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पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी 15% से घटकर 2% से भी कम कैसे हुई? ब्रिटिश संसद में पेश रिपोर्ट ने खोली पोल

पाकिस्तान में हिंदूओं का उत्पीड़न केवल सड़कों पर ही नहीं होता, बल्कि वहां कानूनों में भी दर्ज है. INSIGHT UK ने ब्रिटिश संसद के सामने ऐसे ठोस सबूत पेश किए, जिनसे पता चलता है कि पाकिस्तान में हिंदुओं को किस तरह निशाना बनाया गया, संपत्ति छीनी गई और उन्हें खत्म करने की कोशिश की गई.

पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी 15% से घटकर 2% से भी कम कैसे हुई? ब्रिटिश संसद में पेश रिपोर्ट ने खोली पोल
यह रिपोर्ट बताती है कि 1947 के दंगों के बाद से यह समुदाय किस तरह समय-समय पर हिंसा की लहरों का सामना करता रहा है

आतंकवाद को नेशनल पॉलिसी बनाने और मानने वाले पाकिस्तान में अप्लसंख्यकों की क्या स्थिति है, इसकी सूरत-ए-हाल एक बार फिर सामने आ गई है. पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे बर्ताव की कड़ी आलोचना करते हुए, प्रवासी संगठन INSIGHT UK ने बुधवार को ब्रिटिश संसद के सामने ऐसे ठोस सबूत पेश किए, जिनसे पता चलता है कि पाकिस्तान में हिंदुओं को किस तरह सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया गया, उनकी संपत्ति छीनी गई और उन्हें खत्म करने की कोशिश की गई.

'पाकिस्तान में हिंदुओं का धार्मिक उत्पीड़न' नाम की अपनी तीखी रिपोर्ट को 'ब्रिटिश हिंदुओं के लिए सर्वदलीय संसदीय समूह' के सामने पेश करते हुए, इस संगठन ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और आज के समय की दिल दहला देने वाली गवाहियों को एक साथ रखा. इससे यह साफ हो गया कि सीमा पार हिंदुओं को किस तरह के सुनियोजित भेदभाव, धार्मिक स्वतंत्रता पर हमलों और जान-माल व सम्मान के लिए खतरों का सामना करना पड़ रहा है.

15 प्रतिशत से 2 प्रतिशत रह गए हिंदू

रिपोर्ट की शुरुआत एक ऐसे आंकड़े से होती है जो उत्पीड़न की पूरी कहानी बयां कर देता है. 1941 की भारत की जनगणना के अनुसार, उस इलाके में, जो बाद में 'पश्चिम पाकिस्तान' बना, हिंदुओं की आबादी 14.6 प्रतिशत थी. बंटवारे के बाद, यह संख्या तेजी से गिर गई. आज, पाकिस्तान की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सात दशकों तक लगातार हुई इतनी बड़ी गिरावट, इस्लामाबाद के उस दावे पर सवाल खड़े करती है जिसमें वह कहता है कि वह अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है. इन आंकड़ों के पीछे हिंसा और आर्थिक रूप से घोंटने का एक लंबा इतिहास छिपा है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि 1947 के दंगों के बाद से ही इस समुदाय को समय-समय पर हिंसा की लहरों का सामना करना पड़ा है. हजारों हिंदू परिवारों को वहां से भागना पड़ा या विस्थापित होना पड़ा. उन्हें 'एनिमी प्रॉपर्टी लॉ' (शत्रु संपत्ति कानून) जैसे कठोर कानूनों के जरिए उनकी पुश्तैनी जमीन और खेतों से बेदखल कर दिया गया. इस कदम ने पूरे समुदाय को गरीबी और हमेशा के लिए विस्थापन की स्थिति में धकेल दिया.

कानून भी उत्पीड़न का जरिया

रिपोर्ट का तर्क है कि यह उत्पीड़न केवल सड़कों पर ही नहीं होता, बल्कि पाकिस्तान के कानूनों में भी दर्ज है. वहां के संविधान के अनुच्छेद 41 और 91 के अनुसार, केवल एक मुस्लिम ही राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बन सकता है. 2019 में लाए गए एक सुधार विधेयक को रोके जाने के बाद, यह प्रावधान आज भी बिना किसी चुनौती के कायम है.

हर पाकिस्तानी को अपने पासपोर्ट पर अपना धर्म बताना अनिवार्य है. यहां तक कि राजधानी इस्लामाबाद में भी कोई चालू हिंदू मंदिर नहीं है. आधिकारिक अनुमति मिलने के बावजूद, इस्लामी समूहों के हिंसक विरोध के कारण 2020 में पहले मंदिर का निर्माण रोक दिया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका है.

इस रिपोर्ट का सबसे भयावह हिस्सा महिलाओं और लड़कियों की दुर्दशा के बारे में है. पाकिस्तान में हर साल लगभग एक हजार या उससे अधिक हिंदू और ईसाई महिलाओं और लड़कियों का अपहरण कर लिया जाता है, उन्हें जबरन इस्लाम कबूल कराया जाता है और अपहरणकर्ताओं से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है. मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार इस तरह की घटनाओं को दर्ज किया है. इनमें से ज्यादातर पीड़ित गरीब परिवारों की नाबालिग लड़कियां होती हैं, जिनकी न्याय तक कोई पहुंच नहीं है.

ब्रिटिश सरकार से रखी यह मांग

रिपोर्ट के अंत में, UK सरकार के सामने पांच अहम मांगें रखी गई हैं. इनमें शामिल हैं कि UK-पाकिस्तान के बीच होने वाली हर बातचीत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को एक अनिवार्य शर्त बनाया जाए; मंदिरों की सुरक्षा और मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए समयबद्ध कदम उठाया जाए; पाकिस्तान को दी जाने वाली ब्रिटिश सहायता को मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार से जोड़ा जाए और अल्पसंख्यक अधिकार समूहों के लिए अलग से फंड सुरक्षित की जाए. इसके साथ ही इस्लामाबाद स्थित ब्रिटिश उच्चायोग में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए दो पद आरक्षित करना ताकि बिना किसी रुकावट या फिल्टर के अत्याचारों की रिपोर्ट मिल सके. इतना ही नहीं मांग है कि हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर हर छह महीने में एक आधिकारिक रिपोर्ट प्रकाशित करने को कहा जाए और जबरन धर्म परिवर्तन तथा धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय बने.

रिपोर्ट में विदेश सचिव, धार्मिक स्वतंत्रता या आस्था के मामलों में प्रधानमंत्री के विशेष दूत और हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) मामलों के मंत्री से कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है. इसमें जोर देकर कहा गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता एक मानवाधिकार है, और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, गरिमा तथा उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए.

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