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पाकिस्तान में अखबार को फ्रंट पेज छोड़ना पड़ा खाली, ईरान-अमेरिका वार्ता की आड़ में क्या छिपा रहे मुनीर-शहबाज?

आम पाकिस्तानी शिया पाक सरकार के जुल्म को धर्मयुद्ध (जिहाद) के रूप में देख रहे हैं. उनके लिए यह जंग कर्बला की ऐतिहासिक लड़ाई की तरह है, जहां वे जुल्म के खिलाफ खड़े हैं.

पाकिस्तान में अखबार को फ्रंट पेज छोड़ना पड़ा खाली, ईरान-अमेरिका वार्ता की आड़ में क्या छिपा रहे मुनीर-शहबाज?

पाकिस्तान में शहबाज सरकार ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने का क्रेडिट लेने के लिए इतनी बेताब है कि अपने ही नागरिकों पर जुल्म ढा रहा है. कभी बाजारों को शाम होते ही बंद करा दिया जाता है तो कभी पूरे शहर में लोगों की पिंजरे की तरह बंद कर दिया जाता है. इस बीच अब मुनीर और शहबाज सरकार का एक बार फिर से पोल खुल रहा है. हाल ही में पाकिस्तान में छपने वाली अमेरिकी अखबार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के फ्रंट पेज पर एक बड़ा हिस्सा खाली छोड़ दिया गया. यह 'सफेद खाली जगह' दरअसल उस सच को दबाने की कोशिश थी, जिसे पाकिस्तान की सरकार और सेना दुनिया से छिपाना चाहती थी. अखबार ने एक ऐसी रिपोर्ट तैयार की थी, जो पाकिस्तान के 3.5 करोड़ शिया मुसलमानों के गुस्से और सरकार की दोहरी चाल का कच्चा चिट्ठा खोल रही थी. लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत ने इसे अपने नागरिकों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया.

आखिर उस खबर में ऐसा क्या था जिससे इस्लामाबाद इतना डर गया? 

दरअसल, यह रिपोर्ट पाकिस्तान के भीतर सुलग रहे एक ऐसे लावा की कहानी थी, जो ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के चलते फूटने को तैयार है. पाकिस्तान एक तरफ खुद को अमेरिका और ईरान के बीच शांतिदूत और मध्यस्थ के तौर पर पेश कर रहा है, तो दूसरी तरफ घर के भीतर अपने ही नागरिकों के विरोध को दबाने के लिए हर मुमकिन चाल चल रहा है. 

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शिया समुदाय का बढ़ता आक्रोश

विवाद की शुरुआत तब हुई जब पाकिस्तान के आर्मी चीफ, फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने देश के प्रमुख शिया धर्मगुरुओं को तलब किया. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद पाकिस्तान के कई हिस्सों में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. आर्मी चीफ ने धर्मगुरुओं को सख्त लहजे में चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश (ईरान) की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि जो लोग ईरान के प्रति वफादारी रखते हैं, वे देश छोड़ सकते हैं.

सेना की इस सख्त भाषा ने आग में घी डालने का काम किया. पाकिस्तान के लगभग 3.5 करोड़ शिया मुसलमान, जो पहले से ही चरमपंथी हिंसा का शिकार होते रहे हैं, इस रवैये से खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं. उनके लिए ईरान के सर्वोच्च नेता केवल एक राजनीतिक हस्ती नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे. जब कराची में अमेरिकी दूतावास पर प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोग मारे गए, तो यह गुस्सा और ज्यादा भड़क गया. अब हालात यह हैं कि पाकिस्तान की 'पीसमेकर' की छवि घर के भीतर ही तार-तार हो रही है.

मध्यस्थता का दिखावा

एक तरफ पाकिस्तान सरकार डोनाल्ड ट्रंप की तारीफें बटोर रही है और इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मेजबानी कर रही है, तो दूसरी तरफ देश की जनता इसे 'धोखा' मान रही है. पाकिस्तान ने अपनी सेना को सऊदी अरब में तैनात किया है और अमेरिका के 'पीस बोर्ड' का हिस्सा बना है. लेकिन आम पाकिस्तानी शिया इसे धर्मयुद्ध (जिहाद) के रूप में देख रहे हैं. उनके लिए यह जंग कर्बला की ऐतिहासिक लड़ाई की तरह है, जहां वे जुल्म के खिलाफ खड़े हैं.

ईरान और अमेरिका के बीच समझौता कराने की कोशिशों को पाकिस्तान के शिया समुदाय ने अपनी धार्मिक आस्था पर चोट के रूप में लिया है. कराची से लेकर गिलगित-बाल्टिस्तान तक, लोग अमेरिका के खिलाफ सड़कों पर हैं. यहां तक कि पर्यटन के लिए मशहूर गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय धर्मगुरुओं ने अमेरिकी सैलानियों के आने पर पाबंदी लगाने का एलान कर दिया है. सरकार की कूटनीति और जनता की भावनाओं के बीच की यह खाई अब पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बन गई है.

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