- भले नेतन्याहू और उनकी सरकार बोले कि वह अमेरिका-ईरान डील में पार्टी नहीं है, उसे सीजफायर की बात माननी होगी
- अगर इजरायली सेना ने फिर से हमला किया, खासकर लेबनान में तो उसे ट्रंप की नाराजगी झेलनी पड़ेगी
- नेतन्याहू को अब पता है कि ईरान में पहले से ज्यादा कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में बैठ चुकी हैं
अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म हो चुकी है और शांति डील भी फाइनल है. 107 दिनों की इस जंग में सबसे बड़ी नाकामी किसी के हाथ लगी है तो उसमें इजरायल और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का नाम लिया जा रहा है. जिस जंग पर नेतन्याहू ने अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर लगाया, उस के अंत में न तो ईरान में सत्ता बदली, न उसके मिसाइल कार्यक्रम पर कोई बड़ी रोक दिखी. अब लेबनान में भी इजरायल की सैन्य कार्रवाई पर ताला लग सकता है. सवाल इजरायल की उस खुफिया एजेंसी मोसाद की काबिलियत पर भी उठ रहे हैं, जो खुद को बेस्ट बताती आई है. चलिए समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे अमेरिका-ईरान डील का सबसे बड़े लूजर खुद नेतन्याहू बन गए हैं?
यह इजरायल और नेतन्याहू की हार क्यों है?
इजरायल के नजरिए से पहले जंग के बैकग्राउंड को समझिए. इजरायल और अमेरिका ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था. भले आखिर तक आते-आते, युद्ध के मकसद को लेकर अमेरिका और इजरायल के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए, बात ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच गाली-गलौज तक आ गई, लेकिन यह तो इजरायल को भी पता है कि वह एक हद से आगे जाकर अमेरिका (इसे ट्रंप पढ़ा जाए) की बातों को नजरअंदाज नहीं कर सकता. भले नेतन्याहू और उनकी सरकार बोले कि वह अमेरिका-ईरान डील में पार्टी नहीं है, उसे सीजफायर की बात माननी होगी. अगर उसने फिर से हमला किया, खासकर लेबनान में तो उसे ट्रंप की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. यानी ईरान को नापने के चक्कर में लेबनान से भी कंट्रोल गया, सीजफायर वहां भी लागू हो जाएगी.
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NDTV से बात करते हुए विदेश संबंधों के एक्सपर्ट रॉबिंद्र नाथ सचदेव ने कहा कि उनके अनुसार इस जंग के बाद हो रही डील में सबसे बड़े लूजर इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू साबित हुए हैं. उन्होंने कहा, "नेतन्याहू ने अपने राजनीतिक भविष्य का पूरा दांव इसी जंग पर लगा रखा था. नेतन्याहू ने तो 3 जंग शुरू की- गाजा, लेबनान और ईरान. और तीनों में वैसा कोई फाइनल रिजल्ट नहीं आया जिसका वादा उन्होंने किया था. ईरान में सत्ता नहीं बदली, ईरान के बैलिस्टिक मिसाइलों पर नकेल इस डील में नहीं दिखती. अब इजरायल लेबनान पर भी अटैक नहीं कर सकता. कुल मिलाकर नेतन्याहू के लिए अपने ही देश के अंदर चुनौती बढ़ जाएगी."
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नेतन्याहू को अब पता है कि ईरान में पहले से ज्यादा कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में बैठ चुकी हैं. मौजूदा सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई यह बात कभी नहीं भूलेंगे कि इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर उनके पिता की हत्या की है. ईरान और उसके प्रॉक्सी अभी भी इजरायल के लिए खतरा हैं. ईरान तो यहां तक कह सकता है कि अमेरिका और ईरान मिलकर हमें नहीं हरा पाए. यह नैरेटिव मिडिल ईस्ट में इजरायल की ताकत और उसके जियोपॉलिटिकल इंटरेस्ट के लिए खतरा है.
रॉबिंद्र नाथ सचदेव ने इस पूरे युद्ध को लेकर यह भी कहा कि इसमें इजरायल की खुफिया एजेंसी (मोसाद) की नाकामी दिखी है. उन्होंने कहा, "इजरायल की खुफिया इंटेलिजेंस ने ही अमेरिका को बताया था कि अगर पूर्व सुप्रीम लीडर खामेनेई को मार गिराया तो ईरान में लोग सड़कों पर आ जाएंगे, तख्तापलट हो जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. यह नाकामी भी नेतन्याहू के सिर ही जाती है क्योंकि उन्होंने ही अमेरिका के सामने इस इंटेलिजेंस को रखा था."
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