अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आजकल चीन के दौरे पर हैं. गुरुवार को उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक की. चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी 'शिन्हुआ' के मुताबिक दोनों नेताओं ने एक बंद कमरे में मुलाकात की. इस दौरान जिनपिंग ने ट्रंप को चेतावनी दी कि ताइवान को लेकर मतभेद दोनों देशों के बीच टकराव या संघर्ष का कारण बन सकते हैं. जिनपिंग ने कहा कि अगर ताइवान का मामला अच्छी तरह से संभाला जाए तो अमेरिका-चीन संबंध स्थिर रहेंगे. आइए जानते हैं कि क्या है ताइवान का मामला, जिसकी वजह से जिनपिंग ने ट्रंप को धमकी तक दे डाली. दरअसल ताइवान को अमेरिका-चीन के रिश्तों में विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा माना जाता है.
क्या अलग-अलग देश हैं ताइवान और चीन
ताइवान को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना (आरओसी) कहा जाता है. यह एक द्वीप है. इसे ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) चीन से अलग करता है. ताइवान की आबादी करीब 2.3 करोड़ है. ताइवान को लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई एक सरकार चलाती है. चीन और ताइवान कई मायनों में एक जैसे हैं. उनका इतिहास, भाषा और संस्कृति साझा है. लेकिन पिछले करीब आठ दशक में ताइवान कई मायनों में चीन से अलग बन गया है. एक तरफ जहां चीन कम्युनिस्ट शासन वाला देश है, वहीं ताइवान एक स्वशासित द्वीप और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाला समृद्ध लोकतंत्र है.चीन के उलट ताइवान में लोगों के पास अभिव्यक्ति का आजादी अधिक है. ताइवान एक आर्थिक महाशक्ति है, जिसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी दुनिया में सबसे अधिक है.
ताइवान के नेताओं में द्वीप की स्थिति और चीन के साथ संबंधों को लेकर राय बंटी हुई है. कुछ नेता ताइवान को चीन का हिस्सा नहीं मानते हैं, वहीं कुछ नेता चीन के दावे से सहमति जताते हैं. अलग-अलग विचार हैं. मेनलैंड चीन को आधिकारिक रूप से पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) कहा जाता है.'पीआरसी' और 'आरओसी' एक-दूसरे की संप्रभुता को मान्यता नहीं देते. दोनों खुद को आधिकारिक चीन मानते हुए मेनलैंड चीन और ताइवान द्वीप का आधिकारिक प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं.

चीन ने कभी ताइवान पर शासन तो नहीं किया, लेकिन वह उसे अपना अलग हुआ हिस्सा मानता है. वह ताइवान को मेनलैंड चीन के साथ फिर जोड़ना चाहता है. चीन का कहना रहा है कि वह ताइवान को मेनलैंड चीन के साथ शांति से जोड़ना चाहता है. लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो बल प्रयोग से भी बाज नहीं आएगा. हाल के सालों में चीन और ताइवान में तनाव काफी बढ़ा है. चीन ने ताइवान के आसपास आक्रामक सैन्य गतिविधियां तेज की हैं.
चीन से राष्ट्रवादियों का पलायन
बीसवीं सदी की शुरूआत में चीन में चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग (केएमटी) पार्टी की सरकार थी. इस सरकार के खिलाफ कम्युनिस्टों ने बगावत कर दी थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चियांग काई शेक राष्ट्रवादी सरकार अमेरिका के साथ थी. युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका ने माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी की सेना के खिलाफ लड़ाई में चियांग का समर्थन किया. इस लड़ाई में कम्युनिस्टों की जीत हुई.कम्युनिस्टों ने 1949 में मेनलैंड चीन पर नियंत्रण स्थापित किया. कम्युनिस्टों ने राष्ट्रवादी सरकार को ताइवान भागने पर मजबूर कर दिया. राष्ट्रवादियों ने ताइवान में निर्वासित सरकार बनाई. वहीं से वे चीन पर अपना दावा करते रहे. वहीं चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन वाले चीन का कहना रहा है कि 'एक ही चीन' है और ताइवान उसका हिस्सा है.
दोनों देशों ने विवाद के समाधान के लिए 1992 में सहमति बनाई. इसे '1992 Consensus' कहा जाता है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का मानना है कि 1992 की सहमति का मतलब है कि दोनों पक्ष एक ही चीन का हिस्सा हैं. वहीं ताइवान की कुओमिनतांग (केएमटी) पार्टी रिपब्लिक ऑफ चाइना (आरओसी) ही एक चीन है. केएमटी 1949 में मेनलैंड चीन से भाग कर ताइवान आए नेताओं की पार्टी है. यह पार्टी ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करती है. वह चीन से करीबी संबंधों की समर्थक है. वहीं केएमटी की प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के मुताबिक ताइवान पहले से ही रिपब्लिक ऑफ चीन के नाम से एक संप्रभु और स्वतंत्र देश है, इसलिए उसे अलग से स्वतंत्रता घोषित करने की जरूरत नहीं है. डीपीपी ने 1992 की सहमति को नहीं मानती है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपनी बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान को लेकर चेतावनी दी है.
