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This Article is From Jan 23, 2026

74 कोड़े मारे फिर भी नहीं डरींः इन बेखौफ महिलाओं की आवाज से ईरान की सत्ता डर गई

ईरान के हर बड़े आंदोलन के पीछे महिलाएं रही है. लेकिन यह भी सच है कि जिन महिलाओं ने सबसे पहले डर तोड़ा, वही सबसे पहले कुचली भी गईं. कुछ को गोली मिली. कुछ को फांसी. कुछ आज भी जेलों में सड़ रही हैं. कुछ ऐसी हैं जिनका नाम लेने से भी सत्ता आज डरती है.

74 कोड़े मारे फिर भी नहीं डरींः इन बेखौफ महिलाओं की आवाज से ईरान की सत्ता डर गई
  • ईरान में जब महिलाओं का बोलना भी अपराध था तब फोरूघ ने लिखा, "मैं पाप करती हूं, और पाप करते हुए जीना चाहती हूं."
  • शिरिन ने अंतिम समय तक माफी नहीं मांगी. उन्हें वकील नहीं मिला. फांसी के बाद उनकी कब्र तक परिवार को नहीं बताई गई
  • रोया हशमती ने हिजाब पहनने से इनकार कर दिया तो उन्हें 74 कोड़े मारे गए वहीं नसरीन सोतूदे आज भी जेल में बंद हैं.

ईरान में मानवाधिकारों की गंभीर स्थिति के बीच उन कुछ महिलाओं की कहानियां जिन्होंने सबसे पहले डर तोड़ा, पर सबसे पहले कुचली भी गईं. जिसे कम ही लोग जानते हैं लेकिन उनकी वजह से आज की ईरानी लड़कियां खड़ी होने की हिम्मत कर पाती हैं. ये कहानियां शोर नहीं करतीं, ये भीतर तक चीर देती हैं. कुछ को गोली मिली. कुछ को फांसी. कुछ आज भी जेलों में सड़ रही हैं. कुछ ऐसी हैं जिनका नाम लेने से भी सत्ता आज डरती है

फोरूघ फर्रुखजादः कविता जिसने स्त्री इच्छा की बात की

फोरूघ सिर्फ कवयित्री नहीं थीं. वह ईरान की पहली महिला थीं जिन्होंने खुले शब्दों में स्त्री इच्छा, अकेलेपन, प्रेम और घुटन की बात की. 1950 और 60 के दशक में जब ईरान में महिला का बोलना भी अपराध माना जाता था, फोरूघ ने लिखा, "मैं पाप करती हूं, और पाप करते हुए जीना चाहती हूं."
उनकी कविताएं पुरुष सत्ता और धार्मिक नैतिकता के लिए सीधी चुनौती थीं. उन्हें चरित्रहीन कहा गया. सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा. सरकारी निगरानी में रहीं. 1967 में एक रहस्यमयी सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई. बहुत से लोग मानते हैं कि यह सिर्फ हादसा नहीं था. फोरूघ की मौत के बाद भी उनकी कविताएं आज की ईरानी लड़कियों के मोबाइल में जिंदा हैं.

अशरफ देहकानी: हथियार उठाने से जेल तोड़ने तक

अशरफ देहकानी शाह के दौर में एक वामपंथी क्रांतिकारी थीं. उन्होंने हथियार उठाया. भूमिगत संगठन बनाए. गिरफ्तार हुईं. उन्हें यातनाएं दी गईं. बिजली के झटके. नाखून उखाड़ना. महीनों अंधेरी कोठरी में रखा गया. वह जेल तोड़ कर भाग निकलीं. पूरे ईरान में क्रांति की अलख जगाई. शाह का शासन ध्वस्त हुआ. सत्ता बदली लेकिन जुल्म नहीं. इस्लामी गणराज्य ने उन्हें फिर दुश्मन घोषित किया. उनके कई साथियों को फांसी दे दी गई. अशरफ को देश छोड़ना पड़ा. आज वह जिंदा हैं, लेकिन निर्वासन में. उनकी कहानी ईरानी महिलाओं को यह सिखाती है कि सत्ता का चेहरा बदले, हथकड़ी नहीं.

