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क्या भारत बॉर्डर के पास नेपाल में हो रही सांप्रदायिक हिंसा रोकी जा सकती थी? 3 साल पहले फोर्स ने चेतावनी दी थी

नेपाल के सुनसरी जिले में दो धार्मिक समुदायों में हिंसा के बाद तनाव चरम पर है. पुलिस फायरिंग में युवक की मौत ने स्थिति को और नाजुक बना दिया है.

क्या भारत बॉर्डर के पास नेपाल में हो रही सांप्रदायिक हिंसा रोकी जा सकती थी? 3 साल पहले फोर्स ने चेतावनी दी थी
Nepal Communal Violence: नेपाल के सुनसरी जिले में सांप्रदायिक हिंसा (फोटो- NDTV)
  • नेपाल के सुनसरी जिले में सांप्रदायिक हिंसा के बाद कर्फ्यू लगा है, तमाम दल और धार्मिक नेता शांति की अपील कर रहे
  • पुलिस ने यहां गोलीबारी कर दी है जिसमें 1 व्यक्ति की मौत हो गई है और कई लोग घायल हुए हैं
  • नेपाल फोर्स ने 3 साल पहले चेतावनी दी थी कि तराई इलाके में धार्मिक और जातीय बंटवारा करने की कोशिशें हो रही हैं

भारत की सीमा से लगे नेपाल के इलाके में इस समय सांप्रदायिक हिंसा भड़की हुई है. नेपाल के सुनसरी जिले में कर्फ्यू लगाना पड़ा है. हिंसक भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस ने यहां गोलीबारी कर दी है जिसमें 1 व्यक्ति की मौत हो गई है और कई लोग घायल हुए हैं. दो समुदायों के बीच तनाव इस स्तर के हैं कि नेपाल सेना यहां हेलीकॉप्टर से हवाई गश्त शुरू कर रही है और सुरक्षा बल इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ाए हुए हैं. दोनों समुदाय के धार्मिक नेता मिलकर शांति की अपील कर रहे हैं तो हर पार्टी भी संयम बनाए रखने की सीख दे रही हैं. ऐसे में एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जो दिखाती है कि अगर वहां कि पुरानी सरकार चाहती तो इस हिंसा को रोका जा सकता था.

रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार नेपाली की सीमा सुरक्षा और दंगा-रोधी बल, आर्म्ड पुलिस फोर्स (APF) ने आज से तीन साल पहले सरकार को एक गोपनीय रिपोर्ट सौंपी थी. इसमें चेतावनी दी गई थी कि तराई इलाके में धार्मिक और जातीय बंटवारा करने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हैं. रिपोर्ट में तुरंत राजनीतिक और प्रशासनिक दखल की सिफारिश की गई थी, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि उस समय देश को संभाल रहे नेताओं ने इसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और गृह मंत्री रमेश लेखक को सौंपी गई इस रिपोर्ट में सरकार से धार्मिक और जातीय आधार पर काम करने वाले संगठनों पर कड़ी नज़र रखने को कहा गया था. इसमें आरोप लगाया गया था कि तराई में मौजूद कुछ मुस्लिम और हिंदू समूहों को देश और विदेश के गैर-सरकारी संगठनों से मदद मिल रही थी.

रिपोर्ट की जानकारी रखने वाले APF के एक सीनियर अधिकारी ने काठमांडू पोस्ट को बताया कि इस फोर्स ने राजनीतिक नेतृत्व को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से पैदा होने वाले खतरों के बारे में बार-बार जानकारी दी थी, लेकिन उनकी सिफारिशों को ज्यादातर नजरअंदाज कर दिया गया.

APF ने नेपाल के तराई क्षेत्र में धर्म और जाति के नाम पर टकराव भड़काने वाले चरमपंथी समूहों की बढ़ती कोशिशों की पहचान की थी. इसमें चेतावनी दी गई थी कि नेपाल को दक्षिण एशिया में दूसरी जगहों पर हुई सांप्रदायिक हिंसा से सबक लेना चाहिए और विवादों को बड़े पैमाने पर अशांति का रूप लेने से पहले ही सुलझा लेना चाहिए. रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया था कि नेपाल को भारत के मणिपुर में हाल ही में हुई हिंसा के साथ-साथ अलग-अलग देशों में जातीय, धार्मिक और भाषाई संघर्षों से हुए जान-माल के नुकसान से सबक लेना चाहिए और जातीय व धार्मिक विवादों को समय रहते सुलझाना चाहिए.

बता दें कि जब यह रिपोर्ट तैयार की गई, तब भारत के मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसक झड़पें हो रही थीं.

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