विदेश मंत्री एस. जयशंकर जब पोलैंड पहुंचे थे तो उन्होंने किसी युद्ध नायक, राष्ट्रपति या सैनिक को नहीं, बल्कि दो भारतीय राजाओं को श्रद्धांजलि दी. कारण ? दरअसल इन राजाओं ने वो काम किया था, जो उस दौर में दुनिया के बड़े-बड़े देश नहीं कर पाए थे. हुआ ये था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हजारों पोलिश बच्चे अपने माता-पिता से बिछड़ गए थे. वे शरणार्थी बन गए थे. तब गुजरात के जाम साहेब दिग्विजयसिंहजी और कोल्हापुर राजघराने ने उनके लिए अपने महल और जमीन के दरवाजे खोल दिए. तब एक हजार नहीं, दो हजार नहीं, बल्कि छह हजार पोलिश नागरिकों को भारत में नया जीवन मिला. यही वजह है कि पोलैंड में आज भी उनका 'गुड महाराजा' के नाम से सम्मान किया जाता है और भारत को दोस्त नहीं, संकटमोचक की तरह याद किया जाता है. ऐसे सवाल उठता है कि आखिर कौन थे ये राजा और वो क्या कहानी है कि आठ दशक बाद भी पोलैंड उनका एहसान नहीं भूल पाया जानिए इस रिपोर्ट में
“I am Bapu, the father of all Nawanagaris, including yourselves.”
— Dr. S. Jaishankar (@DrSJaishankar) September 5, 2026
Visited the Memorial of the ‘Dobry (Good) Maharaja' of Jamnagar in Warsaw today.
Thank MP @gajewska_kinga and Ochota Mayor Piotr Krasnodębski for joining.
Jamsaheb Digvijaysinhji Ranjitsinhji Jadeja ji is fondly… pic.twitter.com/4agSAG8mvu
क्यों शरणार्थी बनना पड़ था पोलैंड के नागरिकों को
दरअसल 1 सितंबर 1939. नाजी जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया. कुछ ही दिनों बाद सोवियत संघ ने दूसरी तरफ से घुसपैठ कर दी. जिसके बाद यूरोप के नक्शे पर मौजूद एक देश दो महाशक्तियों के बीच बंट गया. लाखों पोलिश नागरिकों को उनके घरों से उठाकर साइबेरिया और मध्य एशिया के श्रम शिविरों में भेज दिया गया. इनमें हजारों बच्चे भी थे. ऐसे बच्चे, जिनके पिता युद्ध में मारे गए, मां भूख और बीमारी से दम तोड़ गईं, या फिर पूरा परिवार बिछड़ गया था. हालांकि 1941 में हालात बदले. सोवियत संघ ने कुछ पोलिश नागरिकों को रिहा किया. जिसके बाद हजारों बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग किसी तरह ईरान पहुंचे. लेकिन अब एक नया संकट उनके सामने था. उन्हें कोई देश अपनाने को तैयार नहीं था. वे युद्ध के अनचाहे शरणार्थी बन चुके थे. इन्हीं कठिन हालातों के बीच हजारों किलोमीटर दूर भारत से एक आवाज आई.

पोलैंड दौरे पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारतीय राजाओं की याद में बनी स्मारक पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की.
"तुम अब अनाथ नहीं हो. तुम नवानगर के बच्चे हो. मैं तुम्हारा बापू हूं."
यह आवाज थी गुजरात की नवानगर रियासत के महाराजा दिग्विजयसिंहजी जडेजा की. बाद में महाराष्ट्र के कोल्हापुर राजघराने ने भी हजारों पोलिश महिलाओं और बच्चों को शरण दी. आज 80 साल बाद भी पोलैंड इन भारतीय शासकों को सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि अपना रक्षक मानता है. यही वजह है कि जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर वारसॉ पहुंचे, तो उन्होंने उन स्मारकों पर श्रद्धांजलि दी, जो भारत की मानवता की इस अनोखी कहानी को आज भी जीवित रखते हैं.