क्या ताइवान के लोग स्वतंत्रता चाहते हैं
ताइवान में ज्यादातर लोग मौजूदा स्थिति को बनाए रखना चाहते हैं. बहुत कम लोग स्वतंत्रता के समर्थक हैं. इससे भी कम लोग ताइवान का चीन के साथ एकीकरण चाहते हैं. जून 2023 में हुए एक सर्वे में करीब 63 फीसदी लोगों ने खुद को केवल 'ताइवानी' बताया था. इस सर्वे में करीब 31 फीसदी लोगों ने खुद को 'ताइवानी और चीनी' दोनों माना था. केवल करीब तीन फीसदी लोगों ने खुद को केवल 'चीनी'बताया था.
ताइवान संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक सदस्य नहीं है, इसके बाद भी उसे 40 से अधिक बहुपक्षीय संगठनों की सदस्यता मिली हुई है. इनमें अधिकतर एशियाई विकास बैंक, एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन और विश्व व्यापार संगठन जैसे क्षेत्रीय संगठन हैं. ताइवान के साथ वेटिकन समेत दुनिया के 12 देशों के आधिकारिक राजनयिक संबंध हैं. भारत का ताइवान में कोई दूतावास नहीं है. लेकिन वह इंडिया ताइपे एसोसिएशन के जरिए ताइवन से अपने संबंध बनाए हुए है. दोनों देशों ने 2025 में साढ़े 12 अरब डॉलर का व्यापार किया था.
कैसे हैं अमेरिका और ताइवान के संबंध
अमेरिका और ताइवान के बीच 1954 से 1979 तक पारस्परिक रक्षा संधि थी. उस समय तक अमेरिका रिपब्लिक ऑफ चाइना यानी ताइवान की सरकार को ही चीन की वैध सरकार मानता था. लेकिन 1970 के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की सरकार ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) के साथ संबंध सामान्य करने की नीति अपनाई. इसका उद्देश्य चीन और सोवियत संघ के बीच बढ़ती दूरी का फायदा उठाना और मॉस्को पर दबाव बढ़ाना था. साल 1979 में राष्ट्रपति जिमी कार्टर की सरकार ने ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध और रक्षा संधि खत्म कर चीन (पीआरसी) के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए. लेकिन अमेरिकी कांग्रेस ने ताइवान रिलेशंस एक्ट पारित कर ताइवान के अनौपचारिक संबंध बनाए रखा. वह ताइवान को हथियार भी देता है. ताइवान अमेरिका के सबसे बड़े हथियार खरीदारों में से एक है. अमेरिका यह काम चीन की धमकियों के बावजूद करता है. ताइवान अमेरिका और चीन के बीच संभावित टकराव का सबसे बड़ा मु्द्दा है. यही एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां दोनों देशों की सेनाएं टकरा सकती हैं.
डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका और ताइवान के संबंध और मजबूत हुए. इस दौरान अमेरिका ने ताइवान को 18 अरब डॉलर से अधिक के हथियार बेचे. उसने ताइपे में अपना वास्तविक दूतावास परिसर भी बनवाया. राष्ट्रपति पद संभालने से पहले ट्रंप ने ताइवान की राष्ट्रपति त्साई इंग वेन से फोन पर बात भी की थी. इसे 1979 के बाद दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा संपर्क माना गया था.ट्रंप के बाद आए डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडेन ने ताइवान को हथियार बेचना जारी रखी. बाइडेन अमेरिका के पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति थे, जिन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ताइवान के अधिकारियों को आमंत्रित किया था.

चीन के टेंपल ऑफ हैवन के परिसर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप.
ताइवान का सेमीकंडक्टर उद्योग
ताइवान दुनिया में सेमीकंडक्टर चिप्स का सबसे बड़ा निर्माता है. ये चिप्स हर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में लगते हैं. ताइवान की सबसे बड़ी चिप निर्माता कंपनी ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) दुनिया की उन दो कंपनियों में शामिल है जिनके पास सबसे छोटे और सबसे आधुनिक चिप बनाने की तकनीक है. दुनिया में बनने वाले ऐसे अत्याधुनिक चिप्स में से 90 फीसदी से ज्यादा टीएसएमसी बनाती है. यह कंपनी ऐपल समेत कई अमेरिकी कंपनियों को चिप की सप्लाई करती है.मार्च 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की थी कि टीएसएमसी अमेरिका में नई चिप फैक्ट्रियों में 100 अरब डॉलर का निवेश करेगी.सेमीकंडक्टर उत्पादन में ताइवान की यह ताकत उसे वैश्विक टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है.हालांकि, दुनिया की 22वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद ताइवान अब भी चीन के साथ व्यापार पर काफी निर्भर है. हाल के सालों में दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में बदलाव आया है.
ताइवान-चीन का व्यापार
मा यिंग-जेओ 2008 से 2016 तक ताइवान के राष्ट्रपति रहे. उनके कार्यकाल में ताइवान ने चीन के साथ 20 से अधिक समझौते किए. इनमें 2010 का 'क्रॉस-स्ट्रेट्स इकोनॉमिक कोऑपरेशन फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' भी शामिल था. इसके तहत दोनों पक्षों ने व्यापारिक बाधाएं कम करने पर सहमति जताई. इसके बाद चीन और ताइवान के बीच दशकों से बंद सीधे समुद्री, हवाई और डाक संपर्क फिर शुरू हुआ. दोनों देशों ने बैंकों, बीमा कंपनियों और अन्य वित्तीय सेवा प्रदाताओं को एक दूसरे के बाजार में काम करने की इजाजत दी.
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