नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी ग्लेशियर बाढ़ को लेकर अब कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. नेपाल के पूर्व पर्यावरण मंत्री माधव प्रसाद चौलागाईं ने दावा किया है कि सुबह 8:40 बजे से पहले चीन की ओर से नेपाल को कोई चेतावनी नहीं दी गई थी. उनका कहना है कि यदि समय पर सूचना साझा की जाती तो जनहानि काफी कम हो सकती थी. इस आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत हुई है और हजारों अब भी लापता बताए जा रहे हैं. मृतकों और लापता लोगों में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे भारतीय श्रद्धालु, जलविद्युत परियोजनाओं के कर्मचारी और अन्य विदेशी नागरिक भी शामिल हैं. NDTV के लिए सौम्या जयसवाल की रिपोर्ट.
सूचना नहीं मिलने से बढ़ी त्रासदी
नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई इस भीषण आपदा ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है. बर्फ, चट्टानों, गाद और मलबे का विशाल प्रवाह अचानक सीमा क्षेत्र में आ गया, जिससे कई बस्तियां, सड़कें और बुनियादी ढांचे प्रभावित हुए. एनडीटीवी से बातचीत में पूर्व पर्यावरण मंत्री माधव प्रसाद चौलागाईं ने कहा कि इस त्रासदी की मानवीय कीमत इसलिए और बढ़ गई क्योंकि समय रहते जानकारी साझा नहीं की गई. उनके अनुसार नेपाल को सुबह 8:40 बजे से पहले चीन की ओर से कोई चेतावनी नहीं मिली. उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में भी एक छोटा ग्लेशियर हादसा हुआ था, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच सूचना साझा करने का एक प्रोटोकॉल तय किया गया था. लेकिन इस बार उस व्यवस्था का उपयोग नहीं किया गया. चौलागाईं के अनुसार, "हमने वह अवसर गंवा दिया."
बाढ़ की शुरुआत को लेकर भी विवाद
पूर्व मंत्री ने चीन के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा गया था कि आपदा की शुरुआत नेपाली क्षेत्र में हुई थी. उनका कहना है कि यह घटना तिब्बत क्षेत्र से शुरू हुई थी और बाद में इसका प्रभाव नेपाल तक पहुंचा.
उन्होंने कहा कि इस आपदा का पैमाना इतना बड़ा था कि इससे ऊपरी क्षेत्रों में चल रही गतिविधियों, निर्माण कार्यों या अन्य संभावित कारणों को लेकर भी अटकलें पैदा हुई हैं. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी पूरी तस्वीर साफ नहीं है और अधिक पारदर्शिता की जरूरत है.
केवल ग्लेशियर झीलों पर था फोकस
पूर्व मंत्री का मानना है कि इस आपदा ने नेपाल की आपदा तैयारी और विकास योजनाओं की कमजोरियां भी उजागर कर दी हैं. उन्होंने कहा कि नेपाल की शुरुआती चेतावनी प्रणाली और जलविद्युत परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन मुख्य रूप से ग्लेशियर झीलों से होने वाले खतरों पर केंद्रित थे. लेकिन इस बार की घटना अलग थी. चौलागाईं के अनुसार, यह सिर्फ झील फटने का मामला नहीं था, बल्कि बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटने तथा ग्लेशियर से पोषित नदी तंत्र के अचानक ध्वस्त होने जैसी स्थिति थी, जिसकी पहले कल्पना नहीं की गई थी.
नई झील बनने से खतरा बरकरार
बाढ़ के बाद प्रभावित क्षेत्र में मलबे से बनी एक नई झील भी सामने आई है. प्रशासन ने एहतियात के तौर पर 72 घंटे का अलर्ट जारी किया था. हालांकि शुरुआती तौर पर यह अवरोध सुरक्षित बना हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्षा बढ़ती है या जलस्तर ऊंचा होता है तो भविष्य में नया खतरा पैदा हो सकता है.
भारत-नेपाल-चीन चेतावनी तंत्र की मांग
चौलागाईं ने इस त्रासदी को भारत, नेपाल और चीन के बीच एक प्रभावी चेतावनी प्रणाली विकसित करने की जरूरत का बड़ा संकेत बताया. उन्होंने कहा कि तिब्बती पठार से निकलने वाली नदियां, जिनमें भोटेकोशी और कर्णाली जैसी प्रमुख नदियां शामिल हैं, करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं. ऐसे में जल प्रवाह, ग्लेशियर गतिविधियों और ऊपरी क्षेत्रों में होने वाले बदलावों की जानकारी साझा करना मानवीय जिम्मेदारी है. पूर्व मंत्री ने जोर देकर कहा कि नेपाल को अब सीमा पार क्षेत्रों में संयुक्त निगरानी, डेटा साझा करने और संभावित खतरों की समय पर सूचना देने की व्यवस्था की मांग करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए.
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