अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का मामला गरमाया हुआ है. इस मामले में मंदिर के मैनेजमेंट से जुड़े 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. सभी आरोपियों को कोर्ट ने 29 जून को 14 दिन की न्यायिक हिरासत पर भेज दिया है. इतना ही नहीं, मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा ने इस्तीफा भी दे दिया
मंदिर के चढ़ावे में कथित गबन का मामला सामने आने के बाद से श्रद्धालुओं में नाराजगी है. आस्था के इस पावन केंद्र में चढ़ावे की गिनती और रखरखाव में हुई हेराफेरी के बाद यह बहस तेज हो गई है कि आखिर धार्मिक संपत्तियों और चढ़ावे के प्रबंधन को कैसे पूरी तरह सुरक्षित और अचूक बनाया जाए?
अगर हम वैश्विक स्तर पर नजर डालें, तो विदेशों में मुस्लिम और ईसाई देशों ने अपने धार्मिक स्थलों (मस्जिदों और चर्चों) को मिलने वाले चंदे के रखरखाव, पारदर्शिता और ऑडिटिंग के लिए बेहद कड़े, डिजिटल और कानूनी नियम बना रखे हैं. आइए समझते हैं कि वैश्विक स्तर पर यह पूरा सिस्टम कैसे काम करता है?
मुस्लिम देशों में 'मस्जिद और वक्फ' का मैनेजमेंट
इस्लामिक देशों (जैसे सऊदी अरब, यूएई, मलेशिया, इंडोनेशिया) में मस्जिद, मदरसों और धार्मिक संपत्तियों को संभालने के लिए 'वक्फ' और 'जकात' को मैनेज करने का एक बेहद मजबूत सिस्टम मौजूद है.
- वक्फ और मुतवल्ली की जिम्मेदारी: जब कोई व्यक्ति मस्जिद या समाज के कल्याण के लिए अपनी जमीन, संपत्ति या बड़ी रकम दान करता है, तो उसे 'वक्फ' कहा जाता है. इस्लामिक कानून के अनुसार, एक बार जो संपत्ति वक्फ हो गई, उसका मालिकाना हक इंसान से हटकर 'अल्लाह' का मान लिया जाता है, यानी उसे कोई बेच या चुरा नहीं सकता. इसे संभालने के लिए एक ट्रस्टी होता है जिसे 'मुतवल्ली' कहते हैं.
- मंत्रालय और सरकारी नियंत्रण: खाड़ी देशों में बाकायदा वक्फ और इस्लामिक मामलों का मंत्रालय होता है. मस्जिदों में आने वाले हर छोटे-बड़े चंदे, जुम्मे की नमाज के कलेक्शन और दान पेटियों पर सीधे इस सरकारी मंत्रालय का नियंत्रण होता है.
- कैशलेस और डिजिटल दान: सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए खाड़ी देशों और सिंगापुर जैसे देशों में अब मस्जिदों में कैश कलेक्शन को बहुत कम कर दिया गया है. वहां लोग सरकारी ऐप, क्यूआर कोड या डिजिटल गेटवे के जरिए सीधे वक्फ बोर्ड या मंत्रालय के खाते में दान जमा करते हैं, जिससे हेराफेरी की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाती है.
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पारदर्शिता, ऑडिटिंग और जवाबदेही
दान देने वालों (Donors) का भरोसा जीतने और जनता की नजर में संगठन की साख बनाए रखने के लिए वित्तीय पारदर्शिता और ऑडिटिंग अब अनिवार्य हो गई हैं.
- सालाना वित्तीय रिपोर्ट: 'इस्लामिक रिलीफ वर्ल्डवाइड' और 'IFRC' जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन अपने ऑडिटेड फाइनेंशियल स्टेटमेंट और प्रोजेक्ट्स के ग्राउंड इंपैक्ट को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करते हैं, ताकि यह साबित हो सके कि फंड का सही जगह इस्तेमाल हो रहा है.
- कड़े नियम और दिशानिर्देश: नाइजीरिया में 'SOZECOM' (सोकोतो स्टेट जकात एंड वक्फ कमीशन) ने NGO और जकात एजेंटों के लिए नियमित रिपोर्ट जमा करना और तय मूल्यांकन दिशानिर्देशों का पालन करना कानूनी रूप से जरूरी बना दिया है.
