शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खाद्य, नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता मामले, नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. माना जा रहा है कि सितंबर-अक्तूबर में होने वाले मंत्रिपरिषद फेरबदल तक यह मंत्रालय उन्हीं के पास रहेगा. उसके बाद हो सकता है कि या तो कोई नया शिक्षा मंत्री आए या फिर जोशी ही इस पद पर बने रहें. पर यह कहना गलत नहीं होगा कि चाहे कुछ महीनों के लिए ही सही, जोशी ने कांटों का ताज पहना है. उन्होंने एक ऐसे समय शिक्षा मंत्रालय का काम संभाला है, जब यह चर्चा और विवादों का केंद्र बना हुआ है.
वैसे भी पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार में सबसे अधिक मंत्री जिस मंत्रालय ने देखे हैं. उनमें सूचना एवं प्रसारण के साथ ही शिक्षा मंत्रालय भी है. स्मृति ईरानी, प्रकाश जावडेकर, रमेश पोखरियाल निशंक और धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब प्रल्हाद जोशी. यानी पिछले बारह साल में वे पांचवे शिक्षा मंत्री हैं और कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है. हालांकि इनमें सबसे अधिक समय यानी पांच साल तक धर्मेंद्र प्रधान ही शिक्षा मंत्री रहे, लेकिन वे सरकार के दो अलग-अलग कार्यकालों में इस पद पर रहे हैं. भाजपा सरकारों में शिक्षा मंत्रालय पर इसलिए अधिक फोकस रहता है क्योंकि यह आरएसएस का पसंदीदा मंत्रालय है.
विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति हो या अध्यापन के क्षेत्र में अन्य नियुक्तियां, आरएसएस की पसंद हावी रहती है. शिक्षा नीति से लेकर पाठ्यक्रम तय करने तक में संघ की चलती है. प्रधान इस लाइन पर ही चल रहे थे, लेकिन पहले यूजीसी दिशानिर्देशों पर विवाद, सीबीएसई परीक्षा मूल्यांकन में ओएमआर शीट को लेकर गड़बड़ियां और उसके बाद नीट पेपर लीक के कारण छात्र आंदोलन ने उनकी विदाई सुनिश्चित कर दी. उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सफलतापूर्वक लागू किया और शिक्षा सुधारों को आगे बढ़ाया. अब जोशी एक ऐसे समय पर आए हैं, जब सोमवार को ही सबसे पहले पेपर लीक से जुड़ा संशोधन विधेयक लोक सभा के एजेंडे में है.
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जाहिर है इस पर चर्चा भी होगी और बतौर शिक्षा मंत्री जोशी को अपनी बात भी रखनी होगी. उन्हें छात्रों को दिए गए आश्वासन का उल्लेख भी करना होगा और विपक्ष के हमले का राजनीतिक जवाब भी देना होगा. साथ ही, उनकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर मंत्रालय की प्रशासनिक साख बहाल करना, परीक्षा प्रणाली में सुधार और नीतिगत फैसलों को पटरी पर लाना होगा. जोशी के एजेंडे में सबसे ऊपर राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी एनटीए का पुनर्गठन होगा क्योंकि प्रधान ने इस काम को अगले एक महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा है. नीट और नेट जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में हुए विवादों के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए का कायाकल्प होना है.
इसके लिए उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को लागू कर सुरक्षा प्रोटोकॉल, डिजिटल सुरक्षा और पूरी तरह पारदर्शी परीक्षा ढांचा तुरंत स्थापित करना होगा. जंतर मंतर पर आंदोलन करने वाले छात्रों के साथ सरकार को एक महीने बाद फिर से शिक्षा सुधारों को लेकर बातचीत करनी है. यह आश्वासन दिया गया है और सीजेपी की ओर से पांच मांगों का मांग पत्र भी सरकार को दिया गया है. इसमें एनटीए के स्थान पर स्थायी स्टाफ वाला कमीशन बनाना, पेपर लीक होने या परीक्षा रद्द होने पर हर छात्र को दस हजार रुपए का मुआवजा देना, आपात स्थिति में परीक्षा रद्द होने पर 72 घंटों में दोबारा परीक्षा कराना, ओएमआर की जगह फिजिकल मूल्यांकन कराना और राज्यों को यह छूट देना कि वह अपने कोटे की मेडिकल सीटों के लिए नीट परीक्षा से बाहर हो सके.
