- अमेरिका-ईरान का सीजफायर 21 दिन भी नहीं टिक सका, दो दिन से दोनों देश एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं
- अगर दोनों जवाबी हमला करते रहे तो आगे बढ़कर तनाव बढ़ने पर पूर्ण युद्ध (फुल स्केल वॉर) का खतरा हो सकता है
- ईरान के कड़े रुख के सामने पीछे हटना भी मुश्किल, तेहरान जब चाहे तक होर्मुज पर अपना मनचाहा दबदबा बना सकता है
अमेरिका और ईरान के बीच का सीजफायर 21 दिन भी नहीं टिक सका. दोनों देश पिछले दो दिनों से एक दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस जंग से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन फिर से शुरू हमलों ने एक बार फिर इस राह में नई बाधा खड़ी कर दी है. ट्रंप खुद कह चुके हैं कि दोनों देशों के बीच की अंतरिम डील यानी MOU में तय 60 दिन का सीजफायर खत्म हो गया है. अमेरिकी अधिकारी कह रहे हैं कि यह हमले महीनों तक चल सकते हैं. यह स्थिति ट्रंप को परेशान करेगी क्योंकि उन्हें सामने मिडटर्म इलेक्शन दिख रहा है. ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप के पास अब बहुत कम विकल्प बचे हैं.
ट्रंप के लिए एक तरफ पहाड़, दूसरी तरफ खाई
3 हफ्ते पहले तक किसी तरह जंग खत्म करने और वार्ता की मेज पर जाने को हर कोशिश करते डोनाल्ड ट्रंप फिर से फायर मोड में हैं. अमेरिका ने ईरान पर आरोप लगाया कि वह होर्मुज में तेल टैंकरों पर हमला कर रहा है और फिर अमेरिकी सेना ने हमले शुरू कर दिए. ट्रंप ने कह दिया है कि ईरान के हर एक हमले पर अमेरिकी सेना 20 हमले करेगी. ऐसे में रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर दोनों देश एक-दूसरे पर ऐसे ही जवाबी हमला करते रहे तो आगे बढ़कर तनाव बढ़ने पर पूर्ण युद्ध (फुल स्केल वॉर) का खतरा हो सकता है. अगर ट्रंप फ्लावर मोड में जाकर ईरान के कड़े रुख के सामने पीछे हटते हैं तो इससे तेहरान में बैठी इस्लामिक सरकार को यह लग सकता है कि वह जब चाहे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल-शिपिंग रास्ते यानी होर्मुज पर अपना दबदबा बना सकता है.
ट्रंप शायद उम्मीद कर रहे हों कि ईरान पर बमबारी करके वे उसे परमाणु वार्ता की मेज पर वापस ला सकते हैं और दबाव में अपनी चाहत वाली डील करा सकते हैं. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने को ट्रंप ने अपनी जंग का अपना मुख्य मकसद बनाया था. लेकिन ज्यादातर एक्सपर्ट्स को इस बात के बहुत कम संकेत दिखते हैं कि तेहरान वैसी बड़ी रियायतें देगा जैसी ट्रंप चाहते हैं.
दबाव में ट्रंप
ट्रंप एक बार फिर जंग से बाहर निकलने की योजना बनाएंगे. वजह है कि उनपर एक ऐसी लड़ाई को हमेशा के लिए खत्म करने का दबाव है, जिसमें हजारों लोग मारे गए हैं, खुद अमेरिका को आर्थिक नुकसान हुआ है, वहां तेल-गैस की महंगाई चरम पर पहुंच गई और नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से कुछ महीने पहले ही उनकी अप्रूवल रेटिंग गिर गई है. 23 जून के रॉयटर्स/ इप्सोस पोल से पता चला कि ट्रंप की रेटिंग गिरकर 34% हो गई है, जो उनके दूसरे कार्यकाल के सबसे निचले स्तर पर है. अगर ट्रंप को चुनावों में झटका लगता है तो इससे संसद में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का कंट्रोल चला जाएगा.
अभी के लिए ज्यादातर एनालिस्ट्स को इस बात पर शक है कि दोनों पक्ष MoU में तय 60 दिनों की बातचीत की समय-सीमा के अंदर कोई ठोस समझौता कर पाएंगे. खासकर जब ऐसी लड़ाई फिर से शुरू हो गई है. अभी के लिए बातचीत का अगला दौर कब होगा, यह भी पक्का नहीं है. अब ट्रंप फायर बने रहते हैं या फ्लावर मोड में जाने को मजबूर होंगे, यह देखने वाली बात होगी. फैसला उनका चाहे जो भी हो, सच्चाई यह है कि उनके पास सीमित और ज्यादातर बुरे विकल्प ही हैं.
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