- ईरान ने पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग शुरू किया है और जंग में इसका फायदा मिल रहा
- ईरान लगभग कम लागत में बिटकॉइन माइन कर वैश्विक बैंकिंग सिस्टम के बाहर पेमेंट कर सकता है
- क्रिप्टो फंड सीधे ईरानी सरकार के डिजिटल वॉलेट में जाता है और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में इस्तेमाल होता है
ईरान की करेंसी तेजी से गिर रही है. उसकी अर्थव्यवस्था पर पश्चिमी देशों ने कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं. इसके बावदूज मौजूदा जंग में ईरानी सरकार विदेशों से मशीनरी, फ्यूल और सैन्य उपकरणों को खरीदने के लिए पेमेंट कर पा रही है. आखिर यह कैसे हो रहा है? दरअसल इसके लिए वह एक ऐसे वित्तीय रास्ते का इस्तेमाल कर रही है जिसे डोनाल्ड ट्रंप नियंत्रित नहीं कर सकते- क्रिप्टो करेंसी.
क्रिप्टोकरेंसी कैसे बनी ईरान की संजीवनी?
इसका तरीका सरल है. बिटकॉइन माइनिंग करो और फिर उसी से पेमेंट करो. क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग (Cryptocurrency Mining) वह प्रक्रिया है जिसके जरिए ब्लॉकचेन नेटवर्क पर लेनदेन (transactions) को वेरिफाई किया जाता है और नए डिजिटल कॉइन फिर लेनदेन के काम में लाए जाते हैं.
अमेरिका के बिटकॉइन रणनीतिकार जेक पर्सी कहते हैं कि ईरान लगभग 1300 डॉलर की लागत में एक बिटकॉइन माइन कर सकता है. जबकि अभी बिटकॉइन की मार्केट वैल्यू करीब 73,000 डॉलर है. यानी हर सिक्के पर ईरान को लगभग 71,700 डॉलर का फायदा होता है. इस पैसे का इस्तेमाल वैश्विक बैंकिंग सिस्टम के बाहर किया जा सकता है. इस रणनीति से ईरान पर लगाई गई पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की पूरी व्यवस्था में एक बड़ा लूपहोल तैयार हो गया है. इस व्यवस्था को अमेरिका ने लगभग दो दशकों में बनाया था.
बता दें कि जब तेहरान ने 2019 में बिटकॉइन माइनिंग को कानूनी बनाया, तो अधिकारियों ने इसे एक आर्थिक प्रयोग बताया था. लेकिन अब विश्लेषकों का कहना है कि यह एक प्रतिबंधों से बचने वाला पेमेंट नेटवर्क बन गया है. माइनिंग से बनने वाला बिटकॉइन सीधे सरकार के नियंत्रण वाले डिजिटल वॉलेट में भेजा जा सकता है. इसके बाद उसी से अंतरराष्ट्रीय लेन-देन किया जाता है. इससे तेहरान विदेशों से मशीनरी, तेल-गैस और सैन्य उपकरण खरीद सकता है और उसे डॉलर आधारित बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता.
इस प्रक्रिया में कोई SWIFT ट्रांसफर नहीं है, कोई विदेशी बैंक मध्यस्थ का काम नहीं करता है और अमेरिकी ट्रेजरी का भी कोई नियंत्रण नहीं है.
एक चालाक रणनीति क्यों है?
ब्लॉकचेन विश्लेषण कंपनी चेनालिसिस के अनुसार 2025 में ईरान का क्रिप्टो सिस्टम लगभग 7.78 अरब डॉलर तक पहुंच गया. प्रतिबंधों के बावजूद यह तेजी से बढ़ रहा है. 2025 के अंत में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स सी जुड़े एड्रेस ईरान में आने वाले कुल क्रिप्टो फंड के आधे से ज्यादा हिस्से के लिए जिम्मेदार थे. एक ही साल में इन खातों में 3 अरब डॉलर से ज्यादा का लेन-देन हुआ. जेक पर्सी ने कहा, “यह आम लोगों का निवेश नहीं है. यह सरकार और सेना का वित्तीय ढांचा है.”
इस सिस्टम की खास बात यह है कि यह पब्लिक लेजर पर चलता है. हर बिटकॉइन लेन-देन हमेशा के लिए ब्लॉकचेन पर रिकॉर्ड हो जाता है. यानी जिस तकनीक से प्रतिबंधों से बचा जा रहा है, वही एक नई तरह की खुफिया जानकारी भी पैदा कर रही है.
जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हवाई हमले तेहरान पर हुए, तो ब्लॉकचेन गतिविधि देखने वाले विश्लेषकों ने असामान्य गतिविधि देखी. यह जानकारी पारंपरिक खुफिया चैनलों से पहले सामने आ गई. ईरान के सबसे बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज नोबिटेक्स से अचानक बहुत ज्यादा पैसा बाहर जाने लगा. 28 फरवरी से 2 मार्च के बीच लगभग 1.03 करोड़ डॉलर इस एक्सचेंज से बाहर गए. उसी समय हर घंटे का लेन-देन 2026 के औसत से 873 प्रतिशत ज्यादा हो गया, ऐसा चेनालिसिस के आंकड़ों से पता चलता है.
बता दें कि ईरान ही अकेला देश नहीं है जो क्रिप्टो की इस कमजोरी का फायदा उठा रहा है. चेनालिसिस की 2026 क्रिप्टो क्राइम रिपोर्ट के अनुसार 2025 में अवैध क्रिप्टो खातों में कुल 154 अरब डॉलर आए. इसका बड़ा कारण प्रतिबंधित संस्थाओं को जाने वाले पैसों में 694 प्रतिशत की बढ़ोतरी था. रूस ने एक प्रतिबंधित स्टेबलकॉइन के जरिए लगभग 93 अरब डॉलर का लेन-देन किया, जिससे डॉलर सिस्टम से बाहर पैसा भेजा जा सके. वहीं नॉर्थ कोरिया के हैकरों ने एक ही क्रिप्टो एक्सचेंज पर हमले में 1.5 अरब डॉलर चुरा लिए और इस पैसे को सीधे अपने हथियार कार्यक्रम में लगा दिया.
ओंटारियो में स्थित बिटकॉइन डेटा सेंटर एनआरजी ब्लूम चलाने वाले माकर वोल्सी ने कहा, “बिटकॉइन को फर्क नहीं पड़ता कि राष्ट्रपति कौन है. उसे प्रतिबंधों की भी परवाह नहीं. वह बस चलता रहता है.”
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