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अमेरिकन ड्रीम छोड़कर भारत के स्टूडेंट अब यूरोप में पढ़ाई करने क्यों जा रहे?

यूरोप में अंग्रेजी माध्यम के मास्टर्स प्रोग्राम्स की संख्या तेजी से बढ़ी है. इससे भाषा की बाधा भी काफी हद तक दूर हो रही है.

अमेरिकन ड्रीम छोड़कर भारत के स्टूडेंट अब यूरोप में पढ़ाई करने क्यों जा रहे?
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सालों तक भारतीय छात्रों और उनके परिवारों के लिए विदेशों में पढ़ाई के लिए सबसे अच्छा देश अमेरिका हुआ करता था. स्टूडेंट अपने 'अमेरिकन ड्रीम' के लिए हर मुमकिन कोशिश करते थे, लेकिन अब यह ट्रेंड तेजी से बदल रहा है. 

अमेरिका के कड़े वीजा नियम, बढ़ती ट्यूशन फीस और लगातार बदलती इमिग्रेशन नीतियों की वजह से युवा भारतीय अब अमेरिका का रुख करने से कतरा रहे हैं. इसके उल्ट, यूरोप अब भारतीय प्रतिभाओं के लिए नए और बेहद आकर्षक विकल्प के तौर पर उभरा है.

हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुई ट्रेड डील और आसान वीजा नियमों ने छात्रों को यूरोप की ओर आकर्षित किया है. यूरोप केवल सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही नहीं दे रहा है, बल्कि पढ़ाई के बाद काम करने के साफ-सुथरे रास्ते भी खोल रहा है.

अमेरिका में वीजा की सख्ती

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप सरकार आने के बाद से विदेशी छात्रों के लिए वीजा नियमों को लगातार कड़ा किया जा रहा है. पिछले हफ्ते ही वॉशिंगटन ने विदेशी छात्रों के वीजा की अवधि कम करने के लिए कदम उठाए हैं.

इसके अलावा, अमेरिका और कनाडा में पढ़ाई का खर्च बहुत ज्यादा बढ़ चुका है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वीजा नियमों की सख्ती और बढ़ती लागत के कारण विदेशों में पढ़ने जाने वाले भारतीय छात्रों की कुल संख्या 2023 में 9,08,000 थी, जो 2025 में घटकर लगभग 6,26,000 पर आ गई.

यूरोप में ट्यूशन फीस 50% से 80% तक सस्ती

एजुकेशन कंसल्टेंसी 'केसी ओवरसीज' के अनुसार, यूरोप में ट्यूशन फीस अमेरिका के मुकाबले 50% से 80% तक कम है. इसके साथ ही वहां रहने का खर्च भी अमेरिका और कनाडा की तुलना में काफी कम है.

चेन्नई के 22 वर्षीय इंजीनियरिंग ग्रेजुएट ए. श्रीनिकेतन अमेरिका जाने की पारिवारिक परंपरा को छोड़कर जर्मनी में मास्टर्स की तैयारी कर रहे हैं. श्रीनिकेतन ने रॉयटर्स को बताया, "दुनिया अब बहुध्रुवीय हो रही है. पहले सिर्फ अमेरिका की ही बातें होती थीं, लेकिन अब हमारे पास अमेरिका और कनाडा से काफी सस्ते विकल्प मौजूद हैं."

भारत-EU ट्रेड डील से आसान हुआ रास्ता

भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुई ट्रेड डील के बाद से भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए यूरोप जाना बेहद आसान हो गया है.

स्टडी-अब्रॉड प्लेटफॉर्म 'लीप' के सह-संस्थापक अर्नव कुमार का कहना है कि यह पहली बार है जब कोई इतना बड़ा आर्थिक ब्लॉक बड़े पैमाने पर भारतीय टैलेंट को खुलकर आमंत्रित कर रहा है. आने वाले 3 से 5 सालों में यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों और वर्कर्स की संख्या में 60% से 70% तक का उछाल देखने को मिल सकता है.

हर देश की अपनी खासियत

भारतीय छात्र अब अपनी पसंद और करियर गोल के हिसाब से देशों का चुनाव कर रहे हैं. लेकिन हर देश की पढ़ाई और उसकी अपनी खासियत है. 

  •  जर्मनी- इंजीनियरिंग और टेक्निकल कोर्सेज के लिए.
  •  नेदरलैंड्स- बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस और जॉब अपॉर्चुनिटीज के लिए.
  •  फ्रांस- मैनेजमेंट और बिजनेस स्टडीज के लिए.
  •  पुर्तगाल- किफायती पोस्टग्रेजुएट रिसर्च के लिए.

यूरोपीय यूनिवर्सिटीज में भारतीयों के दाखिले में बड़ा उछाल

आंकड़ों के मुताबिक, नीदरलैंड्स में भारतीय छात्रों का दाखिला 2018/19 में 2,630 था, जो 2025/26 में बढ़कर 3,700 हो गया है. इसके साथ ही भारतीय छात्र नेदरलैंड्स में तीसरे सबसे बड़े गैर-यूरोपीय छात्र समूह बन गए हैं.

वर्तमान में लगभग 1,21,000 भारतीय छात्र यूरोपीय संघ में पढ़ाई कर रहे हैं. हालांकि यह आंकड़ा अमेरिका का आधा है, लेकिन जिस रफ्तार से इसमें बढ़ोतरी हो रही है, उसने यूरोप को अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के बराबर ला खड़ा किया है.

भाषा और आवास की समस्या

यूरोप में भारतीय छात्रों के लिए रास्ते तो खुले हैं, लेकिन कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं. जर्मनी या फ्रांस जैसे देशों में पढ़ाई के बाद लोकल जॉब मार्केट में टिकने के लिए वहां की भाषा सीखना बहुत जरूरी है.

एम्स्टर्डम जैसे बड़े यूरोपीय शहरों में छात्रों के लिए रहने की जगह की भारी किल्लत है. केवल डिग्री होने से नौकरी की गारंटी नहीं मिलती; इसके लिए स्पेशलाइज्ड स्किल्स होना अनिवार्य है.

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