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ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले से भड़की पश्चिम एशिया की आग क्या विश्व युद्ध में बदल सकती है?

ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में जमीन पर जो हालात बन रहे हैं उसके संकेत अच्छे नहीं माने जा रहे. क्या दुनिया एक और बड़े संघर्ष की ओर बढ़ रही है? पश्चिम एशिया की आग क्या विश्व युद्ध में बदल सकती है?

ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले से भड़की पश्चिम एशिया की आग क्या विश्व युद्ध में बदल सकती है?
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  • पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध अब ऐसे मोड़ पर है जहां हर फैसले का दूरगामी असर होगा.
  • जर्मनी-ब्रिटेन-फ्रांस ने खुल कर ईरान के खिलाफ उतरने का एलान किया है. इससे जमीनी हालात अच्छे संकेत नहीं दे रहे.
  • रूस और चीन ने संयम की अपील की है. पर अगर वो ईरान की तरफ से उतरे तो यह संघर्ष बहुध्रुवीय टकराव में बदल सकता है.
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ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में जमीन पर जो हालात बन रहे हैं उसके संकेत अच्छे नहीं माने जा रहे. अमेरिका और इजरायल की संयुक्त ऑपरेशन में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान ने कई गल्फ देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. उधर हिज्बुल्लाह भी खामेनेई के मारे जाने के विरोध में खुलकर सक्रिय हो गया. इस बीच ईरान पर इजरायली हमला बढ़ गया है. जर्मनी-ब्रिटेन-फ्रांस ने अपने संयुक्त बयान में कहा है कि वो अपने हितों और सहयोगियों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएंगे. इससे युद्ध का दायरा बढ़ सकता है. और सबसे बड़ा डर- अगर ईरान ने परमाणु हथियार का रास्ता चुना, या रूस और चीन जैसी दुनिया की बड़ी ताकतें खुलकर उसके साथ खड़ी हो गईं- तो क्या यह संघर्ष विश्व युद्ध का रूप ले सकता है? आइए इस सवाल को गहराई से समझते हैं.

कई मोर्चे पर सुलगता पश्चिम एशिया

पश्चिम एशिया इस समय पूरी तरह अस्थिर हो गया है. अब उत्तरी सीमा पर लेबनान से हिजबुल्लाह ने भी रॉकेट दागे हैं. उसका कहना है कि उसने ये हमले ईरान के सुप्रीम लीडर  खामेनेई की हत्या के बदले के रूप में किया है. जवाब में इजरायल ने भी पूरे लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हिज्बुल्लाह का खुलकर मैदान में उतरना एक बड़ा संकेत है. यह संगठन सिर्फ सीमित सीमा झड़प तक सीमित नहीं है- उसके पास लंबी दूरी की मिसाइलें और व्यापक सैन्य ढांचा है. अगर वह पूरी ताकत से सक्रिय हुआ, तो इजरायल को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ सकता है.

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क्या परमाणु विकल्प की ओर बढ़ सकता है ईरान?

सबसे बड़ा और खतरनाक सवाल यही है. ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है. लेकिन पश्चिमी देशों को लंबे समय से आशंका रही है कि वह हथियार बनाने की क्षमता के करीब पहुंच चुका है. अगर हालात बेहद बिगड़ते हैं और ईरान को लगता है कि उसकी सुरक्षा या शासन खतरे में है, तो वह दो रास्ते चुन सकता है- पहला, परमाणु कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाना. दूसरा, डिटरेंस यानी डर पैदा करने के लिए परमाणु क्षमता का खुला प्रदर्शन करना. अगर ऐसा हुआ, तो अमेरिका और इजरायल की प्रतिक्रिया बेहद कड़ी हो सकती है. इजरायल ने पहले भी संकेत दिए हैं कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा. इसका मतलब हो सकता है- बड़े पैमाने पर हवाई हमले, गुप्त ऑपरेशन या साइबर हमले. हालांकि ईरान ऐसी गलती नहीं करेगा पर अगर उसने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया तो इससे पूरा वैश्विक सुरक्षा तंत्र हिल जाएगा और नेटो देश खुल कर ईरान के खिलाफ हमले में शामिल हो सकते हैं.

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रूस और चीन की भूमिका, क्या महाशक्तियां उतरेंगी?

अभी तक रूस और चीन ने खुले तौर पर युद्ध में हिस्सा नहीं लिया है, लेकिन उन्होंने संतुलन और संयम की अपील की है. रूस पहले से यूक्रेन युद्ध में उलझा है. चीन आर्थिक और रणनीतिक हितों को संतुलित करने में व्यस्त है. पर अगर स्थिति ऐसी बनी कि ईरान को अपने अस्तित्व का खतरा महसूस हुआ और उसने खुल कर समर्थन मांगा तो समीकरण बदलते वक्त भी नहीं लगेगा.  रूस और चीन दोनों ही सैन्य समर्थन या हथियारों की आपूर्ति कर सकते हैं साथ ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी चीन आर्थिक समर्थन भी दे सकता है.  तो अगर अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के खिलाफ चीन और रूस ढाल बनते हैं तो यह संघर्ष बहुध्रुवीय टकराव में बदल सकता है. यानी क्षेत्रीय युद्ध धीरे-धीरे वैश्विक संघर्ष में बदल सकता है.

