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ईरान और अमेरिका के बीच समझौते से क्यों लगता है कि ये सिर्फ तेहरान की जीत है? ट्रंप के हाथ क्यों कुछ नहीं लगा

समझौते की शर्तों में ईरान ने न्यूक्लियर बातचीत को आगे के लिए टाला है. ईरान ने कहा है कि वह हथियार नहीं बनाने के वादे को दोहराएगा. ये कोई नया वादा नहीं होगा, क्योंकि JCPOA के तहत भी ईरान ने ये वादा पहले भी किया है.

ईरान और अमेरिका के बीच समझौते से क्यों लगता है कि ये सिर्फ तेहरान की जीत है? ट्रंप के हाथ क्यों कुछ नहीं लगा
ईरान का साफ कहना है कि अंतिम बातचीत शुरू होने से पहले अमेरिका को उसकी आधी से ज्यादा फ्रीज संपत्ति तुरंत रिलीज करनी होगी और तेल पर लगे प्रतिबंधों को हटाना होगा.
  • समझौते की शर्तों में ईरान ने न्यूक्लियर बातचीत को आगे के लिए टाला है.
  • होर्मुज खोलना अमेरिका के पक्ष में लग सकता है, लेकिन इससे भी ईरान को ही फायदा है.
  • अमेरिका अपनी सेनाएं ईरान से वापस बुलाएगा.

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है. तीन महीनों के बाद दोनों देशों के बीच सुलह हो गई है. लेकिन इस डील में ऐसा लगता है कि पूरी की पूरी बाजी ईरान ने मार ली है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हाथ खाली नजर आ रहे हैं और ईरान एकतरफा फायदे में दिख रहा है. 

इस समझौते ने सुपरपावर अमेरिका की साख पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इस समझौते का सबसे कमजोर पहलू ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही है. अमेरिका और उसके सहयोगियों की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि ईरान परमाणु हथियार न बना पाए. लेकिन, इस डील में ईरान ने बड़ी चालाकी से न्यूक्लियर बातचीत को आगे के भविष्य के लिए टाल दिया है. ईरान ने केवल इतना कहा है कि वह हथियार नहीं बनाने के अपने पुराने वादे को दोहराएगा.

अब सवाल यह उठता है कि इसमें नया क्या है? ईरान यही वादा साल 2015 में हुए परमाणु समझौते (JCPOA) के तहत भी पहले कर चुका है. यानी जिस परमाणु खतरे को खत्म करने के लिए अमेरिका इस युद्ध में कूदा था, उसके बदले ट्रंप को अब तक सिर्फ ईरान का एक पुराना, घिसा-पिटा आश्वासन ही मिला है. तेहरान ने बिना कोई नई पाबंदी स्वीकार किए, अपनी शर्तों पर अमेरिका को बातचीत टालने के लिए मजबूर कर दिया है.

भारी-भरकम मुआवजा देने को बाध्य हो गया अमेरिका

डील में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि युद्ध से तबाह हुई अपनी अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से 300 बिलियन डॉलर के पुनर्निर्माण निवेश की मांग कर डाली है. ईरानी मीडिया के मुताबिक, तेहरान इस बात पर अड़ा है कि जब तक उसकी विदेशों में फ्रीज पड़ी संपत्तियां जारी नहीं की जातीं, तब तक वह इस समझौते को पूरी तरह लागू नहीं करेगा.

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ईरान का साफ कहना है कि अंतिम बातचीत शुरू होने से पहले अमेरिका को उसकी आधी से ज्यादा फ्रीज संपत्ति तुरंत रिलीज करनी होगी और तेल पर लगे प्रतिबंधों को हटाना होगा. यानी जिस देश को अमेरिका घुटनों पर लाना चाहता था, अब उसी देश की व्यवस्था को खड़ा करने के लिए भारी-भरकम निवेश का खाका तैयार हो रहा है. हालांकि इस बड़ी रकम की फंडिग को लेकर ट्रंप सवालों के घेरे में हैं.

होर्मुज में भी ट्रंप कमजोर नजर आते हैं

बाहर से देखने पर लग सकता है कि होर्मुज का खुलना अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था के पक्ष में है, क्योंकि इससे दुनिया का तेल संकट दूर होगा. ट्रंप दावा कर रहे हैं कि यह मार्ग अब 'टोल-फ्री' रहेगा. लेकिन इस पूरे समीकरण में भी असली फायदा सिर्फ ईरान को ही मिल रहा है. समझौते के तहत, अगले 30 दिनों के भीतर अमेरिका को होर्मुज से अपनी सभी नौसैनिक नाकेबंदी हटानी होगी.

सिर्फ नाकेबंदी ही नहीं, बल्कि अमेरिका को अपनी सेनाएं भी ईरान की सीमाओं और उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों से वापस बुलानी होंगी. सबसे बड़ी बात यह है कि इस रणनीतिक जलमार्ग का 'बॉस' कौन होगा, इसपर तस्वीर बेहद धुंधली है. लेकिन जो सबसे बड़ा पेंच फंसा है, वह यह है कि अगले 30 दिनों के भीतर यह पूरा जलमार्ग ईरान की व्यवस्था के तहत ही खोला जाएगा.

क्यों ईरान ही दिख रहा है होर्मुज का असली सिकंदर?

जब होर्मुज जलमार्ग को खोलने और संचालित करने की जिम्मेदारी ईरान की व्यवस्था के तहत होगी, तो साफ है कि वहां की सुरक्षा, जहाजों की निगरानी और नियंत्रण अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के ही हाथों में रहेगा. ईरान ने पिछले तीन महीनों में इस जलमार्ग पर अपना दबदबा साबित किया है और अब समझौते के बाद भी वह यहां फायदे की स्थिति में दिख रहा है.

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