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तालिबान को एक अफगानी महिला का करारा जवाब, हमले में बची थी, अब एवरेस्ट जीता, भारत से भी कनेक्शन

अफगानिस्तान में तालिबानी गोलियों को झेला, भारत में स्कॉलरशिप पर पढ़ाई की, भाई के सुसाइड ने तोड़ा... माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली अफगानिस्तान की पहली बेटी, जाकिया अहमद की कहानी प्रेरणा देती है.

तालिबान को एक अफगानी महिला का करारा जवाब, हमले में बची थी, अब एवरेस्ट जीता, भारत से भी कनेक्शन
जाकिया अहमद माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाली अफगानिस्तान की पहली बेटी बनीं
(फोटो- जाकिया अहमद का इंस्टाग्राम)
  • अफगानिस्तान की जाकिया अहमद ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी- माउंट एवरेस्ट पर पहुंचकर इतिहास रच दिया है
  • तालिबान ने एक बार काबुल में उस बस पर गोलियां चलाईं थी, जिसमें जाकिया मौजूद थीं. 12 की मौत हुई, केवल 3 बचे थे
  • उन्होंने भारत में अपनी पढ़ाई पूरी की और अब ऑस्ट्रेलिया में रहती हैं
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अफगानिस्तान में महिलाओं को आज भी सपने देखने की इजाजत नहीं है. ऐसे देश में, जहां तालिबान ने लड़कियों की पढ़ाई, खेल और यहां तक की बाहर निकलने पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं, वहां की एक बेटी ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचकर इतिहास रच दिया है. यह कहानी सिर्फ माउंट एवरेस्ट फतह करने की नहीं है, बल्कि जंग, गरीबी, तालिबान के हमलों, परिवार के दुख और कभी हार न मानने वाले हौसले की कहानी है. जब जाकिया अहमद, जिन्हें लोग "रिवर" के नाम से जानते हैं, 21 मई को माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं, तो वह ऐसा करने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला बन गईं.  चलिए आज आपको उन्हीं की कहानी सुनाते हैं.

माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला बनीं जाकिया अहमद

माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला बनीं जाकिया अहमद

कहानी जाकिया अहमद की

काबुल नाऊ की रिपोर्ट के अनुसार जाकिया अहमद का जन्म 1990 के दशक में अफगानिस्तान के गजनी प्रांत के जघोरी जिले के जोदारी गांव में हुआ था. बचपन से ही उनकी जिंदगी हर दूसरी अफगानी लड़कियों की तरह मुश्किल थी. वह रोज घंटों पैदल चलकर स्कूल जाती थीं और साथ ही जानवर पालने, खेती और घर के कामों में भी परिवार की मदद करती थीं. उन्हें बचपन से ही यह एहसास हो गया था कि वहां के समाज में लड़कियों और लड़कों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता. वह पेड़ों पर चढ़ना और ऊंची जगहों से कूदना चाहती थीं, लेकिन उन्हें अक्सर यह कहकर रोक दिया जाता था कि "तुम लड़की हो, यह नहीं कर सकती."

इन मुश्किलों के बावजूद जाकिया अहमद ने पढ़ाई नहीं छोड़ी. स्कूल पूरा करने के बाद वह काबुल चली गईं. वहां उन्होंने कुछ समय तक काबुल यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की. बाद में उन्हें भारत में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) मिली. भारत में उन्होंने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की और फिर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मास्टर डिग्री की पढ़ाई की. भारत में रहने के दौरान भी जीवन आसान नहीं था. दिन में पढ़ाई और रात में कॉल सेंटर में नौकरी करके वह अपनी पढ़ाई और परिवार दोनों का खर्च संभालती थीं.

अफगानिस्तान की लड़कियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जाकिया अहमद

अफगानिस्तान की लड़कियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जाकिया अहमद

भारत में रहते हुए उन्होंने दिल्ली में रहने वाली अफगान महिलाओं की परेशानियों पर रिसर्च किया. इसी दौरान एक नकाबपोश व्यक्ति ने उन पर चाकू से हमला कर दिया, जिससे उनके माथे पर हमेशा के लिए निशान पड़ गया. इसके बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा.

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जब तालिबान ने किया था हमला

काबुल नाऊ की रिपोर्ट के अनुसार जाकिया के जीवन का सबसे भयावह अनुभव साल 2014 में हुआ. वह यूनिवर्सिटी जाने के लिए काबुल की यात्रा कर रही थीं, जब तालिबान के बंदूकधारियों ने उनकी बस रोक ली और यात्रियों पर गोलियां चला दीं. इस हमले में 12 लोग मारे गए. रिवर ने अपने चेहरे पर खून लगाकर खुद को मरा हुआ दिखाया और किसी तरह बच गईं. बस में केवल तीन लोग ही जीवित बचे थे.

बाद में उनका परिवार ऑस्ट्रेलिया चला गया, लेकिन वहां भी एक और बड़ा दुख उनका इंतजार कर रहा था. उनके छोटे भाई अहमद वली की आत्महत्या से मौत हो गई. इस घटना ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया. वह लंबे समय तक गहरे दुख में रहीं.

इसी दौरान पहाड़ उनके लिए सहारा बने. अपने भाई के साथ उन्होंने कभी आल्प्स और एवरेस्ट पर चढ़ने का सपना देखा था. भाई के जाने के बाद उन्होंने उसी सपने को अपना लक्ष्य बना लिया. ऑस्ट्रेलिया में नौकरी, आर्थिक दबाव और कठिन ट्रेनिंग के बीच उन्होंने तैयारी जारी रखी. एवरेस्ट से पहले उन्होंने नेपाल और यूरोप की कई चोटियां फतह कीं, जिनमें मोंट ब्लांक भी शामिल था.

आखिरकार 21 मई 2026 को उनका सपना सच हो गया. जाकिया अहमद माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच गईं और ऐसा करने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला बन गईं. अब उन्होंने अफगानिस्तान की लड़कियों की शिक्षा के लिए एक अभियान शुरू किया है, जिसमें दुनिया भर के लोगों से महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के लिए खड़े होने का आग्रह किया गया है. यह तालिबान को उनका करारा जवाब है. उनकी यह सफलता उन लाखों अफगान महिलाओं और लड़कियों के लिए उम्मीद का संदेश है, जो मुश्किल हालात के बावजूद अपने सपनों को जिंदा रखे हुए हैं.

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