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क्या यह विश्व युद्ध में बदल सकता है?

यह समझने के लिए तीन बड़े फैक्टर देखना जरूरी है. पहला, परमाणु हथियार का खतरा. अगर ईरान ने आखिरी विकल्प के तौर पर परमाणु हथियार का रास्ता चुना, तो हालात पूरी तरह बदल जाएंगे. परमाणु हथियार का इस्तेमाल मतलब- वैश्विक हस्तक्षेप लगभग तय.

दूसरा, रूस और चीन की भूमिका. अगर रूस और चीन खुलकर ईरान के साथ खड़े हो जाते हैं, तो यह टकराव दो ब्लॉकों में बंट सकता है. एक तरफ अमेरिका-इजरायल-यूरोप, दूसरी तरफ ईरान-रूस-चीन. ऐसी स्थिति में संघर्ष क्षेत्रीय यु्द्ध से निकलकर विश्व युद्ध बन सकता है.

और तीसरा, खाड़ी देशों की मजबूरी. सऊदी अरब, यूएई, कतर जैसे देश अगर सीधे निशाने पर आते हैं, तो वे भी किसी न किसी पक्ष में खुलकर उतरेंगे. इसका सबसे बड़ा प्रभाव तेल सप्लाई पर पड़ेगा. दुनिया भर में तेल सप्लाई बाधित होगा जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल सकती है.

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क्या दुनिया सच में विश्व युद्ध की तरफ जा रही है?

दो टूक में कहें तो 'अभी नहीं.' अभी विश्व युद्ध का खतरा नहीं है लेकिन खतरा संभावित है. क्योंकि इतिहास गवाह है कि बड़े युद्ध अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ते तनाव और छोटे-छोटे टकराव की श्रृंखला से फूटे हैं. 1914 में भी एक हत्या से शुरू हुई चिंगारी ने विश्व युद्ध का रूप ले लिया था. दूसरा विश्व युद्ध भी धीरे-धीरे बढ़ते आक्रामक कदमों का परिणाम था. आज भी हालात कुछ वैसी ही स्थितियां बना रहे हैं.

आज की दुनिया में परमाणु हथियार, साइबर युद्ध, ड्रोन तकनीक और लंबी दूरी की मिसाइलें मौजूद हैं. यानी अगर गलत अनुमान या गलत प्रतिक्रिया हुई, तो नुकसान कई गुना बड़ा होगा. हालांकि 80 साल पहले की तुलना में आज एक बड़ा फर्क ये भी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था आपस में जुड़ी हुई है. अमेरिका, चीन, यूरोप, रूस सभी के आपसी व्यापारिक और ऊर्जा हित आपस में जुड़े हैं. लिहाजा विश्व युद्ध किसी भी अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है और ये सभी देश ये भली-भांति जानते हैं. लिहाजा विश्व युद्ध की संभावना को न के बराबर तो माना जा रहा है पर शून्य नहीं. इसीलिए कई विश्लेषक कहते हैं कि “विश्व युद्ध की संभावना कम है, लेकिन शून्य नहीं.”

क्या है कूटनीतिक विकल्प?

अब अगर वैश्विक समुदाय जंग नहीं चाहता तो ऐसे में यूरोपीय देश, खाड़ी देश और संयुक्त राष्ट्र संघ सभी बैकचैनल से बातचीत की कोशिशें करेंगे. अगले तीन दिन बहुत अहम हैं, इस दौरान अगर सीमित और नियंत्रित हमला रहा तो डि-एस्केलेशन संभव है. यानी ईरान पर जिस स्तर पर अभी हमले किए जा रहे हैं उसमें कमी लाई जाएगी. यहां पर ईरान का किरदार अहम होगा क्योंकि अगर उसने कोई भावनात्कम बड़ा कदम उठाया तो हालात काबू से बाहर भी जा सकते हैं.

ईरान की जवाबी कार्रवाई में परमाणु नीति बहुत कुछ बदल सकती है. रूस-चीन का इससे दूरी बनाए रखना या सैन्य स्तर पर ईरान का साथ देना, अमेरिका का आगे का रुख और दुनिया में तेल की आपूर्ति पर इन सभी परिस्थितियों के असर से आगे यह तय होगा कि ईरान-इजरायल में भड़की ये आग सीमित रहेगी या एक बड़े युद्ध में बदलेगी. फिलहाल दुनिया दुआ कर रही है कि यह संघर्ष कूटनीति की मेज तक पहुंचे क्योंकि अगर यह पूरी तरह भड़क गया तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया पर ही नहीं पड़ेगा बल्कि इसकी आंच से पूरी दुनिया प्रभावित होगी.

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