डरबन:
दुनिया में दूसरे सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देश अमेरिका ने सोमवार को उत्सर्जन कम करने की कानूनी बाध्यता को खारिज कर दिया और कहा कि वह ऐसा कोई वादा नहीं कर सकता, जब तक कि भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्था ऐसा नहीं करतीं। जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका के दूत टोड स्टर्न ने चीन की कटौती की सशर्त कानूनी बाध्यता को भ्रमित करने वाला बताया और कहा कि कानूनी बाध्यता के साथ कोई शर्त जुड़ा नहीं होना चाहिए। स्टर्न ने यहां संवाददाताओं से कहा, "कानूनी रूप से बाध्य समझौते पर बात करने को लेकर हमारी सम्भावनाएं खुली हुई हैं, लेकिन हम इसे तब तक नहीं स्वीकार कर सकते जब तक कि बड़े विकासशील देश इसे स्वीकार नहीं करते।" उन्होंने कहा कि अमेरिका तब तक किसी कानूनी रूप से बाध्य समझौते को नहीं मानेगा, जब तक उसे यह नहीं पता हो कि कौन-कौन से देश इसे मान रहे हैं और किस तरीके से मान रहे हैं। चीन ने सोमवार को पांच फीसदी की शर्त के साथ 2020 के बाद कानूनी रूप से बाध्य उत्सर्जन कटौती का प्रस्ताव रखा। साथ ही उसने क्योटो प्रोटोकॉल के तहत विकसित देशों द्वारा उत्सर्जन कटौती के लिए उठाए गए कदमों की समीक्षा की भी शर्त रखी।
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