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ईरान-फ्रांस की जुगलबंदी ने बिगाड़ा ट्रंप का खेल, अमेरिका के हाथ से फिसल रही बाजी, भारत की धाक कायम

मिडिल ईस्ट में जंग के बीच अमेरिका वैश्विक मंच पर अलग-थलग दिख रहा है. NATO देश फ्रांस ने अमेरिका को सबसे बड़ा झटका दिया है.

ईरान-फ्रांस की जुगलबंदी ने बिगाड़ा ट्रंप का खेल, अमेरिका के हाथ से फिसल रही बाजी, भारत की धाक कायम
ईरान युद्ध में अलग-थलग पड़ा अमेरिका
AI Image
  • मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच युद्ध से वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो रही है
  • ईरान ने होर्मुज से भारत, चीन और फ्रांस को सुरक्षित मार्ग देने का वादा किया है जबकि NATO देशों को बाहर रखा है
  • फ्रांस ने अमेरिका के सैन्य प्रस्ताव का विरोध किया और चीन-रूस के साथ मिलकर सैन्य हस्तक्षेप को रोकने को कहा

मिडिल ईस्ट में पिछले महीनेभर से युद्ध चल रहा है. ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच चल रही इस जंग से दुनिया के कई देश प्रभावित हो रहे हैं. तेल के दाम आसमान छू रहे हैं. इसके साथ ही एक नया वर्ल्ड ऑर्डर भी देखने को मिल रहा है. भले ही इस युद्ध में अमेरिकी सैन्य ताकत ज्यादा है, लेकिन ईरान हथियारों, मिसाइलों और ड्रोन से हमलों में कोई कसर नहीं छोड़ रहा. सबसे खास बात यह है कि नैरेटिव वॉर में ईरान कहीं आगे दिख रहा है.वहीं वैश्विक मंच पर अमेरिका कहीं ना कहीं अलग-थलग पड़ता जा रहा है. ईरान लगातार कह रहा है कि वो होर्मुज से अपने दोस्तों को रास्ता देगा, जिनमें भारत, चीन और फ्रांस जैसे देश शामिल हैं. वहीं NATO के अन्य देशों के लिए कोई एंट्री नहीं मिलेगी.

NATO देश भी नहीं दे रहे अमेरिका का साथ

इस युद्ध के शुरुआत से पहले से ही ईरान का सबसे बड़ा दोस्त रूस है. रूस ने ईरान को हथियार भी सप्लाई किए. वहीं इजरायल और अमेरिका ने जिस तरह ईरान पर हमला किया, उसका कड़ा विरोध भी किया. रूस की एम्बेसी ने एक पोस्ट किया है. इस पोस्ट में एक तस्वीर शेयर करते हुए यह संदेश दिया है कि अब होर्मुज से भारत, फ्रांस और चीन के लिए वीआईपी एंट्री मिलेगी. वहीं NATO के अन्य देश और अमेरिका के साथियों को कोई जगह नहीं मिलेगी.

इससे पहले भी UNSC में ऐसी तस्वीर देखने को मिली थी, जब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को मंजूरी देने वाले प्रस्ताव को रूस और चीन के साथ मिलकर फ्रांस ने भी वीटो कर दिया था. इस कदम ने अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया है, जबकि भारत का संतुलित रुख दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर उभरा है. फ्रांस के वीटो ने पश्चिमी खेमे में मतभेद उजागर किया है. 

फ्रांस का अमेरिका से किनारा और वीटो की कहानी

बता दें कि बहरीन और कुछ अन्य अरब देशों ने अमेरिका के समर्थन से UNSC में एक प्रस्ताव पेश किया था. इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य होर्मुज को सैन्य बल के जरिए फिर से खुलवाना था. हैरानी की बात यह रही कि नाटो का प्रमुख सदस्य और अमेरिका का पारंपरिक सहयोगी होने के बावजूद, फ्रांस ने रूस और चीन के साथ मिलकर इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया. फ्रांस ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी ऐसे प्रस्ताव को समर्थन नहीं देगा जिसमें सैन्य बल के इस्तेमाल की बात कही गई हो.

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फ्रांस के इस कदम ने अमेरिका को हैरत में डाल दिया है. पारंपरिक रूप से पश्चिमी देश UNSC में एक साथ वोट करते आए हैं. लेकिन फ्रांस का अलग रुख अपनाना यह दर्शाता है कि यूरोप अब आंख मूंदकर अमेरिका के सैन्य अभियानों के पीछे चलने को तैयार नहीं है. फ्रांस अमेरिका से स्वतंत्र होकर अपने राष्ट्रीय और वैश्विक हितों के अनुसार फैसले ले रहा है.

'शांति चाहने वालों का स्वागत, NATO को नो-एंट्री'

इस पूरे कूटनीतिक घटनाक्रम के बाद ईरान की स्थिति और मजबूत हुई है. तेहरान ने यूएन में फ्रांस, चीन और रूस के रुख का स्वागत किया है. ईरान की उन देशों को तरजीह दे रहा है जो मिडिल ईस्ट में शांति और बातचीत के पक्षधर हैं.  साथ ही उसने यह कड़ा संदेश दिया है कि खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज में अमेरिका या नाटो देशों की धौंस और सैन्य हस्तक्षेप को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

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भारत की कूटनीति भी रही सफल

मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष में भारत की कूटनीति भी सफल साबित हुई है. भारत के अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी है. इसके बाद भी भारत ने ईरान के साथ अपने संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया. होर्मुज से भारत के जहाजों का सुरक्षित निकलना इसी कूटनीति का नतीजा है.

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