- 16 साइकी एक क्षुद्रग्रह या एस्टेरॉयड है, जो मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच मौजूद एस्टेरॉयड बेल्ट में घूम रहा है
- ज्ञानिकों का अनुमान है कि इसमें सोना, प्लैटिनम और निकेल जैसी कीमती धातुएं बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद हैं
- एस्टेरॉयड पर मौजूद उन सारे धातुओं की अनुमानित कीमत लगभग $700 क्विंटिलियन हो सकती है
आप बस कल्पना कीजिए कि अगर अंतरिक्ष में घूम रही एक विशाल चट्टान से इतना सोना और दूसरी कीमती धातुएं मिल जाएं कि धरती का हर एक इंसान अरबपति बन जाए. हम आपको किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि 16 साइकी (16 Psyche) नाम के एक एस्टेरॉयड की कहानी बता रहे हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि तमाम ग्रहों की तरह सूरज की चक्कर काटती इस चट्टान में सोना, प्लैटिनम और निकेल जैसी कीमती धातुएं इतनी बड़ी मात्रा में हो सकती हैं कि इसकी अनुमानित कीमत हमारी कल्पना से भी कहीं ज्यादा है. लेकिन सवाल है कि क्या इस खजाने तक पहुंचना इतना आसान है? चलिए आपको बताते हैं.
16 साइकी में सोने की खान!
16 साइकी एक क्षुद्रग्रह या एस्टेरॉयड है, जो मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच मौजूद एस्टेरॉयड बेल्ट में घूम रहा है. इसका व्यास (डायमीटर) करीब 225 किलोमीटर है. इसकी खोज 1852 में इटली के खगोलशास्त्री अन्नीबाले डे गैस्पारिस ने की थी. इसे M-टाइप (मेटालिक) एस्टेरॉयड माना जाता है. यानी यह सामान्य पत्थरों की तरह नहीं, बल्कि धातुओं से भरपूर हो सकता है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसमें सोना, प्लैटिनम और निकेल जैसी कीमती धातुएं बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद हैं.

कुछ ऐसा दिखता है 16 Psyche एस्टेरॉयड (फोटो- नासा)
नासा का खास मिशन
इस रहस्यमयी एस्टेरॉयड के बारे में जानने के लिए नासा ने 13 अक्टूबर 2023 को साइकी मिशन लॉन्च किया था. यह अंतरिक्ष यान 2029 में 16 साइकी तक पहुंचेगा. इस मिशन का मकसद वहां से सोना लाना नहीं है. वैज्ञानिक अभी यह समझना चाहते हैं कि 16 साइकी आखिर बना कैसे. जुलाई 2029 के आखिर में एस्टेरॉयड 'साइकी' की ग्रेविटी स्पेसक्राफ्ट को अपनी पकड़ में ले लेगी और अगस्त में 'साइकी' अपना मुख्य मिशन शुरू करेगा. यह एस्टेरॉयड के चारों ओर चक्कर लगाते हुए लगभग दो साल बिताएगा, जिसमें तस्वीरें लेना, सतह का मैप बनाना और 'साइकी' की बनावट का पता लगाने के लिए डेटा इकट्ठा करना शामिल होगा.
अभी खनन क्यों नहीं हो सकता?
इतना बड़ा खजाना होने के बावजूद फिलहाल इसकी खनन करना लगभग नामुमकिन है. सबसे बड़ी चुनौती तकनीक है. अंतरिक्ष में कम गुरुत्वाकर्षण, तेज रेडिएशन और धरती से बहुत लंबी दूरी के कारण ऐसी मशीनें चाहिए जो बिना इंसानी मदद के खुद काम कर सकें. दूसरी बड़ी चुनौती फंडिंग है. ऐसी तकनीक विकसित करने और मिशन भेजने में भारी खर्च आता है. एस्ट्रोफोर्ज और ट्रांसएस्ट्रा जैसी निजी कंपनियां इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन अंतरिक्ष से सोना लाने का सपना अभी हकीकत बनने से काफी दूर है. इसलिए फिलहाल 16 साइकी का यह विशाल "सोने का खजाना" सिर्फ वैज्ञानिकों के अध्ययन का विषय है, न कि धरती पर लाने के लिए तैयार कोई खदान.
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