- डेटाबेस और लॉजिस्टिक्स ट्रैकिंग: 'जैज फाउंडेशन' (2022 की रिपोर्ट) ने नाइजीरिया की सोकोतो शाखा में लाभार्थियों के डेटाबेस और लॉजिस्टिक्स को ट्रैक करने के लिए डिजिटल सिस्टम लागू किया, जिससे न सिर्फ कामकाज तेज हुआ बल्कि पारदर्शिता के कारण डोनर्स का भरोसा भी बढ़ा.
टेक्नोलॉजी और डिजिटल टूल्स की भूमिका
- रणनीतिक सुधार: मोबाइल बैंकिंग, ऑनलाइन जकात कैलकुलेटर और क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म्स जैसी तकनीकों ने इस्लामिक चैरिटी के काम करने के तरीकों और उनके मानकों को बहुत बेहतर बना दिया है.
- ग्लोबल रीच और रियल-टाइम ट्रैकिंग: 'ग्लोबल सदका' और 'लॉन्चगुड' जैसे आधुनिक ऐप्स की मदद से डोनर्स दुनिया के किसी भी कोने से अपने दान को ट्रैक कर सकते हैं. इससे प्रोजेक्ट्स की लाइव निगरानी होती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही तय होती है.
- सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल: 'जमाअतु नस्रिल इस्लाम' (JNI) और 'सुल्तान फाउंडेशन' जैसे स्थानीय संगठनों ने अपनी ग्राउंड एक्टिविटीज को दिखाने, फंड जुटाने और इम्पैक्ट रिपोर्ट को शेयर करने के लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाया है.
- धोखाधड़ी पर लगाम: इन डिजिटल टूल्स के आने से सभी स्टेकहोल्डर्स (दानकर्ता, संगठन और लाभार्थी) आपस में सीधे जुड़ गए हैं, जिससे वित्तीय कुप्रबंधन, हेराफेरी या चंदा चोरी का जोखिम बेहद कम हो गया है.
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ईसाई देशों में मैनेजमेंट
ईसाई देशों, विशेष रूप से अमेरिका में ECFA (Evangelical Council for Financial Accountability) ने चर्च और दूसरी धार्मिक संस्थाओं की वित्तीय अनियमितताओं को रोकने के लिए कुछ कड़े नियम बना रखे हैं, जिनका पालन करना सभी के लिए जरूरी है:
- नियम 1- धार्मिक/सिद्धांत संबंधी विषय (Doctrinal Issues): प्रत्येक संगठन का एक लिखित 'आस्था का घोषणापत्र' होना चाहिए, जो स्पष्ट रूप से ईसाई मान्यताओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता हो. इसके साथ ही, संगठन का पूरा कामकाज और व्यवहार बाइबिल की शिक्षाओं और सच्चाई के अनुरूप होना चाहिए.
- नियम 2- गवर्नेंस (शासन व्यवस्था): चर्च या संगठन को चलाने के लिए एक जिम्मेदार बोर्ड होना चाहिए, जिसमें कम से कम 5 सदस्य हों. इन 5 सदस्यों में से बहुमत (अधिकांश सदस्य) स्वतंत्र होने चाहिए. यानी वे चर्च के पादरी के परिवार के सदस्य या वहां से वेतन पाने वाले कर्मचारी नहीं होने चाहिए. इस बोर्ड को नीतियां बनाने और चर्च के कामों की समीक्षा करने के लिए साल में कम से कम दो बार बैठक करनी अनिवार्य है.
- नियम 3- वित्तीय निगरानी: हर संगठन को पूरी तरह से सटीक और पारदर्शी फाइनेंशियल स्टेटमेंट (कमाई और खर्च का खाता) तैयार करना होगा. बोर्ड या स्वतंत्र सदस्यों की एक कमेटी ही एक बाहरी स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट (CPA) को नियुक्त करेगी, सालाना खातों की समीक्षा करेगी और उस अकाउंटेंट के साथ सीधा संपर्क बनाए रखेगी. अगर आंतरिक नियंत्रण (Internal Control) में कोई कमी या वित्तीय जोखिम दिखता है, तो इसकी जानकारी तुरंत बोर्ड को दी जानी चाहिए.
