- युद्धविराम की बातें जारी हैं, लेकिन अमेरिका और ईरान दोनों सैन्य कार्रवाई भी जारी रखे हुए हैं.
- विवाद सिर्फ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का नहीं, बल्कि परमाणु कार्यक्रम और भरोसे का भी है.
- तेल, महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस तनाव का असर भारत तक महसूस हो सकता है.
मिडिल ईस्ट में एक बार फिर वही सवाल गूंज रहा है. अगर अमेरिका और ईरान बातचीत कर रहे थे, तो फिर मिसाइलें क्यों चल रही हैं? अगर युद्धविराम हुआ था, तो फिर ये नए हमले क्यों हो रहे हैं? और अगर दोनों देश खुली जंग नहीं चाहते, तो तनाव लगातार बढ़ क्यों रहा है? इन सवालों के जवाब के पीछे कई ऐसी परतें हैं, जो पिछले कई दशकों में बनती गई हैं. यही वजह है कि बातचीत के बावजूद हालात बार-बार बिगड़ रहे हैं.
ताजा घटनाक्रम क्या है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को तुर्की के अंकारा में नेटा की एक बैठक के दौरान कहा कि ईरान के साथ सीजफायर खत्म हुआ. उन्होंने कहा, जहां तक मेरी चिंता है ईरान के साथ हुआ युद्धविराम अब खत्म हो चुका है. उनके (ईरानियों के) साथ डील करना समय की बर्बादी है. हम अपने शानदार मध्यस्थों को, अगर वो चाहें तो, बात करने दूंगा. लेकिन मुझे इसकी गुंजाइश नहीं लगती है. "
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका फिर ईरान पर हमले करेगा. ट्रंप के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी सेना ने ईरान में नए सैन्य हमले किए.
अमेरिकी सेना (यूएस सेंट्रल कमांड) का कहना है कि इन हमलों का मकसद ईरान की उस क्षमता को कमजोर करना है, जिससे वह होर्मुज स्ट्रेट में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को खतरे में डाल सकता है.
दूसरी तरफ ईरानी सरकारी मीडिया ने दक्षिणी ईरान के तटीय इलाकों में कई जगहों पर धमाके की खबरों की पुष्टि की है. जिन जहगों का नाम उसने बताया उनमें बंदर अब्बास, सीरिक और बुशहर जैसे इलाके शामिल हैं.
ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि लड़ाई के इस ताजा दौर में 14 लोग मारे गए हैं.
मंत्रालय में जनसंपर्क विभाग के प्रमुख हुसैन केरमानपुर का कहना है कि 8 और 9 जुलाई को ईरान के पांच प्रांतों को निशाना बनाकर किए गए अमेरिकी हमलों में 78 लोग घायल भी हुए हैं. उन्होंने बताया कि घायलों में से 47 लोग अभी भी अस्पताल में हैं.
इस बीच, सेंट्रल कमांड ने कहा कि उसके सैनिकों ने मंगलवार को 80 से अधिक टारगेट हिट किए. इसमें ईरान की एयर डिफेंस सिस्टम, तटीय रडार के ठिकाने और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के 60 से अधिक छोटे नावों को निशाना बनाने की बात कही गई है.

गश्त करते अमेरिकी वायुसेना के विमान
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अब जबकि बातचीत थमी हुई है और दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई बढ़ती जा रही है तो क्या इसके पीछे केवल होर्मुज स्ट्रेट ही वजह है या कुछ और?
तो बता दें कि होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ इस संघर्ष का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा है. असल लड़ाई उससे कहीं बड़ी है.
अमेरिका चाहता है कि दुनिया की सबसे अहम समुद्री तेल सप्लाई बिना किसी खतरे के चलती रहे. ईरान मानता है कि उस पर लगातार आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है. यही टकराव बार-बार सामने आ रहा है.
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होर्मुज स्ट्रेट
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होर्मुज इतना अहम क्यों है?
दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है. खाड़ी के कई बड़े तेल उत्पादक देशों का कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती है.
अगर यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो सबसे पहले तेल महंगा होता है. तेल की कीमतें बढ़ने से उसका परस्पर असर अन्य चीजों की कीमतों पर पड़ता है, महंगाई बढ़ जाती है.
फिर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है.
यानी ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा यह युद्ध भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहा है और अगर यह आगे भी चलता रहा तो इसके दूरगामी नकारात्मक असर देखने को मिलेंगे इसकी आशंका दुनिया के हर आर्थिक विशेषज्ञ पहले ही जता चुके हैं.
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अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से पहले, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस: बातचीत के बाद भी अमेरिका और ईरान किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए
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ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत सफल क्यों नहीं हो पा रही?
इसकी सबसे बड़ी वजह एक-दूसरे के ऊपर भरोसे की कमी है. अमेरिका को लगता है कि ईरान बातचीत के साथ-साथ अपनी सैन्य ताकत भी बढ़ा रहा है. वहीं ईरान आरोप लगाता है कि अमेरिका दबाव और प्रतिबंधों की नीति नहीं छोड़ना चाहता. यही अविश्वास हर बार बातचीत को कमजोर कर देता है और फिर हमले शुरू हो जाते हैं.
अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद केवल अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखना नहीं है. वह साथ ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर शुरू से ही चिंता जताता रहा है और यही वजह बना कर उसने 28 फरवरी से हमले भी शुरू किए थे.
ट्रंप ये चाहते हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर ऐसी शर्तें माने, जिनसे भविष्य में उसके परमाणु हथियार बनाने की सारी आशंका ही खत्म हो जाए.
वहीं ईरान ये बार-बार दोहराता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. यही दोनों के बीच मतभेद का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है.

