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This Article is From Oct 13, 2025

मरने के बाद डेडबॉडी बनकर घर में रहते हैं साथ… एक देश के खास समुदाय का यह रहस्‍य डरा देगा

इस समुदाय में अंतिम संस्कार एक उत्सव होता है, जबकि दुनिया के बाकी हिस्सों में इसे कई संस्कृतियों के लोग शोक की अवधि के तौर पर मानते हैं.

मरने के बाद डेडबॉडी बनकर घर में रहते हैं साथ… एक देश के खास समुदाय का यह रहस्‍य डरा देगा
  • इंडोनेशिया के टोरजा समुदाय में मृतकों के शवों को सुरक्षित रखा जाता है, न कि दफनाया या जलाया जाता है.
  • इस समुदाय में अंतिम संस्कार महंगा होता है इसलिए शवों को ममी बनाकर खास स्थानों पर रखा जाता है.
  • अंतिम संस्कार एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है जिसमें मृतकों को भोजन और कपड़े देने की परंपरा होती है.
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नई दिल्‍ली:

कई संस्‍कृतियों में जब किसी की मृत्‍यु होती है तो या तो उसके शव को जला देते हैं या फिर दफना दिया जाता है. अगर हम आपको बताएं कि दुनिया के एक देश में ऐसा कुछ नहीं होता बल्कि यहां पर किसी की मौत होने पर उसके शव को सुरक्षित रखा जाता है तो! आपको सुनकर थोड़ा सा अजीब लगेगा लेकिन इंडोनेशिया के टोरजा समुदाय में आज भी किसी की मृत्‍यु होने पर उसका शव संभालकर रखा जाता है. सुनकर आपको थोड़ा डर लगे और हो सकता है शॉक भी लेकिन इस समुदाय के लोग मानते हैं कि मौत किसी की जिंदगी का अगला पड़ाव होती है और यह एक महान यात्रा है. 

शवों को बना देते हैं ममी 

अगर आप कभी इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी प्रांत की एक जगह ताना तोराजा रीजेंसी जाएं तो आपको जिंदा लोगों के बीच मरे हुए लोगों को भी देखने का मौका मिलेगा. दरअसल शवों को संभालकर रखने की एक और वजह है. इस क्षेत्र में अंतिम संस्कार बहुत महंगा है और काफी पैसे खर्च हो जाते हैं. लागत इतनी ज्‍यादा है कि कुछ लोग अपनी पूरी जिंदगी पैसे और बाकी करेंसी जुटाने में लगा देते हैं. जब तक वह कीमत पूरी नहीं हो जाती तब तक शवों को ममी बनाकर टोंगकोनान नामक खास जगहों पर रखा जाता है. 

मृतकों के साथ रहने की संस्कृति

इस समुदाय में अंतिम संस्कार एक उत्सव होता है, जबकि दुनिया के बाकी हिस्सों में इसे कई संस्कृतियों के लोग शोक की अवधि के तौर पर मानते हैं. तोराजा जनजाति मृतकों के लिए शोक मनाती है लेकिन साथ ही उनके शरीर को ममी भी बनाती है. यहां पर लोग शवों के साथ बात करते हैं. उन्‍हें हर दो साल में भोजन कराना और कपड़े पहनाना तक परंपराओं में शामिल है. इन परंपराओं का मकसद उन्हें युवा पीढ़ी से दोबारा मिलवाना है और ये ऐसी परंपराएं हैं जिन्‍हें हर हाल में करना ही होता है. किसी भी व्यक्ति की मौत पर यहां के कुछ परिवार तो अंतिम संस्कार तक, जिसमें कई साल लग सकते हैं, शवों को अपने घर में रखते हैं. मृत्यु और अंतिम संस्कार के बीच, परिवार अक्सर शवों को खोदकर निकाला जाता है.  

महंगा होता है अंतिम संस्‍कार 

इस प्रांत का दौरा करने वाले ट्रैवल ब्लॉगर्स की मानें तो अंतिम संस्कार की लागत 500,000 डॉलर तक हो सकती है. बात यहीं खत्म नहीं होती, अंतिम संस्कार एक उत्सव की तरह होता है. यह आमतौर पर पांच दिनों का कार्यक्रम होता है जिसमें परिवार को एक निश्चित संख्या में भैंसों और सूअरों की बलि देनी होती है, सैकड़ों मेहमानों को खाना खिलाना होता है. साथ ही मृतकों के लिए एक नई जगह (झोपड़ी) बनाकर अंतिम संस्कार के दौरान उसे जलाना होता है. इन सबमें अंतिम संस्कार तक ममी को दफनाने और उसकी देखभाल का खर्च शामिल नहीं है. 

कभी-कभी, लोग मृतकों को सुरक्षित रखते हैं, ताकि परिवार के किसी अन्य सदस्य की मृत्यु होने तक वे अंतिम संस्कार के खर्च को कम कर सकें. उदाहरण के लिए अगर किसी पुरुष या महिला की मृत्यु उनके साथी के जीवित रहते हुए हो जाती है तो वे शव को तब तक सुरक्षित रखते हैं जब तक कि उनका जीवनसाथी उनके साथ परलोक यात्रा या पूया में शामिल न हो जाए. 

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