विज्ञापन

ईरान के खिलाफ जंग में ट्रंप ने पायलट को तो बचा लिया लेकिन क्या खोया? जानें यहां

ईरान युद्ध में अमेरिकी पायलट की सुरक्षित रेस्क्यू को ट्रंप ने जीत बताया, लेकिन ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका को विमान, हेलीकॉप्टर, सैनिकों और अरबों डॉलर के सैन्य संसाधनों का नुकसान उठाना पड़ा है.

ईरान के खिलाफ जंग में ट्रंप ने पायलट को तो बचा लिया लेकिन क्या खोया? जानें यहां
एआई जेनरेटेड इमेज
  • अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन में कई उन्नत विमान और हेलीकॉप्टर गंवाए, जिससे अरबों डॉलर का नुकसान हुआ
  • समुद्री मोर्चे पर अमेरिकी युद्धपोतों को ईरानी मिसाइल ताकत के सामने अपनी स्थिति बदलनी पड़ी
  • युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारी आर्थिक खर्च किया, जिसमें युद्ध बजट के लिए सबसे बड़ा बिल कांग्रेस से मांगा गया
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

दुनिया में जो रसूख अमेरिका का है जाहिर सी बात है कि वैसा किसी और मुल्क का नहीं. अमेरिका खुद को दुनिया की सबसे बड़ी मिलिट्री सुपरपावर मानता रहा है और वो है भी. उसकी ताकत सिर्फ हथियारों या बजट में नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक साख में भी रही है. मगर खुद को डील का सौदागर कहने वाले ट्रंप के कार्यकाल के दौरान एक ऐसी स्थिति बनी, जहां एक पायलट को सुरक्षित बचा लेना तो संभव हो गया, लेकिन इसके बदले अमेरिका को कई स्तरों पर भारी-भरकम नुकसान झेलना पड़ा. यह घटना सिर्फ एक सैन्य ऑपरेशन या संकट प्रबंधन की कहानी नहीं है बल्कि इसने वैश्विक राजनीति, कूटनीति और सैन्य प्रतिष्ठा पर गहरे सवाल खड़े कर दिए.

ईरान के खिलाफ अमेरिका को तगड़ा नुकसान

ईरान के खिलाफ अमेरिका जंग में कूद तो गया लेकिन उसे तगड़ा नुकसान हो रहा है तो सबसे पहले बात करें सैन्य नुकसान की. किसी भी सैन्य टकराव में सिर्फ जान-माल का ही नुकसान नहीं होता, बल्कि तकनीकी और सामरिक संसाधन भी दांव पर लगे होते हैं, जिनका नुकसान होना भी तय रहता ही है. ईरान के खिलाफ जारी जंग में अमेरिका के कई विमान और हेलीकॉप्टर प्रभावित हुए. भले ही आधिकारिक आंकड़े सीमित बताए गए हों, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ अत्याधुनिक फाइटर जेट्स और सपोर्ट हेलीकॉप्टर या तो क्षतिग्रस्त हुए या ऑपरेशन के दौरान जोखिम में पड़े. एक आधुनिक फाइटर जेट की कीमत सैकड़ों मिलियन डॉलर तक होती है, ऐसे में नुकसान का दायरा अरबों डॉलर तक पहुंचना कोई असामान्य नहीं है.

विमान और ड्रोन का नुकसान

कम से कम 17 अमेरिकी विमान (crewed + uncrewed) नष्ट या क्रैश हुए, इनमें शामिल हैं:

  • F‑15E Strike Eagle (ईरान में गिरा)
  • KC‑135 टैंकर (एक क्रैश, कई क्षतिग्रस्त)
  • C‑130 ट्रांसपोर्ट (रेस्क्यू के दौरान खुद नष्ट किए गए)
  • MH‑6 और UH‑60 हेलीकॉप्टर (डैमेज / नष्ट)
  • 12+ MQ‑9 Reaper ड्रोन

सोर्स: GlobalMilitary Losses Tracker

ये भी पढ़ें : प्रॉफिट की गारंटी भी होता है युद्ध, पढ़ें-कैसे जंग से जेबें भर रहे दुनिया के दबंग देश