ट्रंप लगातार बयान क्यों बदलते रहे हैं?
हाल के दिनों में डोनाल्ड ट्रंप के बयान लगातार बदलते दिखे हैं. कभी वो कहते हैं कि सीजफायर खत्म हो चुका है, तो कभी बोलते हैं कि अमेरिका लंबी जंग नहीं चाहता. लेकिन साथ ही वो यह भी कहते हैं कि जरूरत पड़ी तो अमेरिका फिर हमले करेगा. वो यह भी कह चुके हैं कि शायद किसी समझौते की जरूरत ही नहीं है. उनके लगातार बदलते बयानो से पूरी दुनिया चिंतित हैं क्योंकि इससे दुनिया के विभिन्न बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है.
हालांकि जानकारों का यह भी मानना है कि ट्रंप ये बयान महज ईरान पर दबाव बनाने के लिए दे रहे हैं.
क्या युद्ध होगा या मिसाइल हमले ऐसे ही चलते रहेंगे?
फिलहाल इसका सीधा जवाब देना मुश्किल है. अमेरिका कह रहा है कि वह लंबी लड़ाई नहीं चाहता. लेकिन लगातार जवाबी हमले यह भी दिखा रहे हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव खत्म नहीं हुआ है. यही सबसे बड़ा खतरा है. अगर किसी एक हमले में ज्यादा नुकसान होता है या किसी तीसरे देश की सेना इसमें उलझ जाती है, तो हालात तेजी से बदल सकते हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ
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संयुक्त राष्ट्र क्यों चिंतित है?
संयुक्त राष्ट्र ने दोनों पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य कार्रवाई अब तक हुई कूटनीतिक प्रगति को पटरी से उतार सकती है. संयुक्त राष्ट्र ने नागरिकों और नागरिक ढांचे की सुरक्षा पर भी जोर दिया है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगेलमैन बार-बार कहते रहे हैं कि, "मध्य-पूर्व में सिर्फ सैन्य कार्रवाई से स्थायी समाधान नहीं निकल सकता. अंत में बातचीत की मेज पर लौटना ही होगा."
क्विंसी इंस्टीट्यूट में इंटरनैशनल रिलेशन लेखक और राजनीतिक विश्लेषक त्रिता पारसी कहते हैं कि, "अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ी समस्या भरोसे की है. जब तक यह नहीं बदलता, कोई भी समझौता टिकाऊ नहीं होगा."
इंटरनैशन क्राइसिस ग्रुप के मुताबिक होर्मुज में किसी भी सैन्य गलती का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है.

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दुनिया की अर्थव्यवस्था परेशान क्यों?
जैसे ही नए हमलों की खबर आई, दुनिया भर के बाजारों में उतार चढ़ाव बढ़ गया. ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला. तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ, बिजली, विमान सेवाएं और उद्योग सभी प्रभावित होते हैं. यानी मिडिल ईस्ट का तनाव पूरी दुनिया की महंगाई बढ़ा सकता है.
भारत पर इसका क्या असर हो सकता है?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. हालांकि मार्च, अप्रैल, मई के दौरान जब ईरान और अमेरिका उलझे हुए थे, तब भारत के पेट्रोलियम मंत्रालय ने लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि देश के पास समुचित ऑयल रिजर्व मौजूद है. हालांकि, इसके बावजूद पेट्रोल, डीजल की कीमतों में इजाफा किया गया.
अब अगर ये दोनों देश फिर उलझे और होर्मुज में लंबे समय तक तनाव बना रहा तो सेल की सप्लाई पर असर पड़ेगा और साथ ही भारत का तेल आयात महंगा हो सकता है. इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें, महंगाई और सरकार के आयात बिल पर असर पड़ सकता है. यही वजह है कि भारत लगातार बातचीत और तनाव कम करने की अपील करता रहा है.
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