- कोरिया पर जापान के कब्जे के दौरान किम इल सुंग ने कम्युनिस्ट गुरिल्ला के रूप में लड़ाई लड़ी और हीरो बने
- 1945 में कोरियाई प्रायद्वीप को अमेरिका और सोवियत संघ ने अस्थायी रूप से विभाजित किया गया था
- किम इल सुंग ने सत्ता संभालते ही विरोधियों को हटाकर गरीब किसानों को जमीन बांटकर जनसमर्थन हासिल किया
एक ऐसा देश, जहां सत्ता करीब 70 साल से एक ही परिवार के हाथ में है. शासन ऐसा कि कोई चूं तक न कर सके. पूरी दुनिया से कटा लेकिन जो अमेरिका जैसे सबसे बड़ी महाशक्ति को भी डराए रखता है. जहां आज भी किम इल सुंग की बनाई शख्सियत की पूजा जैसी छवि कायम है. यानी यहां के लोग उन्हें भगवान जैसे पूजते हैं या पूजने को मजबूर हैं. उनके पोते किम जोंग उन भी ‘जीता-जागता भगवान' माने जाते है. आप समझ ही गए होंगे कि हम बात नॉर्थ कोरिया की कर रहे हैं. लेकिन सवाल है कि आखिर नॉर्थ कोरिया में किम परिवार की तानाशाही की शुरुआत कैसे हुई. कैसे किम परिवार ने नॉर्थ कोरिया पर इतनी मजबूत पकड़ कैसे बनाई? इसकी शुरुआत हुई थी एक युवा गुरिल्ला लड़ाके से, जो जापानी कब्जे के खिलाफ लड़कर हीरो बना और आगे चलकर नॉर्थ कोरिया का तानाशाह बन गया.
जापान के खिलाफ लड़ने वाला गुरिल्ला लड़का
1910 में, जापान द्वारा कोरिया पर कब्जा करने और उसे अपना उपनिवेश बनाने के साथ ही कोरिया में चोसुन राजवंश का अंत हो गया. कोरियाई लोग आज भी जापानी औपनिवेशिक शासन को एक क्रूर अनुभव के तौर पर याद करते हैं. जैसे हम भारत के लोग अंग्रेजी शासन को याद करते हैं. कोरिया और चीन में बागी समूह बने, जिन्होंने दक्षिणपंथी जापानी सरकार के विरोध में ज्यादा लेफ्टिस्ट राजनीति को अपनाया. इस दौरान कोरिया में आधुनिकीकरण भी शुरू हुआ, और खासकर प्योंगयांग शहर ईसाई धर्म और पश्चिमी संस्कृति का एक जीवंत केंद्र बन गया.

10 जुलाई 1950 की फाइल फोटो में नॉर्थ कोरिया के तानाशाह राष्ट्रपति किम इल सुंग (फोटो- AFP)
1945 में जापान की हार के बाद, सोवियत संघ (रूस) और अमेरिका कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध के बाद के नियंत्रण को आपस में बांटने पर सहमत हुए. 10 अगस्त 1945 को, अमेरिका के दो युवा सैन्य अधिकारियों ने 38वें समानांतर (38th parallel) पर अमेरिका और सोवियत कब्जे वाले क्षेत्रों को अलग करने वाली एक रेखा खींची. यह बंटवारा अस्थायी होना चाहिए था. कहा गया कि यह कोरिया के लंबे इतिहास में बस एक छोटी सी घटना है. लेकिन शीत युद्ध के शुरू होने से यह एक बहुत अहम घटना बन गई. कोरिया में अपना-अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश में, अमेरिका और सोवियत संघ ने अपने पक्ष के नेताओं को सत्ता सौंपी, जबकि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास के कारण उन चुनावों पर सहयोग नहीं हो पाया जिनसे पूरे प्रायद्वीप के लिए एक नेता चुना जाना था. अमेरिका ने प्रायद्वीप के दक्षिणी हिस्से का नियंत्रण सिंगमैन री को सौंप दिया, जबकि सोवियत संघ ने उत्तर का नियंत्रण किम इल-सुंग को दे दिया. 1948 में, दोनों पक्षों ने खुद को वैध सरकार और पूरे कोरियाई लोगों का प्रतिनिधि होने का दावा किया.