- नियम 4- संसाधनों का उपयोग और कानूनों का पालन: प्रत्येक संगठन को ऐसे उचित प्रबंधन और कड़े नियंत्रण लागू करने होंगे जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि चर्च के सभी संसाधन (पैसा और संपत्ति) जिम्मेदारी से इस्तेमाल हो रहे हैं. इसके साथ ही, चर्च का कामकाज देश के सभी सरकारी कानूनों और नियमों के दायरे में रहकर होना चाहिए.
- नियम 5- पारदर्शिता: प्रत्येक संगठन के नियमों में पारदर्शिता होना सबसे जरूरी है. यदि कोई व्यक्ति लिखित रूप से अनुरोध करता है, तो प्रत्येक संगठन को अपने वर्तमान फाइनेंशियल स्टेटमेंट (नियम 3 के तहत बने खाते) की एक प्रति उसे देनी होगी. इसके अलावा, यदि संगठन ने किसी विशेष प्रोजेक्ट या काम के लिए लोगों से दान मांगा है, तो लिखित अनुरोध पर उस प्रोजेक्ट के खर्च और बजट की पूरी रिपोर्ट भी सार्वजनिक करनी होगी.
- नियम 6- मुआवजा (सैलरी) तय करना और संबंधित पक्षों से लेनदेन: चर्च के सबसे बड़े लीडर (जैसे मुख्य पादरी या सीईओ) की सैलरी और भत्ते तय करने के लिए एक बेहद पारदर्शी तरीका अपनाना होगा. इसके अलावा, 'संबंधित पक्षों' के साथ लेनदेन (जैसे पादरी के किसी रिश्तेदार की कंपनी को चर्च का कोई कॉन्ट्रैक्ट देना) में पूरी ईमानदारी और नैतिकता बरती जानी चाहिए, ताकि कोई भी अपने पद का निजी फायदा न उठा सके.
- नियम 7- धर्मार्थ उपहारों/दान की रखवाली: इस नियम के 5 उप-भाग हैं, जो सीधे दान देने वालों के अधिकारों की रक्षा करते हैं:
- 7.1- संवाद में सच्चाई: दान मांगते समय चर्च जो भी दावे या जानकारियां देता है, वे पूरी तरह सच, सटीक और अपडेटेड होनी चाहिए. कोई भी भ्रामक तस्वीर या बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात इस्तेमाल नहीं की जा सकती.
- 7.2- दान देने वाले की इच्छा का सम्मान: जिस प्रोजेक्ट या काम के नाम पर दान मांगा गया है, पैसा उसी काम में खर्च होना चाहिए. दान देने वाले की मंशा और उसकी शर्तों का पूरा सम्मान करना होगा.
- 7.3- दान की रसीद/स्वीकृति: हर संगठन को दान देने वाले व्यक्ति को समय पर उसकी उचित रसीद या पावती (Acknowledgment) भेजनी होगी.
- 7.4- दानदाताओं के सर्वोत्तम हित में काम करना: बड़े दान के मामलों में चर्च के प्रतिनिधियों को दानदाता को सही सलाह देनी चाहिए. चर्च को जानबूझकर किसी ऐसे व्यक्ति से दान या कॉन्ट्रैक्ट नहीं लेना चाहिए जिससे उस व्यक्ति के खुद के जीवन या भविष्य पर कोई आर्थिक संकट आ जाए.
- 7.5- फंड जुटाने के लिए कमीशन पर रोक: चर्च अपने स्टाफ या बाहरी कंसलटेंट को इस आधार पर कमीशन या सैलरी नहीं दे सकता कि उन्होंने कितना दान जुटाया है. यानी जुटाए गए दान के प्रतिशत के आधार पर कोई भुगतान नहीं किया जाएगा, क्योंकि इससे धोखाधड़ी और लालच का खतरा बढ़ता है.
कैसे हो सकती है सुरक्षा?
दुनिया भर के ये उदाहरण यह साफ दिखाते हैं कि धार्मिक चंदे और संपत्तियों की सुरक्षा केवल कड़े नियमों, स्वतंत्र ऑडिट कमेटियों, सरकारी नियंत्रण और सबसे बढ़कर डिजिटल व कैशलेस तकनीकों के जरिए ही संभव है. जब तक प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक श्रद्धा के धन पर सेंधमारी का खतरा बना रहेगा.
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