मांगों पर कितना हुआ अमल, सीजेपी भी रखेगी बारीकी से नजर
जाहिर है सीजेपी इन मांगों के अमल पर बहुत बारीकी से ध्यान रखेगी और सरकार से जवाब-तलब कर सकती है. पांच राज्यों के आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इनमें से किसी भी मांग को पूरा न होने पर सीजेपी पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में छात्रों को लामबंद करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी जिसका राजनीतिक खमियाजा भी बीजेपी को उठाना पड़ सकता है. इसके साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रगति और अटकी फाइलों की समीक्षा भी करनी होगी. विशेषकर नए पाठ्यक्रम ढांचे (NCF) और स्कूली पुस्तकों/सामग्रियों के समय पर प्रकाशन का जायजा भी लेना होगा.
गैर-भाजपा शासित राज्यों से भी जोशी को बनाना होगा सामंजस्य
जोशी को गैर-भाजपा शासित राज्यों के साथ नीतिगत सामंजस्य भी बैठाना होगा. शिक्षा समवर्ती सूची का विषय होने के कारण तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्ष के शासन वाले राज्यों के साथ भाषा, बोर्ड परीक्षा और राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षाओं पर सहमति बनानी होगी. तमिलनाडु एक बार फिर नीट से बाहर जाने की मांग कर चुका है. साथ ही, उच्च शिक्षा संस्थानों में रिक्त पदों को भरना भी एक चुनौती होगी. केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी और आईआईएम में शिक्षकों व प्रशासनिक पदों की रिक्तियों को तेजी से भरना होगा. अनुसंधान फंड के वितरण को पारदर्शी और सुलभ बनाना होगा ताकि भारतीय विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग में सुधार हो सके.
परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में चूक बनती है बड़ी टेंशन
प्राथमिक शिक्षा में 'लर्निंग गैप' कम करना भी शिक्षा मंत्रालय के सामने चुनौती बना हुआ है. एएसईआऱ रिपोर्ट में उजागर बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता के अंतर को दूर करने के लिए राज्यों के साथ मिलकर ठोस कदम उठाना होगा. भारत एक युवा देश है. युवाओं और उनके अभिभावकों की अपेक्षाएं बहुत ऊंची हैं. किसी भी परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में छोटी सी चूक भी राष्ट्रीय स्तर पर जनाक्रोश का रूप ले लेती है जैसा कि नीट पेपर लीक के बाद देखने में आया है. यह एक हाई रिस्क, लो मार्जिन फॉर एरर वाला मंत्रालय है जिसमें सफलता का श्रेय धीरे-धीरे मिलता है, लेकिन एक छोटी सी विफलता (जैसे पेपर लीक या प्रशासनिक चूक) तुरंत बड़ा राजनीतिक और सामाजिक तूफान खड़ा कर देती है.
शिक्षा मंत्रालय का हर कदम बनता है चर्चा का विषय
शिक्षा नीति केवल इंफ्रास्ट्रक्चर या बजट तक सीमित नहीं है; यह देश के सांस्कृतिक, सामाजिक और वैचारिक ताने-बाने से जुड़ी है. इसलिए इसमें उठाया गया हर कदम राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में कड़ी निगरानी में रहता है. प्रल्हाद जोशी के लिए सबसे पहली चुनौती किसी नई नीति को पेश करना नहीं, बल्कि मौजूदा प्रणाली में खोया हुआ जनता का विश्वास बहाल करना है. प्रतियोगी परीक्षाओं का सुचारू संचालन और हर हाल में पेपर लीक रोकना सुनिश्चित करना होगा. शिक्षा मंत्री का पद हमेशा से ही नीतिगत, सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण में से एक रहा है. इसलिए नए शिक्षा मंत्री का काम आसान रहने वाला नहीं है.
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