जब जाम साहेब ने कहा था, "मैं तुम्हारा बापू हूं"
1942 में पोलिश बच्चों का पहला बड़ा समूह भारत पहुंचा. ये वे बच्चे थे जो साइबेरिया के श्रम शिविरों, भूख और बीमारी की भयावह परिस्थितियों से बचकर निकले थे. कई बच्चे ऐसे थे जिन्हें नहीं पता था कि उनके माता-पिता जिंदा हैं भी या नहीं. कुछ ने रास्ते में अपने परिवार खो दिए थे. ऐसी स्थिति में महाराजा दिग्विजयसिंहजी जडेजा ने जामनगर के पास बालाचड़ी में अपने समुद्र तट के पास मौजूद अपने आवास के नजदीक ही विशेष शिविर बनवाया. यहां बच्चों के लिए छात्रावास, स्कूल, खेल का मैदान, चिकित्सा सुविधा और भोजन की व्यवस्था की गई.
यही एक वाक्य हजारों पोलिश परिवारों की सामूहिक याद का हिस्सा बन गया. जिन बच्चों ने अपना सब कुछ खो दिया था, उन्हें पहली बार लगा कि कोई उनका अपना भी है. बालाचड़ी शिविर में बच्चे पोलिश भाषा में पढ़ते थे, अपनी संस्कृति को बचाकर रखते थे और युद्ध खत्म होने तक अपेक्षाकृत सुरक्षित जीवन जी सके. कई पूर्व शरणार्थियों ने बाद में कहा कि अगर जाम साहेब ने मदद न की होती तो शायद वे जीवित नहीं बचते. इसी मानवीय पहल के कारण पोलैंड ने उन्हें "Dobry Maharaja" यानी "गुड महाराजा" की उपाधि दी.
कोल्हापुर ने भी खोले थे अपने दरवाजे
गुजरात का बालाचड़ी शिविर पोलिश शरणार्थियों की मदद का पहला बड़ा उदाहरण था, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही महाराष्ट्र के कोल्हापुर के वालिवडे में भी एक विशाल पोलिश शरणार्थी बस्ती बसाई गई. यहां लगभग 5000 पोलिश महिलाओं, बच्चों और अन्य नागरिकों को रहने की जगह मिली.
युद्ध खत्म होने के बाद इनमें से कई लोग यूरोप, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में बस गए, लेकिन भारत में बिताए वर्षों को वे कभी नहीं भूले. आज भी पोलैंड में वालिवडे और भारतीय मदद की स्मृति को सहेज कर रखा गया है. यह सिर्फ एक राहत शिविर नहीं था, बल्कि हजारों टूटे हुए लोगों के लिए नई शुरुआत का केंद्र था.
ये भी पढ़ें: सूअर की किडनी ने 271 दिन तक बचाई जान, फिर मिली इंसानी किडनी : बन गया नया रिकॉर्ड
पोलैंड आज भी भारत को क्यों याद करता है?
युद्ध समाप्त हुए आठ दशक बीत चुके हैं. नवानगर रियासत अब इतिहास का हिस्सा है. जाम साहेब और उस दौर के अधिकांश प्रत्यक्ष गवाह भी दुनिया में नहीं हैं. लेकिन पोलैंड में आज भी उनके नाम पर चौक, स्मारक और शैक्षणिक संस्थान मौजूद हैं. अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पोलैंड दौरे के दौरान "गुड महाराजा स्क्वायर" पर श्रद्धांजलि अर्पित की थी. उसके बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी वारसॉ में गुड महाराजा मेमोरियल और कोल्हापुर मेमोरियल पर जाकर सम्मान व्यक्त किया.यह श्रद्धांजलि सिर्फ इतिहास को याद करने की रस्म नहीं है. यह उस भारतीय सोच की पहचान है जिसमें जरूरतमंद की मदद उसकी राष्ट्रीयता, धर्म या भाषा देखकर नहीं की जाती. जब दुनिया युद्ध में उलझी हुई थी और अधिकांश देश पोलिश शरणार्थियों को अपनाने से बच रहे थे, तब भारत के दो राजाओं ने इंसानियत को राजनीति से ऊपर रखा. शायद यही वजह है कि पोलैंड में आज भी लोग जाम साहेब को राजा नहीं, "बापू" के रूप में याद करते हैं.
ये भी पढ़ें: Google Maps से स्कूल की किताबों तक...UN के नए नक्शे में भारत के लिए क्या बदलेगा?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं