- मध्य-पूर्व में युद्ध और सप्लाई संकट के बीच भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दी गई है.
- भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का करीब 85% तेल आयात करता है.
- इस छूट को वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने और कीमतों में उछाल रोकने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
दुनिया में जब भी युद्ध भड़कता है, सबसे पहले ऊर्जा बाजार पर इसका असर पड़ता है. बीते एक हफ्ते से भी अधिक समय से मध्य-पूर्व में ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे ने वैश्विक तेल आपूर्ति को हिला दिया है. इसी दौरान भारत में पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने की अफवाह चल रही है. कई राज्यों में पेट्रोल की खरीद के लिए पंपों पर भीड़ लग गई है. इसी बीच अमेरिकी सरकार का एक बड़ा फैसला सामने आया है. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया है कि अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है.
President Trump's energy agenda has resulted in oil and gas production reaching the highest levels ever recorded.
— Treasury Secretary Scott Bessent (@SecScottBessent) March 6, 2026
To enable oil to keep flowing into the global market, the Treasury Department is issuing a temporary 30-day waiver to allow Indian refiners to purchase Russian oil.…
इस बीच सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिशें असर दिखा रही हैं. कई देशों और कंपनियों के साथ लगातार बातचीत के बाद स्थिति को नियंत्रण में रखा गया है और भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा. सरकार का कहना है कि देश के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार मौजूद है और सप्लाई को लेकर कोई संकट नहीं है. अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि देश में तेल की कमी नहीं होने दी जाएगी और घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ने नहीं दी जाएंगी. साथ ही लोगों से अपील की गई है कि वे तेल को लेकर किसी तरह का पैनिक न करें, स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है.
जानकार बताते हैं कि अमेरिका ने यह छूट इसलिए दी ताकि वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति पूरी तरह चरमराने से बच सके. असल में समुद्र में फंसे रूसी तेल के जहाजों को भारत तक पहुंचाने की अनुमति दी गई है, ताकि बाजार में सप्लाई बनी रहे. लेकिन यह सिर्फ तेल खरीदने की अनुमति भर नहीं है. इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा, अमेरिका-भारत रिश्ते, रूस की अर्थव्यवस्था और वैश्विक तेल बाजार की राजनीति छिपी हुई है. पूरी कहानी समझने के लिए हमें कुछ बड़े सवालों पर नजर डालनी होगी.
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भारत को यह छूट मिली क्यों?
पहला कारण है वैश्विक तेल आपूर्ति का संकट. मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों को अस्थिर कर दिया है. कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है और तेल बाजार में अचानक अस्थिरता आ गई है. इसी वजह से अमेरिका ने अस्थायी तौर पर नियमों में ढील दी.
अमेरिकी ट्रेजरी ने साफ कहा कि यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि वैश्विक बाजार में तेल का प्रवाह जारी रहेऔर कीमतों में तेज उछाल न आए.
असल में कई रूसी तेल टैंकर पहले से समुद्र में थे लेकिन प्रतिबंधों और भुगतान नियमों की अनिश्चितता के कारण वे खरीदार तलाश नहीं पा रहे थे. अब भारत उन कार्गो को खरीद सकता है. दूसरे शब्दों में, यह फैसला तेल बाजार को स्थिर रखने की कोशिश है.
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भारत के लिए यह छूट इतनी अहम क्यों?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है. लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है- ऊर्जा आयात पर निर्भरता. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अगर वैश्विक सप्लाई में झटका लगे तो देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत के पास लगभग 25 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार ही मौजूद है. इसलिए अगर मध्य-पूर्व में संकट गहरा जाता है तो भारत को तुरंत वैकल्पिक सप्लाई की जरूरत पड़ती है.
यही वजह है कि भारत के बड़े रिफाइनर, जैसे- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और मैंगलोर रिफाइनरी रूसी तेल खरीदने के लिए बातचीत कर रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि भारतीय कंपनियों ने लगभग 20 मिलियन बैरल तेल खरीदने की तैयारी भी कर ली है.
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रूस के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?
रूस पर यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. इन प्रतिबंधों का सबसे बड़ा निशाना रहा है रूसी तेल और गैस सेक्टर, क्योंकि यही रूस की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया के कई देशों के लिए रूसी तेल अभी भी बेहद जरूरी है. क्योंकि यह सस्ता होता है, इसकी सप्लाई बड़ी मात्रा में उपलब्ध होती है और कई एशियाई रिफाइनरियां इसी ग्रेड के तेल पर निर्भर हैं. ऐसे में रूस लगातार एशियाई बाजारों, खासकर भारत और चीन, की ओर झुक रहा है.

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अमेरिका की रणनीति क्या है?
अमेरिका का 30 दिनों के लिए खरीद की छूट देने का फैसला पहली नजर में थोड़ा विरोधाभासी लगता है. एक तरफ अमेरिका रूस पर प्रतिबंध लगा रहा है, दूसरी तरफ भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति दे रहा है. लेकिन इसके पीछे एक व्यावहारिक रणनीति है. अमेरिका चाहता है कि वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल न हो, तेल की कीमतें बहुत ज्यादा न बढ़ें और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर न पड़े. साथ ही अमेरिका ने संकेत दिया है कि यह सिर्फ अस्थायी व्यवस्था है और भविष्य में भारत से अमेरिका से तेल खरीद बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है. यानी यह फैसला असल में ऊर्जा राजनीति का संतुलन है.

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समुद्र में फंसे रूसी टैंकर
इस संकट का एक दिलचस्प पहलू भी है. कई रूसी तेल टैंकर पहले से समुद्र में थे, लेकिन बीमा नियम, भुगतान व्यवस्था, और बंदरगाह अनुमति जैसे मुद्दों की वजह से वे खरीदार तक नहीं पहुंच पा रहे थे. अब अमेरिकी छूट के बाद इन जहाजों को भारत के रिफाइनरों को तेल बेचने की अनुमति मिल गई है. तो यह फैसला समुद्र में रुके तेल को बाजार तक पहुंचाने का एक जरिया भी है.
क्या इससे तेल की कीमतें प्रभावित होंगी?
संभावना है कि इस फैसले से तेल बाजार में तुरंत राहत मिले. निश्चित रूप से इस फैसले से बाजार में अतिरिक्त सप्लाई आएगी और अचानक तेल की कमी की आशंका कम होगी जिससे भारत जैसे देश में कीमतों को बढ़ाने को लेकर दबाव घटेगा. अगर अमेरिका से ये छूट नहीं मिलती तो भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ सकता था क्योंकि तेल की वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं, इसलिए ऊर्जा बाजार के जानकर इसे शॉर्ट-टर्म स्टेबलाइजेशन कदम मान रहे हैं.
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भारत की ऊर्जा कूटनीति
भारत पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा कूटनीतिका एक नया मॉडल अपना रहा है. बीते कुछ वर्षों में उसने ये रणनीति अपनाई है कि जहां सस्ता और भरोसेमंद तेल मिले, वहां से खरीदो. इसी रणनीति के तहत अमेरिकी दबाव के बीच भी भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता आया है. वहीं अमेरिका से एलएनजी लेता है तो मध्य-पूर्व से पारंपरिक सप्लाई बनाए रखता है. वहीं अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भी नए स्रोत की तलाश में रहता है. यानी भारत कोशिश कर रहा है कि उसकी ऊर्जा आपूर्ति किसी एक क्षेत्र पर निर्भर न रहे.
अब जबकि यह छूट केवल 30 दिनों के लिए है तो उसके बाद क्या होगा? तो संभावना ये है कि अगर ईरान को लेकर वैश्विक संकट जारी रहता है तो यह छूट और बढ़ सकती है. वहीं भारत को वैकल्पिक सस्ते तेल स्रोत ढूंढने के लिए समय भी मिल जाएगा. अमेरिका के नजरिए से देखें तो 30 दिन बाद वह भारत को अपना तेल खरीदने के लिए कहेगा. पर जो फैक्टर सबसे अधिक मायने रखता है वो ईरान और मिडिल ईस्ट में चल रही अस्थिरता ही रहेगा जो आने वाले हफ्तों में ऊर्जा बाजार की दिशा काफी हद तक तय करेगा.
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