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अमेरिका ने जबरदस्ती पाकिस्तान को बिचौलिया बनने पर किया मजबूर? सीजफायर में शहबाज नहीं, मुनीर को बनाया 'डाकिया'

US Iran Ceasefire Deal: फाइनेंशियल टाइम्स ने बातचीत से जुड़े लोगों के हवाले से बताया कि अमेरिका ने पाकिस्तान पर जोर डाला कि वह डोनाल्ड ट्रंप सरकार का प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाए.

अमेरिका ने जबरदस्ती पाकिस्तान को बिचौलिया बनने पर किया मजबूर? सीजफायर में शहबाज नहीं, मुनीर को बनाया 'डाकिया'
US Iran Ceasefire Deal: अमेरिका और ईरान के सीजफायर में पाकिस्तान की क्या भूमिका थी
  • अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव डाला था कि ईरान के साथ अस्थायी युद्धविराम कराने में मदद करे और प्रस्ताव पहुंचाए
  • पाकिस्तान की मध्यस्थता उसकी कूटनीतिक ताकत के कारण नहीं बल्कि मुस्लिम पड़ोसी होने की वजह से चुनी गई थी- रिपोर्ट
  • पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत में प्रमुख भूमिका निभाई थी

US Iran Ceasefire Deal: पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर कराने वाले शांतिदूत दिखाने की कोशिश की. लेकिन फाइनेंशियल टाइम्स की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, असल में व्हाइट हाउस ने ही पाकिस्तान पर दबाव डाला था कि वह ईरान के साथ अस्थायी सीजफायर कराने में मदद करे. इस रिपोर्ट ने पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति स्वतंत्र है या नहीं, इसपर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामाबाद कोई तटस्थ मध्यस्थ नहीं था, बल्कि अमेरिका के लिए सीजफायर प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का एक सुविधाजनक जरिया भर था.

फाइनेंशियल टाइम्स ने बातचीत से जुड़े लोगों के हवाले से बताया कि अमेरिका ने पाकिस्तान पर जोर डाला कि वह वॉशिंगटन का प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाए. इसका मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच सिर्फ एक मैसेज पहुंचाने वाला बन गया, न कि एक सक्रिय और तटस्थ भागीदार.

पाकिस्तान को अमेरिका ने क्यों चुना?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सबसे पहले सार्वजनिक रूप से दो हफ्ते के युद्धविराम का सुझाव दिया था. लेकिन रिपोर्ट बताती है कि इस प्रक्रिया में शहबाज लगभग दर्शक बनकर रह गए. इस दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने मुख्य भूमिका निभाई और उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों के साथ कई जरूरी बातचीत की. इनमें डोनाल्ड ट्रंप, जेडी वेंस और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ शामिल थे.

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की मध्यस्थता उसकी कूटनीतिक ताकत की वजह से नहीं थी. बल्कि यह सोचकर उसे चुना गया कि अगर किसी मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश के जरिए प्रस्ताव दिया जाएगा तो ईरान के उसे स्वीकार करने की संभावना ज्यादा होगी.

सोशल मीडिया पर जल्दबाजी में क्रेडिट लेने की कोशिश में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की एक गलती ने भी दिखा दिया कि इस समझौते पर उनका नियंत्रण सीमित था. शरीफ ने इस समझौते को पाकिस्तान की पहल बताया, लेकिन गलती से अपने पोस्ट के ऊपर यह लिखा छोड़ दिया था: “ड्राफ्ट — पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का एक्स पर मैसेज”

लेबनान सीजफायर में शामिल है या नहीं- पाकिस्तान दबाव में

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि युद्धविराम में लेबनान भी शामिल है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों ने इस बयान को खारिज कर दिया, जिससे इजरायल को हिजबुल्लाह के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखने की अनुमति मिल गई. इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत इस विकेंड इस्लामाबाद में होने वाली है. यहां दोनों पक्ष सीधे बातचीत करेंगे, जिसका उद्देश्य युद्ध शुरू होने के बाद से कई हफ्तों से चल रही जंग को खत्म करना है.

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