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ईरान ने पकड़ ली अमेरिका की ये दुखती रग, कोई जिद नहीं पूरी स्ट्रेटजी से मुज्तबा ब्रिगेड चल रहा चाल

ईरान ने अमेरिका के साथ वार्ता में सख्ती दिखाते हुए अपनी रणनीतिक स्थिति का फायदा उठाया है. ईरान जानता है कि अमेरिकी जनता युद्ध के विरोध में है और अगर जंग लंबा खींचती है तो इसका असर अमेरिकी बाजारों तक पहुंचेगी.

ईरान ने पकड़ ली अमेरिका की ये दुखती रग, कोई जिद नहीं पूरी स्ट्रेटजी से मुज्तबा ब्रिगेड चल रहा चाल

US-Iran Ceasefire Deal: इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई 21 घंटे की मैराथन बैठक भले ही बेनतीजा रही हो, लेकिन इसे ईरान की नाकामी समझना एक बड़ी भूल हो सकती है. असल में, यह ईरान की कोई हठधर्मिता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीतिक और सैन्य रणनीति है. ईरान अच्छी तरह जानता है कि उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसने दुनिया की 'आर्थिक नब्ज' को अपने हाथ में दबा रखा है. भले ही अमेरिका के पास घातक बम, आधुनिक मिसाइलें और असीमित सैन्य ताकत हो, लेकिन इस जंग की तपिश अब सीधे वाशिंगटन को झुलसा रही है. 

अमेरिका में बढ़ती महंगाई और तेल की आसमान छूती कीमतों ने ट्रंप प्रशासन को बैकफुट पर धकेल दिया है. ईरान का रुख इस वक्त प्रतिरोध से ज्यादा 'मोलभाव' का है. उसने अपनी सैन्य शक्ति और रणनीतिक स्थिति के दम पर सुपरपावर अमेरिका को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया.

आज स्थिति यह है कि ईरान के पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है, लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है. लेकिन वह जंग को लंबा खींचकर अमेरिका को आर्थिक और सैन्य, दोनों मोर्चों पर कमजोर करना चाहता है. ईरान का यह सख्त रवैया और अमेरिका का बढ़ता लचीलापन साफ संकेत दे रहा है कि बाजी अब तेहरान के हाथ में खिसक रही है.

अमेरिका के हाथ क्यों बंधे हैं?

अमेरिका पर इस वक्त इस जंग को जल्द से जल्द खत्म करने का भारी दबाव है. घरेलू मोर्चे पर महंगाई एक बड़ा मुद्दा है. आने वाले वक्त में किंग चार्ल्स का अमेरिका दौरा प्रस्तावित है. मई में डोनाल्ड ट्रम्प को चीन जाना है और सबसे बढ़कर अमेरिका में मिड-टर्म इलेक्शन सिर पर हैं. ऐसे में अमेरिका लंबी जंग का जोखिम नहीं उठा सकता. यही वजह है कि ईरान झुकने के बजाय अपनी शर्तों पर अड़ा है, क्योंकि उसे पता है कि अमेरिका किन चिंताओं से घिरा हुआ है.

खाड़ी देश क्यों नहीं चाहते कि अमेरिका ईरान में सुलह हो?

दिलचस्प बात यह है कि खाड़ी देश और इजरायल भी नहीं चाहते थे कि इस वार्ता से कोई बड़ा समाधान निकले. उन्हें डर था कि अगर कोई अहम समझौता हो गया, तो क्षेत्र में ईरान का वर्चस्व और बढ़ जाएगा. ये अरब देशों और इजरायल के लिए घातक साबित हो सकता है. वहां के शेखों को ईरान की यह बढ़ती ताकत किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं थी. ऐसे में पर्दे के पीछे से होने वाली इन खींचतानों ने भी वार्ता को बेनतीजा बनाने में अहम भूमिका निभाई है.

अभी खत्म नहीं हुआ ईरान के हथियारों का जखीरा

ईरान के पास अभी भी अपनी मिसाइलों और ड्रोनों का आधे से ज्यादा जखीरा सुरक्षित बचा हुआ है. सैन्य जानकारों का मानना है कि ईरान के पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि उसकी सैन्य क्षमता अब भी उसे लंबे समय तक टिके रहने की ताकत देती है. दूसरी ओर, अमेरिका अब पहले की तरह बड़े हमले करने की स्थिति में नहीं दिख रहा है. संभावना यही है कि अमेरिका केवल छिटपुट हमले जारी रखेगा ताकि दबाव बना रहे, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से वह बचेगा.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिना नेटो (NATO) देशों के समर्थन के अमेरिका के लिए कुछ भी बड़ा करना नामुमकिन जैसा है. अगर अमेरिका वहां अकेले उतरता है, तो उसे भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ सकता है. ईरान ने इसी कमजोरी को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया है. वह जानता है कि अमेरिका की 'आर्थिक नस' होर्मुज से गुजरती है और वहां एक छोटी सी हलचल भी वैश्विक बाजार में तबाही मचा सकती है.

अब सवाल यह है कि वार्ता बेनतीजा होने के बाद ईरान किस ओर जाएगा? साफ है कि ईरान अब इस संघर्ष को और लंबा खींचेगा. उसका मकसद दुश्मन को थकाना और उसे आर्थिक रूप से पंगु बनाना है. तेहरान अब प्रतिरोध के बजाय कूटनीतिक और रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए मोलभाव कर रहा है. वह अपनी शर्तों को मनवाने के लिए अड़ा रहेगा क्योंकि उसे पता है कि युद्ध की लंबी खिंचती लकीर अमेरिका के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और इससे ट्रंप ही देश में घिर जाएंगे.

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