US Iran Peace Talk: ईरान और अमेरिका के जंग में दो हफ्तों के लिए सीजफायर के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता हो रही हैं. इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी दोपहर तक वार्ता में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान पहुंच जाएंगे. यह पल ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद वेंस ईरानियों के साथ सीधी बातचीत की मेज पर बैठने वाले सबसे ऊंचे दर्जे के अमेरिकी अधिकारी होंगे. हालांकि अमेरिका के मेरीलैंड के जॉइंट बेस एंड्रयूज से 'एयर फोर्स टू' विमान में सवार होते हुए जेडी वेंस ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी है. उन्होंने साफ किया कि ईरान अमेरिका के साथ खेल खेलने की कोशिश न करे.
पिछले एक साल में अमेरिका और ईरान के बीच शांति की कई कोशिशें हुईं, लेकिन हर बार बातचीत की जगह मिसाइलों ने ले ली है. साल 2025 में ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ ओमान में कई दौर की अप्रत्यक्ष बातचीत की थी. मकसद था परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाना, लेकिन जून 2025 में इजरायल की ओर से ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों (12-डे वॉर) ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया.
कब बिगड़े हालात?
इसके बाद ईरान ने इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर हजारों मिसाइलों और ड्रोनों से हमला बोला. अब, पांच हफ्तों की भारी तबाही के बाद दोनों पक्ष पाकिस्तान की मध्यस्थता में युद्धविराम के लिए सहमत हुए हैं, लेकिन हालात अब भी नाजुक हैं.
ईरान और अमेरिका के रिश्तों का कैसा रहा है अतीत?
अमेरिका और ईरान के बीच रिश्तों का ग्राफ हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 2015 में 'न्यूक्लियर डील' (JCPOA) को सबसे बड़ी कामयाबी माना गया था, जिसे तत्कालीन विदेश मंत्री जॉन केरी और ईरानी विदेश मंत्री जवाद जरीफ ने मुमकिन बनाया था.

ईरान का डेलिगेशन इस्लामाबाद शांति वार्ता के लिए पहुंच चुका है.
जॉर्ज बुश ने ईरान के साथ गुडविल का दिया था नारा
शांति की ऐसी ही कोशिशें 1990 के दशक के अंत में ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी ने 'सभ्यताओं के बीच संवाद' के जरिए की थीं. उससे भी पीछे जाएं तो 1989 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने 'गुडविल बिगेट्स गुडविल' (सद्भावना से ही सद्भावना पैदा होती है) का नारा दिया था.
ऐसा इसलिए किया गया ताकि लेबनान में बंधक बनाए गए अमेरिकियों की रिहाई हो सके. हालांकि, उस समय यह कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी. अब जेडी वेंस की इस यात्रा पर दुनिया की उम्मीदें टिकी हैं कि क्या वे उस 'मुट्ठी' को स्थायी रूप से खुलवा पाएंगे जो दशकों से बंद है.
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