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शिरिन आलमहोलीः जिसने आखिरी सांस तक माफी नहीं मांगी

शिरिन एक युवा कुर्द महिला थीं. उन पर देश विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाया गया. 2010 में उन्हें फांसी दी गई. उनकी उम्र सिर्फ 28 साल थी. जेल में उन्हें वकील नहीं मिला. परिवार से मिलने नहीं दिया गया. फांसी से पहले उनसे कहा गया कि माफी मांग लो. जान बच जाएगी. शिरिन ने कहा, "मैंने कुछ गलत नहीं किया. मैं माफी क्यों मांगूं." फांसी के बाद उनकी कब्र तक परिवार को नहीं बताई गई. आज ईरान की कुर्द महिलाएं उन्हें साहस का प्रतीक मानती हैं.

निदा आगा सोल्तानः मौत जो कैमरे में कैद हो गई

2009 के ग्रीन मूवमेंट के दौरान निदा सड़क पर खड़ी थीं. वह न कोई नेता थीं, न कार्यकर्ता. सिर्फ एक युवती जो वोट की चोरी के खिलाफ बाहर आई थी. एक गोली चली. वह गिर पड़ीं. उनकी आंखों से जिंदगी निकलते हुए कैमरे में कैद हो गई. वह वीडियो पूरी दुनिया में फैल गया. सत्ता ने कहा यह साजिश है. परिवार को चुप रहने की धमकी दी गई. लेकिन निदा ईरान की अंतरात्मा बन गई.

नसरीन सोतूदेः जेल में बंद जिंदा प्रतिरोध

नसरीन एक मानवाधिकार वकील हैं. उन्होंने उन महिलाओं का केस लड़ा जो हिजाब कानून के खिलाफ खड़ी हुईं. बदले में उन्हें जेल भेज दिया गया. 38 साल की सजा. कोड़े मारने का आदेश. जेल में उन्होंने भूख हड़ताल की. उनका शरीर टूटता गया. लेकिन उन्होंने समझौता नहीं किया. आज भी वह ईरान की जेल और अदालतों के लिए डर का नाम हैं.

रोया हशमती: 74 कोड़े मारे पर नहीं डरीं

रोया हशमती को साल 2024 की शुरुआत में नैतिकता का सार्वजनिक उल्लंघन करने के आरोप में 74 कोड़े मारे गए थे. यूरोन्यूज के अनुसार, उन्होंने हिजाब पहनने से इनकार कर दिया था. ईरान में महिलाओं का साहस और उनकी आवाज़ सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. रोया हशमती की हिम्मत देखिए कि कोड़े मारने की सजा के दौरान भी उन्होंने हिजाब पहनने से मना कर दिया और कोर्ट में सिर उठाकर चलीं. उन्होंने अपनी आपबीती सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा कि सजा के वक्त वे मन में आजादी के गीत गुनगुना रही थीं.

महसा अमीनीः वो मौत जिसने डर खत्म कर दिया

2022 में महसा अमीनी की मौत तब हुई जब मोरल पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया. सरकार ने कहा दिल के दौरा से चल बसीं, पर जनता ने उसे हत्या माना. महसा अमीनी को नेता नहीं थीं. पर उनकी मौत ने जनांदोलन खड़ा कर दिया. महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से बाल काटे. सड़कों पर उतरीं, विरोध किया. विरोध करने वाली कई महिलाएं आज तक लापता हैं तो सत्ता ने कई को सरेआम फांसी दे दी. लेकिन महिलाओं का डर मर चुका था. ईरान की जेलों में आज भी सैकड़ों महिलाएं हैं. कुछ पत्रकार. कुछ छात्राएं. कुछ मांएं. कई ऐसी जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं. कोई मुकदमा नहीं. कोई खबर नहीं. वहां विरोध करने वाली महिलाओं को मौत की सजा दे दी जाती है और यही ईरान की सबसे डरावनी सच्चाई है.

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