उम्मीद और बेचैनी... जंतर-मंतर से लौटते छात्रों से बातचीत- 'धर्मेंद्र प्रधान से हमारी पर्सनल दुश्मनी नहीं थी'
जंतर-मंतर पर 37 दिनों का आंदोलन खत्म कर घर वापस लौट रहे बच्चे क्या क्या खुद को जीता हुआ महसूस कर रहे हैं. क्या अब उन्हें उम्मीद है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा? NDTV ने उन्हीं से पूछा.
"सिर्फ टॉप पर बैठा इंसान गया है, लेकिन ढांचा तो नहीं बदला है."
यह कहना है वैदेही राजपूत का, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करती हैं. उनकी यह एक बात 25 जुलाई की रात दिल्ली के जंतर-मंतर से लौटते हजारों छात्रों के मन में आ रहे ख्यालों को बयान करती है. 37 दिनों के बाद इन छात्रों का आंदोलन खत्म हो चुका है. CJP के नेतृत्व में ये छात्र जीत का ऐलान करके वापस लौटे, लेकिन उनके साथ सिर्फ जश्न नहीं, कई सवाल भी लौट रहे थे. देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मिल गया, लेकिन क्या इससे शिक्षा व्यवस्था भी बदल जाएगी? क्या पेपर लीक जैसी घटनाएं अब सचमुच रुक जाएंगी?
NDTV ने आंदोलन खत्म होने के बाद जंतर-मंतर से लौटते इन स्टूडेंट्स से बात की और समझने की कोशिश की कि क्या वे खुद को जीता हुआ महसूस कर रहे हैं. क्या अब उन्हें उम्मीद है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा?
"निर्भया आंदोलन के बाद महिलाओं के खिलाफ क्राइम कम थोड़ी हो गया"
अंशुल यादव ने भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है और अभी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है कि छात्रों की मुख्य मांग, जो नीट पेपर से जुड़ी थी, वह पूरी हो गई है, लेकिन इसके बाद जो कदम उठाए जाएंगे, वे अहम होंगे. उन्होंने NDTV से बात करते हुए कहा, "हमें याद रखना होगा कि नीट पेपर लीक का मुद्दा सबको एक साथ लाने वाला मुद्दा था, लेकिन वह अकेला मुद्दा नहीं था. यह बस शुरुआत है, पूरा न्याय मिलना अभी बाकी है. सिर्फ एक नेता को हटाकर यह सिस्टम सही नहीं हो सकता. ऐसा तो नहीं है न कि निर्भया आंदोलन के बाद महिलाओं के खिलाफ क्राइम कम हो गया है. एक पद पर बदलाव करके सब कुछ सही नहीं हो सकता. वक्त लगेगा."

अंशुल यादव 7 दिन इस छात्र आंदोलन में शामिल होने के लिए जंतर मंतर पहुंचे थे (फोटो- एनडीटीवी)
"हम जो लक्ष्य लेकर आए थे, उसे पूरा कर लिया"
वैदेही राजपूत मूल रूप से सागर, एमपी की हैं और अभी डीयू में पढ़ाई कर रही हैं. उनके लिए छात्रों के आंदोलन को तभी सफल माना जाएगा, जब शिक्षा विभाग में वे गलतियां नहीं दोहराई जाएंगी, जो पहले हुई थीं. उन्होंने कहा, "शिक्षा मंत्री चाहे एक दिन के विरोध-प्रदर्शन के बाद इस्तीफा दें या फिर 37 दिनों के आंदोलन के बाद, सिर्फ पद से हट जाने से चीजें मैटर नहीं करतीं. सवाल तो यह है कि क्या नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) इस बात की जिम्मेदारी लेती है कि आगे जो पेपर होंगे, वे लीक नहीं होंगे. हम बात सिर्फ नीट एग्जाम की नहीं कर रहे हैं. पूरी सरकार और नए शिक्षा मंत्री इसकी जिम्मेदारी लेते हैं या नहीं, इस छात्र आंदोलन को सही मायनों में सफल उसी आधार पर माना जाएगा. सिर्फ टॉप पर बैठा इंसान गया है, लेकिन ढांचा तो नहीं बदला है न. अगर आगे पुरानी गलतियां नहीं दोहराई गईं, तब हम कह सकेंगे कि हमारा प्रोटेस्ट सफल रहा."