ईरान से अमेरिकी युद्धपोत को चुनौती

इसके अलावा, समुद्री मोर्चे पर भी असर देखने को मिला. यूं तो अमेरिकी युद्धपोत, जो दुनिया भर में शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक माने जाते हैं, लेकिन ईरान की मिसाइल पावर के सामने उन्हें भी रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा. कुछ मामलों में उन्हें अपनी पोजिशन बदलनी पड़ी, जिससे यह संदेश गया कि अमेरिका अपनी मनचाही स्थिति में मजबूती से खड़ा नहीं रह सका. जिससे ईरान का और अधिक मनोबल बढ़ा और वो डटकर युद्ध में अब तक खड़ा है. सीधे तौर पर उसकी नौसैनिक ताकत की छवि पर असर डालता है. ओपन‑सोर्स मिलिट्री ट्रैकर्स के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान युद्ध में बड़ी संख्या में अपने उन्नत एयर और नेवल एसेट्स झोंक दिए. हालांकि अमेरिकी युद्धपोत खास नुकसान की कोई पुष्टि नहीं हुई, लेकिन कई नेवल एसेट्स हाई‑रिस्क ज़ोन में फंसे रहे, जिससे अमेरिकी नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता पर दबाव बढ़ा.

ये भी पढ़ें : केवल पायलट बचाना ही नहीं ईरान से यूरेनियम चोरी भी था अमेरिका का प्लान, ईरान क्यों जता रहा ये शक?

अब बात करें आर्थिक नुकसान की. कोई में कोई भी सैन्य अभियान हो, उसमें होने वाले ऑपरेशन सिर्फ कोई आधुनिक हथियारों का खेल नहीं होता, बल्कि हर एक मूवमेंट के पीछे भारी खर्च जुड़ा होता है. जैसे ईंधन, लॉजिस्टिक्स, हथियारों की तैनाती और इमरजेंसी ऑपरेशन. इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को अरबों डॉलर का खर्च उठाना पड़ा. यह खर्च सिर्फ तत्काल नुकसान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भविष्य में रिप्लेसमेंट, मेंटेनेंस और अपग्रेड पर भी असर पड़ा. अमेरिका को इस जंग में कूदना कितना महंगा पड़ रहा है इसका अंदाजा इससे लगा लीजिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कांग्रेस से ₹139.5 लाख करोड़ (लगभग 1.7 ट्रिलियन डॉलर) का युद्ध बजट मांगा, जो अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा वॉर बिल है. इसके अलावा केवल रेस्क्यू और एयर ऑपरेशंस में ही अरबों डॉलर खर्च होने की बात कही गई है.

अमेरिकी सैन्य एसेट्स का अनुमानित नुकसान: $1.4 बिलियन से $2.9 बिलियन
यह आंकड़ा पहले 3–4 हफ्तों के नुकसान का बताया जा रहा है.

अमेरिकी की सुपर मिलिट्री पावर पर लगा धब्बा

असली चोट अमेरिका की “मिलिट्री सुपरपावर” वाली छवि को लगी. दुनिया अमेरिका को एक ऐसे देश के रूप में पहचानती है जो किसी भी संकट में निर्णायक और आक्रामक कदम उठाता है. लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग दिखी, यकीनन जंग के मौदान से पायलट को बचाना हिम्मत का काम है. लेकिन ट्रंप के कार्यकाल में इस जंग के मसकद से अमेरिका अभी भी अंजान है और वो अपने कीमती और उन्नत हथियारों का दोहन करने में लगा है. ईरान के भीतर विमान गिरना और रेस्क्यू के दौरान नुकसान यह दिखाता है कि अमेरिका की “एयर डॉमिनेंस” की दावेदारी पर सवाल उठे हैं. ईरान के खिलाफ अमेरिका को कई मोर्चे पर जिस तरीके से पीछे हटना पड़ा, उसने यह संकेत दिया कि अमेरिका हर परिस्थिति में दबदबा नहीं बना सकता. इससे विरोधी देशों को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली.

