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53 लाख सालों से व्हेल मरने के लिए हिंद महासागर की इस जगह पर क्यों आ रही हैं?

आमतौर पर समुद्र की इतनी गहराई में पूरी तरह अंधेरा और कड़ाके की ठंड होती है, जहां भोजन का नामोनिशान नहीं होता. लेकिन इस व्हेल कब्रिस्तान में नजारा बिल्कुल उल्टा है. व्हेल के सड़ते हुए शरीरों से निकलने वाले पोषक तत्वों के दम पर वहां एक पूरी नई और जीवंत दुनिया फल-फूल रही है.

53 लाख सालों से व्हेल मरने के लिए हिंद महासागर की इस जगह पर क्यों आ रही हैं?
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर में 1 करोड़ से भी ज्यादा व्हेल के शव हो सकते हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
Pixabay

हिंद महासागर की अथाह गहराइयों के भीतर से वैज्ञानिकों का एक हैरान करने वाला रिसर्च सामने आया है. चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज (CAS) के वैज्ञानिकों ने समुद्र के नीचे दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी 'व्हेल-फॉल साइट' यानी व्हेल मछलियों के 'कब्रिस्तान' का पता लगाया है. करीब 53 लाख सालों से यह रहस्यमयी जगह व्हेल मछलियों की आखिरी आरामगाह बनी हुई है. इस जगह पृथ्वी पर व्हेल के जीवाश्मों, उनके मृत शरीरों और उनसे पनपने वाले एक अनोखे इकोसिस्टम का सबसे बड़ा जमावड़ा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर की गहराइयों में मिला यह नजारा इंसानी कल्पना से बिल्कुल परे है.

इस ऐतिहासिक खोज के पीछे चीन, इटली और न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों की एक ज्वाइंट टीम है. साल 2023 में वैज्ञानिकों ने चीन की खास सबमर्सिबल फेंदोउझे' की मदद से समुद्र में कुल 32 बार गोते लगाए. समुद्र की तलहटी से करीब 7,000 मीटर नीचे जाकर वैज्ञानिकों ने रोबोटिक आर्म्स की मदद से वहां से सैंपल जुटाए.

वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में स्थित 'डायनामेंटिना फ्रैक्चर ज़ोन' में करीब 1,200 किलोमीटर के दायरे को खंगाला. यह पूरा इलाका गहरे समुद्र की खाइयों और पहाड़ियों से भरा हुआ है. इस खोज के दौरान वैज्ञानिकों को व्हेल के जीवाश्मों और उनके कंकालों से भरी 485 साइट्स मिलीं. इसे देखकर खुद वैज्ञानिक भी दंग रह गए.

Photo Credit: CAS

53 लाख साल पुराना इतिहास

शोधकर्ताओं को इस कब्रिस्तान में कई तरह की व्हेल प्रजातियों के जीवाश्म मिले हैं. इसमें 'बीक्ड व्हेल' सबसे प्रमुख हैं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां मिले कुछ जीवाश्म लगभग 53 लाख साल पुराने हैं. इनमें 'टेरोसेटस बेंगूले' नाम की प्राचीन व्हेल की खोपड़ी का जीवाश्म भी शामिल है.

इतना ही नहीं, इस जगह पर वैज्ञानिकों को व्हेल की एक ऐसी विलुप्त प्रजाति भी मिली है, जिसके बारे में इंसान पहले कभी नहीं जानता था. वैज्ञानिकों ने इस नई खोजी गई प्रजाति का नाम इस जगह के सम्मान में 'टेरोसेटस डायनामेंटिने' रखा है. प्राचीन काल के अलावा यहां आधुनिक काल की व्हेल के शरीर भी मिले हैं. इसमें सबसे बड़ा शव पांच मीटर लंबी अंटार्कटिक मिंके व्हेल का है.

क्यों मौत के नजदीक यहीं खिंची चली आती हैं व्हेल?

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर करोड़ों-लाखों सालों से इतनी बड़ी संख्या में व्हेल इसी खास जगह पर क्यों आ रही हैं? वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस इलाके में हड्डियों का जो घनत्व है, उस हिसाब से यहां 1 करोड़ से भी ज्यादा व्हेल के शव हो सकते हैं. वैज्ञानिकों ने इसके पीछे दो मुख्य कारण बताए हैं.

पहला कारण यह है कि ऐतिहासिक रूप से यह पूरा इलाका व्हेल मछलियों के भोजन के लिए बहुत समृद्ध रहा होगा. इस वजह से इस इलाके में भारी संख्या में व्हेल आती होंगी. दूसरा कारण इस जगह की भौगोलिक बनावट है. यहां समुद्र के नीचे एक 'V-आकार' की खाई की प्रणाली बनी हुई है. यह खाई एक प्राकृतिक कीप की तरह काम करती है. इससे समुद्र में मरने वाली व्हेलों के शवों को बहकर सीधे इसी गहरे बेसिन में इकट्ठा कर देती है.

अंधेरे और भयंकर ठंड में पनप रही जिंदगी

वैज्ञानिकों ने देखा कि इन कंकालों के आस-पास जेलीफिश, ब्रिटन स्टार्स, केकड़े-झींगे और हड्डियों को खाने वाले कीड़े मजे से रह रहे हैं. इनमें से कई जीव तो ऐसे हैं जिन्हें विज्ञान ने आज तक नहीं देखा था, यानी ये पूरी तरह से नई प्रजातियां हो सकती हैं. वैज्ञानिकों के लिए यह अनुभव बेहद चमत्कारी था, क्योंकि जहां जीवन की उम्मीद नहीं थी, वहां एक पूरा इकोसिस्टम पनप रहा है.

पर्यावरण और विज्ञान के लिए क्यों खास है यह खोज?

यह खोज सिर्फ प्राचीन इतिहास जानने के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि ये पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद खास है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस कब्रिस्तान में मौजूद व्हेल के शवों के सॉफ्ट टिशूज (नरम ऊतकों) और वसा में करीब 67 लाख टन कार्बन जमा है. यह कार्बन का एक विशाल भंडार है, जो वैश्विक पर्यावरण संतुलन में भूमिका निभाता है.

इसके अलावा, यहां रहने वाले कुछ जीव वैसे ही हैं जो समुद्र के गर्म झरनों के पास पाए जाते हैं. इससे वैज्ञानिकों को लगता है कि व्हेल के ये शव समुद्र की गहराइयों में अलग-थलग पड़ी जीवों की बस्तियों को आपस में जोड़ने के लिए एक पुल का काम करते हैं.

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