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'दोस्त' ईरान लहूलुहान तो चीन सिर्फ निंदा क्यों कर रहा? एक्सपर्ट ने बताई ड्रैगन की चुप्पी की असली वजह

US-Israel War against Iran: चीन के लिए यह संकट सिर्फ दूर की घटना नहीं है. चीन ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से ज्यादा खरीदता है. 2025 में चीन ने ईरान से करीब 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा.

'दोस्त' ईरान लहूलुहान तो चीन सिर्फ निंदा क्यों कर रहा? एक्सपर्ट ने बताई ड्रैगन की चुप्पी की असली वजह
US-Israel War against Iran: अमेरिका-ईरान जंग पर संभल के कदम रख रहा चीन
  • अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया है
  • चीन ईरान से कुल तेल निर्यात का अधिकांश हिस्सा खरीदता है और इस क्षेत्र की ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर है
  • चीन और ईरान के बीच 25 साल का सहयोग है, लेकिन ईरान की जवाबी कार्रवाई चीन के लिए जोखिम भरी साबित हो सकती है
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US-Israel War against Iran: इस समय पश्चिम एशिया जल रहा है. अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ जंग शुरू कर दी है और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद यह जंग अपने चरम पर पहुंच गी है. ऐसे में चीन और ईरान के बीच गहरे ऊर्जा संबंध फिर से चर्चा में आ गए हैं. अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद ईरान खुली टकराव की स्थिति में आ गया है और इससे उन तेल रास्तों पर खतरा पैदा हो गया है जिन पर चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्भर है.

चीन ने इन हमलों की निंदा की है और सीजफायर की मांग की है. लेकिन उसने ऐसी कोई आर्थिक कार्रवाई नहीं की है जिससे उसके लिए जरूरी तेल की सप्लाई खतरे में पड़ जाए.

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अमेरिका-ईरान जंग और चीन के आर्थिक हित

चीन के लिए यह संकट सिर्फ दूर की घटना नहीं है. चीन ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से ज्यादा खरीदता है. 2025 में चीन ने ईरान से करीब 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा, जो चीन के समुद्री रास्ते से आने वाले कुल तेल आयात का लगभग 13 से 14 प्रतिशत है. हालांकि चीन के सबसे बड़े तेल सप्लायर रूस और सऊदी अरब हैं. हालिया तनाव के बाद चीन की रिफाइनरियों ने चुपचाप ईरानी तेल की खरीद थोड़ी कम कर दी है और सस्ते रूसी तेल पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं ताकि कुल सप्लाई स्थिर रहे.

एवेलॉन इंटेलिजेंस के सह संस्थापक बालकृष्णन का कहना है कि ईरान की जवाबी कार्रवाई एक बड़ी रणनीतिक गलती हो सकती है. उनके अनुसार ईरान सिर्फ एक मजबूत सैन्य गठबंधन से नहीं लड़ रहा, बल्कि वह पश्चिम एशिया में चीन की ऊर्जा और भू राजनीतिक रणनीति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को भी खतरे में डाल रहा है.

ईरान और चीन के बीच 25 साल का सहयोग समझौता है जिसमें ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और बेल्ट एंड रोड पहल से जुड़े परिवहन प्रोजेक्ट शामिल हैं. पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच ईरान से सस्ते तेल की सप्लाई चीन के लिए एक स्थिर स्रोत रही है. लेकिन बालकृष्णन के अनुसार खाड़ी देशों की जमीन पर मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान ने रणनीतिक रूप से गलती कर दी. इससे कई संभावित तटस्थ देश भी उससे दूर हो सकते हैं और क्षेत्र में अमेरिका और इजराइल के साथ नए गठजोड़ बन सकते हैं. इससे चीन के लिए क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.

चीन के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य ब्लॉक होने का खतरा

चीन के लिए सबसे बड़ा खतरा हॉर्मुज जलडमरूमध्य है. चीन के लगभग 44 प्रतिशत तेल आयात व्यापक मध्य पूर्व क्षेत्र से आते हैं. अगर इस रास्ते में कोई बड़ी बाधा आती है तो इसका असर चीन की अर्थव्यवस्था पर गंभीर पड़ सकता है. बालकृष्णन का कहना है कि अगर हॉर्मुज मार्ग बंद हुआ या वहां बड़ी रुकावट आई तो तेल की कीमत 100 से 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. इससे चीन के उद्योग और आर्थिक विकास पर दबाव पड़ सकता है.

चीन और ईरान के रिश्ते में भी असमानता साफ दिखाई देती है. बालकृष्णन के अनुसार ईरान को चीन की जरूरत ज्यादा है, जबकि चीन के पास दूसरे विकल्प भी हैं. चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए उसके पास तनाव कम करने के लिए दबाव बनाने की ताकत भी है. अगर ईरान कमजोर और ज्यादा अलग-थलग पड़ता है तो वह चीन के निवेश, तकनीक और कूटनीतिक समर्थन पर और ज्यादा निर्भर हो सकता है. लेकिन यह स्थिति तभी तक चीन के लिए फायदेमंद है जब तक यह संघर्ष पूरे क्षेत्र में बड़े संकट में न बदल जाए और तेल की सप्लाई व बाजार पूरी तरह प्रभावित न हों.

फिलहाल चीन युद्ध की आलोचना कर रहा है, ईरान, रूस और खाड़ी देशों के बीच अपने तेल आयात को संतुलित कर रहा है और इस पूरे संकट को सावधानी से देख रहा है.

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