वैदेही राजपूत (सबसे दाएं) अपनी दोस्तों के साथ जंतर-मंतर पहुंची थीं (फोटो- NDTV)
इसके साथ ही उनका यह भी मानना है कि एक मंत्री का हटना छोटी बात नहीं है. उन्होंने कहा, "वैसे अगर हमारी जेन-जी की सुनकर सरकार ने एक मंत्री को हटा दिया है, तो यह हमारे लिए एक उपलब्धि है. धर्मेंद्र प्रधान से हमारी कोई पर्सनल दुश्मनी थोड़ी थी. आप पद पर थे, इसलिए आपसे इस्तीफा मांग रहे थे. पद पर चाहे किसी भी पार्टी का नेता बैठे, हमें बस चाहिए कि पेपर लीक न हो."
"स्टूडेंट्स को तो जीतना ही था. इस्तीफा तो होना ही था"
कशिश कॉर्पोरेट जॉब के साथ पढ़ाई करती हैं और तीसरी बार आंदोलन में पहुंची थीं. उनके अनुसार स्टूडेंट्स जीत गए हैं. उन्होंने कहा, "स्टूडेंट्स जो लक्ष्य लेकर आए थे, उन्होंने उसे पूरा कर लिया है. बच्चों ने मार खाई, 37 दिनों में उन्होंने इतने दुख-दर्द सहे हैं. इसके बाद तो स्टूडेंट्स को जीतना ही था. इस्तीफा तो होना ही था. अगर इस्तीफा नहीं देते, तो यह प्रोटेस्ट और लंबा जाता, अगले महीने तक चलता."

कशिश का कहना है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से बदलाव आएगा (फोटो- एनडीटीवी)
केरल से खास इस आंदोलन में शामिल होने पहुंचे बीटेक फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट निरूपम एस. दिनेश का कहना है कि इस इस्तीफे के बाद शिक्षा विभाग में बैठे लोगों को डर लगेगा. उन्होंने कहा, "जो भी आएगा, उसे पूरे सिस्टम को सुधारने के बारे में सोचना होगा. यह सिर्फ एक शुरुआत है. बाकी दूसरा वादा पूरा नहीं हुआ है. सुसाइड करने वाले बच्चों के परिवार को जब एक करोड़ देंगे, तब जाकर सही कहें तो यह आंदोलन सफल होगा."

निरूपम एस. दिनेश केरल से अपनी दोस्त के साथ 25 जुलाई को ही दिल्ली पहुंचे थे, खास तौर पर आंदोलन में शामिल होने के लिए (फोटो- NDTV)
अपना नाम न छापने की शर्त पर एक स्टूडेंट ने NDTV से बात की और कहा कि जब तक पूरे सिस्टम की सफाई सही तरह से नहीं होगी, हमारा आंदोलन अधूरा रहेगा. अपने तीन दोस्तों के साथ दूसरी बार आंदोलन में शामिल होने आई इस स्टूडेंट ने कहा, "मुझे लगता है उन्होंने बच्चों को एक टॉफी पकड़ा दी है, ताकि वे अभी के लिए रोना बंद करें. यह अच्छी बात है कि इस्तीफा हो गया, लेकिन लंबे समय तक शिक्षा विभाग पर इसका असर होगा, इस बात को लेकर मुझे शक है."

इस स्टूडेंट के लिए आंदोलन में जीत मिली है लेकिन यह शुरुआत भर है (फोटो- NDTV)
अपने-अपने घर लौट चुके इन छात्रों के लिए यह कहानी एक इस्तीफे पर खत्म नहीं होती, बल्कि एक सवाल पर आकर ठहर जाती है. 37 दिनों तक जंतर-मंतर पर गूंजे नारों की आवाज अब थम चुकी है, मंच भी हट चुका है और हजारों छात्र अपने-अपने शहर लौट चुके हैं. लेकिन उनके साथ उम्मीद भी लौटी है और बेचैनी भी. किसी के लिए यह ऐतिहासिक जीत है, तो किसी के लिए सिर्फ पहली सीढ़ी. क्योंकि छात्रों की नजर में असली परीक्षा अब सरकार और शिक्षा व्यवस्था की है.
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