति और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है. नई दिल्ली के नजरिए से तीन जुड़े हुए मुद्दे हैं. सबसे बड़ा मुद्दा पाकिस्तान-चीन-बांग्लादेश जुगत की संभावना है. अगर नई सरकार की विदेश नीति शेख हसीना सरकार से कम भारत समर्थक हुई तो यह समीकरण बदल सकता है. ऐसा गठजोड़ दक्षिण एशिया में भारत की मजबूत पकड़ पर नकारात्मक असर डाल सकता है.

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दूसरा मुद्दा सीमा और आंतरिक सुरक्षा का है. अवैध घुसपैठ, खासकर पश्चिम बंगाल और असम चुनाव से पहले, बड़ा राजनीतिक मुद्दा है. शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद वहां भड़की हिंसा में हिंदू विरोधी भावनाएं भी उभरीं थीं.

तीसरा अहम पहलू व्यापार का है, हालांकि यह अन्य दोनों की तुलना में कम अहमियत रखता है, क्योंकि भारत के पास करीब 10 बिलियन डॉलर का सरप्लस है और वह बांग्लादेश की रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री को 80 फीसद से अधिक कच्चे कॉटन की आपूर्ति करता है. बता दें कि बांग्लादेश की रेडीमेट गारमेंट इंडस्ट्री उसकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बड़ा किरदार रखती है.

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बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और भारत का रुख

शेख हसीना के दौर में दिल्ली और ढाका के रिश्ते स्थिर माने जाते थे. अवामी लीग की नेता शेख हसीना की सरकार को भारत समर्थक माना जाता था और उसने व्यापार, परिवहन, सीमा सुरक्षा और जल बंटवारे पर ध्यान दिया. हालांकि जानकारों का कहना है कि दिल्ली ढाका में नेतृत्व परिवर्तन को स्वीकार कर चुकी है. बीएनपी की सरकार भारत के लिए बहुत बड़ी चिंता नहीं मानी जा रही. रहमान ने कहा है कि वह भारत के हितों का सम्मान करेंगे. इसे उनकी मां की ‘बांग्लादेश फर्स्ट' नीति से अलग संकेत माना जा रहा है. फिलहाल स्थिति ‘इंतजार करने और नजरें बनाए रखने' की है. 

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पाकिस्तान-चीन के साथ बांग्लादेश के संबंध

भारत के लिए राहत की बात यह है कि जमात-ए-इस्लामी इस बार गठबंधन में शामिल नहीं है और बीएनपी स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ रही है. अगर सरकार में जमात शामिल होती तो भारत-बांग्लादेश संबंध अस्थिर हो सकते थे. इससे बांग्लादेश पाकिस्तान के और करीब जा सकता था और पूर्वोत्तर भारत के लिए सुरक्षा चुनौती बढ़ सकती थी. ऐसी अस्थिरता से चीन को भी फायदा मिल सकता था, खासकर अरुणाचल प्रदेश पर उसके दावों के संदर्भ में.

हालांकि बिना जमात के रहमान सरकार भारत के प्रति कम टकराव वाला रुख अपना सकती है. यह रिश्ता संभवतः ज्यादा लेन-देन आधारित हो. वहीं, पाकिस्तान के साथ व्यापारिक या रक्षा समझौतों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. हाल में जेएफ-17 लड़ाकू विमान को लेकर बातचीत की खबरें आई थीं, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई है.

दूसरी तरफ, चीन वहां पहले से ही बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश कर चुका है, जैसे मोंगला पोर्ट का आधुनिकीकरण. जानकार इसे चीन की रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखते हैं. श्रीलंका और पाकिस्तान में भी चीन की ऐसी सुविधाएं हैं, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी पकड़ बढ़ रही है.

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भारत की सीमा से जुड़ी चिंताएं

रहमान सरकार सीमा नियंत्रण पर कितनी सख्ती दिखाएगी, यह भारत के लिए अहम है. अवैध घुसपैठ, सीमा पार हत्याएं और ड्रग तस्करी जैसे मुद्दे घरेलू राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं. भारत और बांग्लादेश के बीच 4100 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो घनी आबादी और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. जुलाई 2024 के बाद 1000 से ज्यादा घुसपैठ की कोशिशों के संकेत मिले हैं.

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हिंदू समुदाय की चिंता

शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हमलों में तेजी आई. कुछ रिपोर्टों में 2000 से ज्यादा हमलों का जिक्र है, जिनमें घर, व्यापार और मंदिर निशाना बने. हजारों लोग भागने को मजबूर हुए. मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने भी स्वीकार किया था कि मौतें हुई हैं, लेकिन कहा कि ज्यादातर मामले जमीन विवाद या निजी दुश्मनी से जुड़े थे. भारत का कहना है कि हसीना के जाने के बाद कम से कम 23 हिंदुओं की हत्या हुई है और उसने कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा की मांग की है. तारिक रहमान ने सुरक्षा का भरोसा दिया है, लेकिन बीएनपी का परंपरागत झुकाव रूढ़िवादी तत्वों की ओर रहा है, जिस पर भारत की नजर रहेगी.

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भारत के साथ व्यापार पर असर

दोनों देशों के बीच सालाना 14 अरब डॉलर का व्यापार है. इससे भारत को करीब 10 अरब डॉलर का सरप्लस मिलता है. बांग्लादेश का वस्त्र उद्योग भारतीय कपास पर काफी हद तक निर्भर है. अगर बांग्लादेश ने इसके लिए चीन की ओर झुकाव दिखाया तो भारतीय निर्यात, खासकर कपास के किसानों पर इसका असर देखने को मिल सकता है. लेकिन नई सरकार आर्थिक स्थिरता और भरोसेमंद सप्लाई को प्राथमिकता दे सकती है, जिससे भारतीय निर्यात को फायदा भी हो सकता है.

कुल मिलाकर भारत का फोकस नई सरकार की क्षमताएं और उसके इरादे पर है. भारत के साथ उसके संबंधों की अहमियत खास तौर पर सीमा नियंत्रण, घुसपैठ रोकने और दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने पर उसकी ओर से सहयोग कितना मजबूत रहता है, यही अहम होगा.

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