 रणनीतिक नुकसान

  • अमेरिकी एयर डॉमिनेंस के दावे कमजोर पड़े
  • इंडो‑पैसिफिक से फोकस हटने से चीन को रणनीतिक राहत
  • NATO ने ईरान युद्ध में सीधी सैन्य भागीदारी से दूरी बनाई

दुनिया के ताकतवर मुल्कों में शामिल रूस और चीन जैसे देश, जो पहले ही अमेरिका की वैश्विक भूमिका को चुनौती देते रहे हैं. इस घटनाक्रम के बाद उनका रसूख अलग ही नजर आ रहा है. कूटनीतिक स्तर पर यह संदेश गया कि अमेरिका को कुछ मामलों में जरूर पीछे हटना पड़ा. भले ही इसे रणनीतिक संयम कहा जाए, लेकिन वैश्विक राजनीति में इसे कमजोरी के रूप में भी आंका जाएगा. जहां चीन ने अपने क्षेत्रीय दावों को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाना शुरू किया, जबकि रूस ने यूक्रेन में अपनी सैन्य और कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करने का अवसर तलाश लिया है. Atlantic Council और CSIS के विश्लेषण रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान युद्ध में अमेरिका की भारी सैन्य तैनाती ने इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र में चीन के खिलाफ उसकी रणनीतिक क्षमता को कमजोर किया. यह स्थिति अप्रत्यक्ष रूप से चीन और रूस के लिए रणनीतिक राहत मानी जा रही है.

नाटो का भी अमेरिका से किनारा

नाटो (NATO) के साथ अमेरिका के रिश्तों पर भी असर पड़ा है. नाटो, जो अमेरिका के नेतृत्व में काम करता है, उसमें सहयोगी देशों को यह उम्मीद रहती है कि अमेरिका हमेशा मजबूत और निर्णायक रहेगा. मगर इस घटना के बाद कई यूरोपीय देशों ने अमेरिका की रणनीति पर सवाल उठाए. कुछ देशों ने यह भी महसूस किया कि अमेरिका अपने फैसलों में सहयोगियों को पूरी तरह शामिल नहीं करता, जिससे भरोसे में कमी आई. वहीं इस युद्ध में साथ न मिलने पर नाटो देशों को ट्रंप जमकर खरी-खोटी सुना चुके हैं.

ये भी पढ़ें :इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच खाड़ी से अधिक पैसा भारत क्यों आ रहा है, आगे क्या होने वाला है

ट्रंप प्रशासन में भी खटपट

जब ईरान के साथ जंग चल रही है तब काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट के डायरेक्टर का इस्तीफा, फिर आर्मी चीफ को अचानक हटाना. ये घटनाक्रम बता रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन के अंदर भी खटपट छिपी नहीं है. व्हाइट हाउस, पेंटागन और खुफिया एजेंसियों के बीच मतभेद की खबरें सामने आईं. कुछ अधिकारियों का मानना था कि ज्यादा आक्रामक रुख अपनाना चाहिए था, जबकि कुछ ने संयम को सही ठहराया. असल में यह आंतरिक मतभेद नीति निर्माण को कमजोर करते हैं और संकट के समय एकजुटता को प्रभावित करते हैं. सबसे चिंताजनक असर अमेरिकी मिलिट्री के अंदर देखने को मिला. किसी भी सेना की ताकत सिर्फ उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसके मनोबल और एकता में होती है. जब फैसलों पर सवाल उठते हैं और नेतृत्व पर भरोसा कम होता है, तो इसका असर सैनिकों के आत्मविश्वास पर पड़ता है. इस घटना के बाद कुछ रिपोर्ट्स में यह संकेत मिला कि सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ी है.

पेंटागन के आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान युद्ध में सैकड़ों अमेरिकी सैनिक घायल हुए, जबकि हताहतों के आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता पर भी सवाल उठना लाजिमी है.  इससे सेना के भीतर असंतोष और भरोसे की कमी की बात भी सामने आई है. इसमें कोई दोराय नहीं है कि अमेरिकी पायलट की सुरक्षित वापसी निस्संदेह एक बड़ी सैन्य सफलता रही, लेकिन इसके बदले अमेरिका को सैन्य संसाधन, आर्थिक बोझ, रणनीतिक विश्वसनीयता और गठबंधन संतुलन के मोर्चे पर भारी कीमत चुकानी पड़ी.

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com