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लेबनान में 51 साल बाद चली ट्रेन, आखिर क्या हुआ इस देश में कि रफ्तार पकड़ चुकी रेलवे थम गई

लेबनान में 51 साल बाद जो ट्रेन चलाई जा रही है वह सोलर इनर्जी से चलती है. यह बारबारा से मडफून तक चलेगी जिसकी दूरी केवल 3.5 किलोमीटर की है. इस ट्रेन की रफ्तार इतनी धीमी है कि इंसान इससे तेज दौड़कर पहले पहुंच सकता है.

लेबनान में 51 साल बाद चली ट्रेन, आखिर क्या हुआ इस देश में कि रफ्तार पकड़ चुकी रेलवे थम गई
लेबनान में 51 साल बाद ट्रेन वापस चली है, यह ट्रेन सोलर इनर्जी से चलती है और रफ्तार काफी धीमी है (फोटो- सोशल मीडिया)
  • लेबनान में लगभग 51 साल बाद एक नई सोलर पावर से चलने वाली बारबरा ट्रेन शुरू की गई है
  • बारबरा ट्रेन केवल 3.5 किलोमीटर दूरी तय करती है और इसकी स्पीड 15 से 20 किलोमीटर प्रति घंटा है
  • लेबनान का रेलवे नेटवर्क कभी 408 किलोमीटर लंबा था जो बेरूत को दमिश्क और हाइफा से जोड़ता था

इजरायली हमलों से जूझ रहे मिडिल ईस्ट के देश लेबनान में लगभग 51 साल बाद ट्रेन चली है. कभी अपने सुनहरे दौर से गुजरने वाले लेबनान के रेल ट्रांसपोर्ट में में 5 दशक बाद जो ट्रेन आई है, उसे देखकर पहली नजर को आपको लगेगा कि यह तो कोई खिलौना है. इंसान दौड़ने लगे तो इस ट्रेन की रफ्तार से दो गुना तेज दौड़ जाए. हम बात कर रहे हैं लेबनान में आई नई मॉडल ट्रेन की जिसका नाम बारा ट्रेन है. यह सोलर इनर्जी से चलने वाली ट्रेन है जो बारबारा से मडफून तक चलेगी जिसकी दूरी केवल 3.5 किलोमीटर की है. यह टूरिज्म के लिए जाना जाने वाला इलाका है और लेबनान की सरकार इसी की बदौलत टूरिज्म को बढ़ावा देना चाहती है.

बारा ट्रेन केवल 15 से 20 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलती है. यह रफ्तार कितनी धीमी है, यह भी आप जान लीजिए. इंसानों में ज्यादातर आम वयस्क कम समय के लिए लगभग 24 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ते हैं. भारत की एक आम पैसेंजर ट्रेन भी इस ट्रेन के डबल स्पीड से चलती है. शताब्दी और राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेन की औसत स्पीड 80 से 90 किमी प्रति घंटा तक होती है, जबकि इनकी अधिकतम गति 130 से 150 किमी प्रति घंटा तक पहुंचती है. वंदे भारत ट्रेन का तो 180 किमी प्रति घंटा की रफ्तार पर सफल ट्रायल हुआ है.

कभी सुनहरा दौर में था लेबनान का रेल नेटवर्क

आज जो लेबनान में ट्रेन ट्रांसपोर्ट की हालत है वह हमेशा से ऐसा नहीं था. अगस्त 1895 में, पहली स्टीम ट्रेन बेरूत से चली थी और बेका घाटी से होते हुए आज के सीरिया की सीमा के पास स्थित रायाक स्टेशन तक गई. यह लेबनान में रेल ट्रांसपोर्ट का सुनहरा दौर था. लेबनान का 408 किलोमीटर लंबा रेलवे नेटवर्क कभी बेरूत को सीरिया के दमिश्क और आज के इजरायल के तटीय शहर हाइफा से जोड़ता था. लेकिन आज, वहां जर्जर स्टेशन की इमारतों और जंग लगे इंजनों के अलावा कुछ नहीं बचा है.

1975 से 1990 तक चले लेबनान के गृह युद्ध ने देश में रेल ट्रांसपोर्ट को पूरी तरह खत्म कर दिया. गृह युद्ध के दौरान लड़ रहे गुटों ने कुछ ट्रेन स्टेशनों को नष्ट कर दिया. कुछ को बाद में हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए बुलडोजर से गिरा दिया गया; और कुछ को बस यूं ही छोड़ दिया गया. अल-जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार रायाक और त्रिपोली स्टेशनों पर ऐतिहासिक इंजन जंग खा रहे हैं, जबकि यूरोप में ऐसे ही इंजन म्यूजियम में संभालकर रखे गए हैं.

इस ट्रेन को शुरू करने पर भी हो रही आलोचना

केवल 3.5 किमी के लिए शुरू नई मॉडल ट्रेन की भी लेबनान में आलोचना हो रही है. लेबनान नेशनल रेलवे अथॉरिटी के जनरल डायरेक्टर ज़ियाद शिया ने 'बारबरा' टूरिस्ट ट्रेन प्रोजेक्ट की आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद, यह पहल लेबनान के रेलवे सिस्टम को फिर से शुरू करने और ट्रेनों की वापसी की उम्मीद जगाने की दिशा में एक कदम है.

Waradana की एक रिपोर्ट के अनुसार एक बयान में शिया ने कहा, "बारबरा टूरिस्ट ट्रेन की शुरुआत रेलवे के कुछ हिस्सों को फिर से जीवंत करने की दिशा में एक कदम है. यह उन नागरिकों के सहयोग और समर्पण का नतीजा है जो अपने देश की विरासत और यादों को संजोने के लिए प्रतिबद्ध हैं. यह पहल भले ही छोटे पैमाने पर शुरू की गई हो, लेकिन इसके परिणाम बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसे सीमित संसाधनों और उपेक्षित व अतिक्रमण वाली जगहों को वापस पाने की सामूहिक इच्छाशक्ति से हासिल किया गया है."

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