- तियानजिन चीन का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और यह उत्तरी चीन के प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों में शामिल है.
- इस शहर का नाम मिंग राजवंश के सम्राट योंगले ने दिया था, जिसका अर्थ स्वर्ग की नदी या जन्नत है.
- तियानजिन को इतिहासकार चीन का उत्तर का दरवाजा मानते हैं और यह उत्तरी चीन का बड़ा बंदरगाह भी है.
चीन के शहर तियानजिन में इस समय 20 देशों के नेताओं का मजमा है और पूरी दुनिया की नजरें यहां पर गड़ी हुई हैं. वजह है शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO शिखर सम्मेलन का आयोजन. तियानजिन वह जगह है जिसे आप प्राचीन चीन का 'पावर सेंटर' भी कह सकते हैं. आपको चीन के सबसे स्वादिष्ट डिशेज का आनंद लेना हो या फिर यहां पर आधुनिकता के रंग में रंगी चीन की संस्कृति देखनी हो या फिर प्राचीन चीनी संस्कृति के बारे में जानना हो, तियानजिन आपके लिए एक बेहतर जगह हो सकती है. आइए आपको इस शहर की कुछ ऐसी बातों से रूबरू करवाते हैं जिसके बारे में आपको या तो बहुत कम मालूम होगा या फिर बिल्कुल नहीं मालूम होगा .
चीन का तीसरा सबसे बड़ा शहर
तियानजिन, उत्तरी चीन का एक शहर है जो हेबेई प्रांत के पूर्व में स्थित है. शंघाई और बीजिंग के बाद, यह चीन का तीसरा सबसे बड़ा शहर है. इसके अलावा यह वह शहर भी है जहां पर सबसे ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स भी हैं. तियानजिन दो शब्दों से मिलकर बना है तियान यानी स्वर्ग या जन्नत और जिन यानी नदी का घाट या पार उतरने की जगह. ऐसे में इस शब्द का मतलब हुआ 'स्वर्ग की नदी' या 'जन्नत'. इस शहर को यह नाम मिंग राजवंश के सम्राट योंगले ने 15वीं सदी में दिया था. यहीं से उन्होंने अपने बीजिंग मिशन की शुरुआत की थी.
कहा जाता है उत्तर का दरवाजा
तियानजिन को इतिहासकार और घुमक्कड़ी लोग दिलचस्पी और इतिहास की इबारतों को खुद में समेटेने वाला शहर कहते हैं. कभी इतिहासकारों ने इसे चीन की 'उत्तर का दरवाजा' यानी Gateway to the North भी कहा. इस शहर में उत्तरी चीन के सबसे बड़ा बंदरगाह और एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है. इसके अलावा यहां का तियानजिन आई फेरिस व्हील, पोर्सिलेन हाउस, तियानजिन म्यूजियम और एंशियंट कल्चर स्ट्रीट भी आपको आकर्षित किए बगैर नहीं रह पाएंगे.
चीन का 'बिजनेस सेंटर'
तियानजिन मंगोलों के युआन राजवंश जिसका समय 1271 से 1368 के बीच का माना जाता है, उस काल में रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम था. यह वही शहर था जो बीजिंग और दूसरे सी-रूट्स का आपस में जोड़ता था. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसी वजह से साम्राज्य की शक्ति के नियंत्रण में इसकी भूमिका काफी बढ़ गई थी. साफ है कि आज से 800 साल पहले तियानजिन मंगोलों की वजह से एशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र बन गया था. आप इसे चीन व्यापारिक द्वार भी कह सकते हैं.
आज भी मौजूद यूरोप की छाप
19वीं सदी यानी 200 साल में जब भारत में अंग्रेजों का राज था तो यहां पर अफीम की खेती के लिए किसानों को मजबूर किया जाता था. ठीक उसी तरह से चीन में भी अफीम को लेकर कई युद्ध हुए और कई संधियों के बाद तियानजिन कई विदेशी शक्तियों जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, इटली, जर्मनी) का कंसेशन जोन बन गया. यही वजह है कि आपको आज भी यहां पर यूरोपीय यूरोपियन स्टाइल की बिल्डिंग्स और चर्च देखने को मिलेंगे. इन इमारतों को आप यहां के फाइव ग्रेट एवेन्यूज पर आसानी से देख सकते हैं.
तियानजिन में भी है एक दिवार
कभी इस शहर को हमलों से बचाने के लिए एक विशालकाय चारदीवारी भी बनाई गई थी. इसे Huangyaguan Great Wall के तौर पर भी जानते हैं. इसका निर्माण शहर के सबसे उत्तरी छोर पर जिक्सियन काउंटी में हुआ है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि तियानजिन महान दीवार का निर्माण सबसे पहले सुई राजवंश (581-618) के दौरान हुआ था, जबकि कुछ मानते हैं कि इसका निर्माण नॉर्थ क्यू राजवंश (550-577) के काल में हुआ. हालांकि मिंग राजवंश तक भी तियानजिन की यह ग्रेट वॉल कई सुधारों के चलते पूरी तरह से रक्षात्मक प्रणाली नहीं बन सकी थी.
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