सियोल में डॉक्यूमेंट पर साइन करते किम इल सुंग. 25 जून 1950 को नॉर्थ कोरिया की सेना ने साउथ कोरिया पर हमला किया था, जिससे कोरियाई युद्ध की शुरुआत हुई. (फोटो- AFP)
किम इल सुंग ने सत्ता संभालने के बाद अपने राजनीतिक विरोधियों और पुराने साथियों को एक-एक करके हटाया. यानी सत्ता को मजबूत करने के लिए उन्होंने डर और कठोर कार्रवाई दोनों का इस्तेमाल किया. लेकिन लोगों का समर्थन पाने के लिए उन्होंने सिर्फ सख्ती का सहारा नहीं लिया. एक तरह से उनके दिल में भी जगह बनाई. गरीब किसानों को लाखों एकड़ जमीन बांटी गई, जिससे उन्हें आम लोगों का समर्थन भी मिला.
काम की बात- किम परिवार का नॉर्थ कोरिया के शासक की कुर्सी पर जो दावा है, वह काफी हद तक उनके 'माउंट पेक्टू' वंश से होने के दावे पर टिका है. यह वंश कोरियाई लोगों के पौराणिक संस्थापक कहे जाने वाले डैंगन से जुड़ा हुआ है. नॉर्थ कोरिया में माना जाता है कि कोरिया की कहानी माउंट पैक्टू से ही शुरू होती है. यह चीन और उत्तर कोरिया की सीमा पर स्थित एक पहाड़ है, जिसे कोरिया को सबसे पहले देश का रूप देने वाले पौराणिक संस्थापक डैंगन का जन्मस्थान माना जाता है. किम इल सुंग ने जापानियों के खिलाफ जब लड़ाई लड़ी थी तो उस दौरान उन्होंने इसी पहाड़ का इस्तेमाल छिपने की जगह के तौर पर किया था. कहा जाता है कि उनके बेटे किम जोंग इल का जन्म भी इन्हीं पहाड़ों पर हुआ था. तब से दशकों तक इस पहाड़ का इस्तेमाल किम परिवार के शासन, उनकी तानाशाही को सही ठहराने के लिए किया जाता रहा है.
तानाशाही को बनाया परिवार की विरासत
किम इल सुंग सिर्फ अपने शासन को मजबूत करके नहीं रुके. उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनकी मौत के बाद सत्ता किसके हाथ में जाएगी. इसी सोच के साथ उन्होंने सत्ता को परिवार के अंदर रखने वाली वंशवादी व्यवस्था खड़ी कर दी. यही व्यवस्था आज तक चली आ रही है. किम इल सुंग के बनाए इस सिस्टम में उनकी शख्सियत को ‘जीता-जागता भगवान' जैसी छवि दी गई. उनकी बनाई व्यक्तित्व पूजा करीब 70 साल बाद भी नॉर्थ कोरिया में कायम है. आज देश पर उनके पोते किम जोंग उन का शासन है, जिन्हें भी इसी तरह की छवि के साथ पेश किया जाता है.
वैसे किम परिवार की तानाशाही को समझने के लिए कोरिया के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है. सदियों तक कोरिया पर शक्तिशाली राजाओं का शासन रहा, जहां लोगों से कड़े अनुशासन और वफादारी की उम्मीद की जाती थी. कोरियाई समाज पर कन्फ्यूशियन विचारों का भी गहरा असर था. इसमें समाज में असमानता को व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता था. लोगों की सामाजिक स्थिति तय होती थी और उनसे अपने से ऊपर के व्यक्ति की सेवा और आज्ञा मानने की उम्मीद की जाती थी.

आज भी जारी है किम परिवार की सत्ता
किम इल सुंग ने जिस व्यवस्था की नींव रखी, वह तीन पीढ़ियों से चली आ रही है. पहले उनके बेटे किम जोंग इल ने सत्ता संभाली और अब उनके पोते किम जोंग उन नॉर्थ कोरिया के शासक हैं. यानी करीब 70 साल पहले शुरू हुई किम परिवार की तानाशाही आज भी जारी है. किम इल सुंग ने जिस व्यक्तित्व पूजा की शुरुआत की थी, वह आज भी कायम है. इस तरह एक युवा गुरिल्ला लड़ाके से शुरू हुई सत्ता आज उसके पोते के शासन तक पहुंच चुकी है.
वैसे किम जोंग उन के सत्ता में आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है और वह कहानी उनकी मां से जुड़ती है. 15 सालों से अपनी ताकत के दम पर हुकूमत कर रहे किम जोंग उन ने कुर्सी पर रहते कभी भी सार्वजनिक रूप में अपनी मां का नाम तक नहीं लिया. एक बार भी नहीं. इसकी वजह जानने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.
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